लेखक परिचय

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर धानापुर-चन्दौली (उत्तर प्रदेश) के निवासी हैं। इन्होने समाजशास्त्र में परास्नातक के साथ पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। स्वतंत्र पत्रकार , स्तम्भकार व युवा साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। पिछले पन्द्रह सालों से पत्रकारिता एवं रचना धर्मीता से जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अखबारों , पत्रिकाओं और वेब पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिखते रहते हैं। Mobile- 8081110808 email- mafsarpathan@gmail.com

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water crisis

प्रकृति की मूल रचना के साथ जब भी छेड़-छाड़ होती है तब वही चीजें इंसानों के लिए विनाश का सबब बन जाती हैं। इंसान अक्सर अपने ही बुने जाल में फंसकर तड़फड़ाता नजर आता है और जब उसे होश आता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। कुछ यही स्थित पानी के सम्बंध में है। पिछले कुछ सालों में पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ा है। जिस वजह से पानी को लेकर भी दिक्कतें बढ़ी है। नदियों में पानी की कमी व सूखते जलस्त्रोत तथा भूमिगत जल का अंधाधुन दोहन की वजह से मुल्क में भू-जल स्तर में तेजी से गिरावट हो रही है। गर्मी के दिनों में इस कारण देश के ज्यादातर इलाकों में नल व कूओं के सूखने का खबर मिलता है। पानी के बिना जीवन की कल्पना बेमानी है। जल जीवन की मूलभूत जरूरतों में से एक है, जिसका उपयोग पीने, भोजन बनाने, सिंचाई, पशु-पक्षियों के साथ औद्योगिक ईकाइयों के लिए बेहद जरूरी है। बहुत ज्यादा वक्त नहीं बीता है जब मालदीव में जल संकट उत्पन्न हो गया था जिसमें भारत की तरफ से 12 सौ टन से ज्यादा ताजा जल भेजा गया। जल संकट का यह तो केवल संकेत मात्र है। पूरे विश्व में हालात कितने विकराल होंगे यह कह पाना बेहद मुश्किल है। पृथ्वी का दो तिहाई यानि तकरीबन 71 प्रतिशत धरातल जल से आच्छादित है बावजूद इसके अलवणीय जल कुल जल का सिर्फ 3 प्रतिशत है। वास्तव में अलवणीय जल का एक छोटा हिस्सा ही इंसानों के इस्तेमाल के लायक होता है, जिस वजह से पूरे विश्व में शुद्ध जल की भारी किल्लत है। विश्व स्वास्थ संगठन के ताजा आंकड़ों पर गौर फरमायें तो पता चलता है कि दुनियां में तकरीबन 74.8 करोड़ लोगों को नियमित रूप से साफ पानी नहीं मिल पा रहा है।

देश में आजादी के समय प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता पांच हजार क्यूबिक मीटर थी, जबकि वर्तमान में यह आंकड़ा दो हजार क्यूबिक मीटर रह गयी है। योजना आयोग के आंकड़ों के मुताबिक देश का 29 फीयदी इलाका पानी की गम्भीर संकट से जूझ रहा है। एक पुराना आंकलन देखें तो केन्द्रीय भू-जल बोर्ड के अनुमान के मुताबिक भूमिगत जल का दोहन इसी तरह रहा तो देश के 15 राज्यों में भूमिगत जलस्त्रोत 2025 तक खली हो जायेगा। अब यहां हमें चेतना है कि हमारी भावी पीढि़यों के लिए हम कितना पानी छोड़ेंगे। पानी का संकट एक विश्व स्तरीय समस्या है। विकास के अन्धी दौड़ में बढ़ते औद्यौगिक कल-कारखानों की वजह से पानी की खपत भी बढ़ी है, जो जल संकट में थोड़ा इजाफा ही है। संयुक्त राष्ट्र संघ के एक आकलन के मुताबिक विकासशील देशों में तकरीबन 12 करोड़ लोगों को साफ पीने का पानी मयस्सर नहीं, जिस वजह से 2.5 करोड़ लोग प्रदूषित जल की वजह से होने वाली बीमारियों से मर जाते हैं। जल संकट पर हमेशा राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चिंतन होता रहा है बावजूद इसके जल संकट दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है।

भारत में बढ़ती जनसंख्या, सिंचाई की आवश्यकता तथा औद्योगिकरण में बेतहासा वृद्धि की वजह से पानी की मांग तेजी से बढ़ी है। कृषि प्रधान देश होने की वजह से दो-तिहाई लोग खेती पर निर्भर हैं। आजादी के वक्त देश की कुल सिंचाई क्षमता तकरीबन 1.95 करोड़ हेक्टेयर थी जो अब बढ़कर 7.6 करोड़ हेक्टेयर हो गयी है। इस बढ़ते जल की मांग को सतही जल से पूरा नहीं किया जा सकता। जिस वजह से भूमिगत जल का दोहन बेतहासा बढ़ा है, जिस वजह से भू-जल का स्तर दिन-ब-दिन गिरता जा रहा है। यही वजह है कि देश में जल संकट बढ़ा है। इस गम्भीर समस्या से निपटने के लिए जल संरक्षण ही सबसे बेहतर उपाय है।

जल संकट का सामना करने के लिए जलसंरक्षण एक बेहतर व कारगर उपाय है। इससे न केवल जलस्त्रोतों से पानी की निकासी में कमी की जा सकेगी बल्कि गन्दे पानी का बहाव भी कम किया जा सकेगा। देश में बारिश से तकरीबन 30 लाख एकड़ फिट जल मिलता है, मगर इसका ज्यादातर भाग या तो वाष्प बनकर उड़ जाता है या नाले-नालियों में बह जाता है। बारिश के पानी को कुण्ड, तालाबों, जलाशयों, छोटे बांधों आदि में इकट्ठा करके इसका उपयोग सूखे मौसम में किया जा सकता है। इसके अलावा भूमिगत जलस्त्रोतों को भी इस पानी से भरा जा सकता है। जल संरक्षण के कई फायदे हैं, एक तो सीमित  संसाधनों का बेहतरीन उपयोग सम्भव हो पाता है, दूसरे इसके माध्यम से अन्य इलाकों में भी पानी पहुंचाया जा सकता है।

जल संरक्षण के विभिन्न उपयों को अपना कर बारिश के जल को संरक्षित करके उसे पीने व दूसरे महत्वपूर्ण कार्यों में लाया जा सकता है। इसके लिए सरकार व आमजन दोनों को जागरूक होने की जरूरत है। सरकार द्वारा जनता में जल संरक्षण के महत्व को बताने ही नहीं बल्कि यह समझाने की जरूरत है कि इस तरह से जल संरक्षित कर वो उसका विभिन्न रूप से इस्तेमाल में ले सकते हैं। आबादी के फैलाव से ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों की संख्या घटती जा रही है, जिस वजह से जल के भण्डारण क्षमता में भी कमी आयी है। इस वास्ते जल संरक्षण की नीतियां बनायी जाए और उसे ठीक से अमल में लाया जाए। केन्द्र व राज्य सरकारें आपस में बेहतर ताल-मेल से जल संरक्षण के महत्व व उसकी उपयोगिता का प्रचार आम जन में करके इस दिशा में कार्य करें। सरकार के साथ गैर सरकारी संगठन भी लोगों में जल संरक्षण के प्रति जन जागरण अभियान चलाकर बड़ी मुहीम खड़ा करें। तब जाकर कहीं जल बचेगा तभी हम जीवन बचा पाने में सफल होंगे वर्ना रहीम दास के शब्दों में…. रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।

 

एम. अफसर खां सागर

स्वतंत्र पत्रकार

08081110808

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