लेखक परिचय

जगमोहन फुटेला

जगमोहन फुटेला

लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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जगमोहन फुटेला

हिंदी का सबसे ज्यादा नुक्सान हिंदी ‘जानने’ वालों ने ही किया है. खासकर उन ‘जानकारों’ ने जिन्हें ये करने के लिए चैनलों का आश्रय प्राप्त है.

देखते देखते हिंदी हिंगलिश हुई और अब वो वह भी नहीं रह गई है. एक समय था जब बोलियों में इस्तेमाल होती थी. अब वो बोलियों में होने लगी है. मिसाल के तौर पर बंगला में लड़के को आई, गई और लड़की को आया गया बताया जाता है. ये शायद उसी का असर हो कि बंगाल के निकटवर्ती राज्यों में भी वर्तनी वैसी ही हो गई है. लड़के को आई, गई न भी कहे रहे हों भाई लोग मगर ये तो कह और लिख ही रहे हैं कि ट्रेन आया, टकराया और उसमें बीस आदमी घायल हुआ. इन बीस में शामिल महिलाओं और बच्चों को भी बीस आदमियों की इसी संख्या में शामिल किया जाता है. कहीं भी किसी दुर्घटना या हत्याकांड में जब एक से अधिक लोग मरते हैं तो नीचे बीहाइव (स्क्रौल) पर लिखा और स्क्रिप्ट में बोल कर बताया यही जाता है कि तीन मारे गए, तीनों लाश मिला है. अरे भई, लाश अगर ‘मिला’ है तो ‘लाशें मिलीं’ शब्द कब और कहाँ प्रयोग होंगे?

 

स्थानीय को अस्थानीय, शाम को साम, शव को सव और सबेरे को सम्बेरे बोलना भी किसी एक आध की समस्या नहीं है. वर्तनी दरअसल हो ही ऐसी चली है. ये भी चलो विशुद्ध क्षेत्रीय स्वर स्वभावों के कारण हो सकता है. कुछ ख़ास इलाकों के किन्हीं ख़ास मित्रों के द्वारा. लेकिन चैनलों को क्या हुआ है? उनके यहाँ भाषा के अपभ्रंश को लेकर किसी तरह की चिंता या व्यवस्था क्यों नहीं है? दुःख की बात तो ये है कि हिंदी की ये दुर्गति उन चैनलों में भी अनवरत हो रही है जहा हिंदी के स्थापित लेखक और साहित्यकर्मी शीर्ष पदों पर विराजमान हैं.

कुछ जुमले गढ़ लिए गए हैं. जैसे, ‘कहीं न कहीं’. आप कोई सा चैनल देख लो. थोड़ी देर रुको. बस दो चार मिनट ही. किसी भी स्टोरी, किसी भी रिपोर्ट या एंकर रीड में आप सुनेंगे..कहीं न कहीं कह सकते हैं कि…??? और ये कहीं न कहीं कहते ही रहते हैं आप, कहीं भी. उसका कोई सन्दर्भ या मतलब भी हो या नहीं. एक रिपोर्ट में कहा गया, ” रेल लाइन पर अर्धविच्छित (अर्धविक्षिप्त, नहीं) सव (शव) को देख कर लगता है कि कहीं न कहीं इस पर से ट्रेन गुजरा होगा.” ..माथा पकड़ कर ये बताने को दिल करता है कि भाई साहब अगर शव ट्रेन से कटा मिला है तो ट्रेन कहीं न कहीं नहीं, यहीं, इसी रेलवे लाइन पर से से ही गुजरी होगी. और अगर कहीं न कहीं आप किसी अनिश्चितता से बचने के लिए कह रहे हैं तो क्या इसमें भी आपको कोई शक है कि रेलवे लाइन पे ट्रेन नहीं कोई ट्रक चढ़ा होगा!

होने को विविधता स्थानीय बोली में किसी भी एक प्रदेश के भीतर भी है. हर पचास किलोमीटर पे बोली बदल जाती है. फिर भी पूरे प्रदेश, बल्कि बाहर भी लोग कह, सुन, समझ और आदर कर ही रहे हैं. लेकिन बात जब एक भाषा की करें तो उसके व्याकरण का कुछ तो आदर करना ही चाहिए. उसका भी न सही, क्या गणित भी बिगाड़ देंगे हम? तीन मरें तो भी लाश एक ही रहेगी (गा?). …होने को उच्चारण भेद अंग्रेजी के साथ भी है. बाकायदा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर. ट्रान्सपोर्ट को त्रांसपोर्त भी कहते, सुनते और समझते आ ही रहे हैं लोग. लेकिन वीमेन को वूमन फिर भी कभी किसी ने कभी माना या मनवाया नहीं है. हिंदी में तो हमने व्याकरण ही नहीं वचन तक बदल दिए हैं.

मुझे याद है कि सत्तर और अस्सी के दशक में (जब टीवी के नाम पर सिर्फ दूरदर्शन था) एक एक शब्द पे बहस होती थी गोष्ठियों और अखबारों के दफ्तरों में. बताया जाता था कि कैसे -रोको मत जाने दो- में कौमा ‘रोको’ के बाद लगाने या फिर ‘मत’ के बाद लगाने से कैसे वाक्य का अर्थ ही बदल जाएगा. शब्दों के अर्थ नहीं भावार्थ तक पे चर्चा होती थी. ट्रक के ‘उलटने’ और ‘पलटने’ में भी फर्क था. लड़ाकू विमान के दुर्घटनाग्रस्त हो कर गिर जाने के शीर्षक में जमींदोज शब्द तब के संपादकों और समाचार संपादकों को स्वीकार्य नहीं था. लेकिन दुःख की बात है कि जिन चिन्लों में भाषा के जानकार हैं वहां भी आज शब्दों के चयन पर कोई चिंता या बहस और इसी लिए कोई कोशिश नहीं होती. जहां तक मेरी जानकारी है सरकारी या गैर सरकारी किसी भी पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान में भाषा को लेकर कोई चैप्टर तक नहीं है. टीवी के रूप में उपलब्ध प्रसार माध्यमों के ज़रिये भाषा के विस्तार या उसे सम्रद्ध करने की कोई चिंता, दुःख का विषय है कि, किसी साहित्यिक या सरकारी संगठन के स्तर पर भी नहीं है.

बात सिर्फ भाषा की ही नहीं, उसकी सोच और उसके व्यवहार की भी है. भाषा जब कमज़ोर होती है तो उसके साथ उसकी पठनीयता, उसके प्रति आदरभाव और उसके साहित्य सृजन के प्रति उचाट भाव भी कमज़ोर होता है. और वो जब लिखने, पढ़ने, बोलने और बोलते ही रहने वालों में होता है तो फिर उसके बड़े दूरगामी परिणाम होंगे. स्वयं प्रिंट और टीवी दोनों विधाओं में लम्बे समय तक रहा होने के कारण मैं जान और कह सकता हूँ कि टीवी आने के बाद से मीडिया में काम करने वालों के पास पढ़ने के लिए अब समय ही नहीं है. अखबार तक हालत कुछ ठीक थी. पत्रकार पढ़ते भी थे और किताबें, लेख आदि लिख भी रहे थे. उनका अध्ययन उनके लेखन में दिखता था. और वो समाज के लिए उपयोगी भी था. जिस भाषा में भी उन्होंने पढ़ा या फिर लिखा, अच्छे साहित्य का अच्छा प्रभाव पड़ा ज़रूर. लेकिन अब टीवी आने के बाद अच्छे लिक्खाड़ मीडिया में आ ही नहीं रहे. आये भी हैं तो टिके नहीं हैं. टीवी की दुनिया भागमभाग की दुनिया है. जो लोग उसमें अब हैं वे पढ़ा भी भूल गए हैं. उनकी बड़ी से बड़ी रिपोर्ट बीस वाक्यों में ख़त्म हो जाती है. उसमें हिंदी, साहित्य या उसके मर्म समावेश की संभावना भी बहुत अधिक नहीं है. कम से कम आज पढ़ के तो बिलकुल नहीं है. ऐसे मैं बहुत अच्छा होगा कि हिंदी को समृद्ध न सही, जैसी वो है उसे बचाने का कोई प्रयोजन चैनल के मालिक या संचालक स्वयं करें. याद रखिये, भाषा को बचा कर नहीं रखोगे तो संवाद खुद ही खो बैठोगे समाज से.

विशुद्ध और केवल हिंदी के अपभ्रंश और उसकी अवहेलना को उजागर करने के मकसद मैं कहीं किसी को किसी भी रूप में आहत कर गया होऊँ तो क्षमा चाहूंगा. जी हाँ, हिंदी का कोई बहुत बड़ा सेवक तो मैं भी नहीं हूँ. होता तो पिछले वाक्य में मकसद की जगह उद्देश्य भी तो लिख ही सकता था!

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2 Comments on "जिन्हें नाज़ था हिंद (दी) पे वो कहाँ हैं?"

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Jeet Bhargava
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भाई आजकल सोसायटी से लेकर मीडिया और दिल्ली दरबार में हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान विरोधी ताकतों का ही बोलबाला है.
क्या करे सोनिया माई को हिन्दी आती नहीं, मन्नू को हिन्दी भाती नहीं, और सेकुलरो को हिन्दी सुहाती नहीं.

डॉ. मधुसूदन
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जो छोटे छोटे देश थे, वे अपनी भाषाओँ आश्रय लेकर आगे बढ़ गए| हमारे शासन के पास इच्छा शक्ति ही नहीं है| दस गुना धन भी लग जाता, (१) तो दक्षिणी हिंदी विद्वानों की ऐसी आर्थिक उन्नति करते-करवाते की सारे के सारे हिंदी सिखने लग जाते| (२) दस गुना अनुदान देकर, संस्कृत निष्ठ पारिभाषिक शब्दावली रचावाते|(बहुत बहुत सक्षम है हमारे विद्वान्) (३) बड़े बड़े पुरस्कार देते| (४) सारी दक्षिणी भाषाएँ ५०% से अधिक ही संस्कृत शब्दों का प्रयोग कराती हैं, तो संस्कृत प्रचुर हिंदी मानक बनाते| (उर्दू सहित सभी भाषाओं से शब्द स्वीकारते) (५) “भाषा भारती” (हिंदी नहीं) नाम रखते|… Read more »
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