लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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आज विश्व की लगभग एक अरब आबादी को जल के लिए तरसना पड़ रहा है। भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, ब्राजील जैसे तमाम विकासशील देशों में लाखों लोग गंदे पानी से पैदा होनेवाली बीमारियों के कारण मौत के ग्रास बन जाते हैं। धरती के संपूर्ण जल में साफ पानी का प्रतिशत 0.3 से भी कम है। आनेवाले अगले 20 वर्षों में खेती, उद्योग सहित अन्य क्रियाकलापों के लिए 57 फीसदी अतिरिक्त जल की आवश्यकता होगी। कुछ दशक पूर्व पर्यावरणविदों एवं जल विशषज्ञों ने भविष्यवाणियां की थीं कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। इस टिप्पणी पर उस वक्त दुनियावालों को विश्वास नहीं हुआ था। अलबत्ता, चेतावनी के बावजूद जल का दोहन तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की मानव समुदाय द्वारा करतूतें जारी रहीं। किंतु जब गत वर्ष 14 मई को भोपाल में पेयजल के लिए एक ही परिवार के तीन लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई तो यह आशंका और भी बलवती हो गई। पिछले दिनों भोपाल में इस तरह की दो-तीन घटनाएं घटित हो चुकी हैं। पानी की किल्लत की वजह से पानी पर आधारित उज्जैन के लगभग आधे उद्योग-धंधे चौपट हो गए। भोपाल ही क्यों? उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड से लेकर बिहार के कैमूर तक पानी को लेकर हाहाकार है। तकरीबन दो साल पहले बिहार के मुजफ्फरपुर प्रमंडल के भूगर्भ जल सर्वेक्षण विभाग ने मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, पूर्वी चंपारण के कुछेक प्रखंडों में भूजल की उपलब्धता पर सर्वे कराया था। सर्वे से जो तथ्य सामने आए, वे राज्य में बढ़ते जल संकट की ओर इशारा करते हैं। इन प्रखंडों में जितना पानी जमा होता है उससे 70 फीसदी ज्यादा पानी निकल रहा है। यानी पानी के रिचार्ज और ड्राट का अंतर 70 फीसदी का है। समय रहते यदि चेता नहीं गया तो आने वाले दिनों में उत्तर बिहार में भी लोग पानी के लिए तरसेंगे। खेत, हैंडपंप, कुएं सूख जाएंगे। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की बात करें अथवा पूर्वोत्तर एवं दक्षिणी राज्यों की, एक बड़ी आबादी पेयजल के लिए तरस रही है। सर्वाधिक बारिश के लिए प्रसिद्ध मेघों के प्रदेश मेघालय का चेरापूंजी भी इस समस्या से अछूता नहीं रहा। यहां गत वर्ष औसत से आधी वर्षा रिकार्ड की गई। फलस्वरूप, यहां का भूमिगत जल विभाग भी भूजल स्तर नीचे जाने की आशंका से चिंतित है। पूर्वोत्तर के सातों प्रांतों यथा-असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड को बीते वर्ष औसत से कम बारिश के कारण सूखे का संकट झेलना पड़ा। बेहिसाब बढ़ती आबादी, औद्योगिकीकरण का विकास और इन्द्र भगवान के रूठ जाने से भूजल पर निर्भर हमारी खेती ने पानी की मांग बढ़ा दी है। विश्व में प्रति वर्ष 8 करोड़ लोगों की वृध्दि जारी है। बढ़ती जनसंख्या के कारण प्रत्येक वर्ष लगभग 64 अरब घन मीटर स्वच्छ जल की मांग बढ़ रही है। भारत में भी जहां विश्व की कुल आबादी के 16 फीसदी लोग रहते हैं, वहां विश्व के कुल भू-भाग का केवल 2.45 फीसदी भाग ही हमारे पास है। स्वामीनाथन कमिटी का आकलन है कि वर्ष 2025 में कृशि कार्य के लिए पानी का मौजूदा हिस्सा 83 फीसदी से घटकर 74 फीसदी रह जाएगा। क्योंकि तब अन्य क्षेत्रों में पानी की मांग बढ़ चुकी होगी। माना जा रहा है कि तब पानी की कमी के चलते देश में अनाज की पैदावार 25 फीसदी तक घटने का खतरा है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, प्रत्येक साल प्रति व्यक्ति जल की कुल खपत 1022.7 क्यूबिक मीटर है। सन 2000 में जल की मांग प्रति व्यक्ति 634 क्यूबिक मीटर थी, जबकि 2025 तक यह बढ़कर 1093 मीटर हो जाएगी। सन 2004 में स्वीडन में संपन्न विश्व जल सम्मेलन में विशेषज्ञों ने जल संकट से पैदा होनेवाली अकाल जैसी स्थिति के लिए आगाह किया था।

केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड के एक अनुमान के अनुसार, अगर भूमिगत जल के अंधाधुंध प्रयोग का सिलसिला जारी रहा तो देश के 15 राज्यों में भूजल का भंडार 2025 तक पूरी तरह खाली हो जाएगा। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में जल की उपलब्धता को लेकर की जा रही चिंता उतनी गंभीर नहीं है, बशर्ते असमान जल वितरण एवं घटिया जल प्रबंधन की मानसिकता से हम उबर जाएं। नदी जोड़ योजना पर भी सरकार गंभीर नहीं दिखती है। याद रहे कि इन समस्याओं से लड़ना केवल सरकार के बूते की बात नहीं है। एक-एक व्यक्ति को आगे आना होगा। आनेवाले वक्त में हमारे नल, हैंडपंप, कु एं आदि प्यासे न रह जाएं, हमें आज से ही कुछ उपायों पर पहल शुरू कर देनी चाहिए। जल संकट के समाधान के लिए जल संग्रह करना एवं कंजूसी से पानी खर्च करना सबसे उत्तम उपाय है। वर्षा ऋतु में जो अतिरिक्त पानी बहकर निकल जाता है, इस पानी का संग्रह करना ही जल संग्रह कहलाता है। वर्षा के जल का संचय विेशेष रूप से बताए गए तालाबों, कुओं, बावड़ियों या अन्य जलाशयों में किया जा सकता है। बाढ़ के पानी की विशाल मात्रा समुद्र में समाहित हो जाती है। मिट्टी भर दिए गए कुओं व तालाबों का पुनर्ररुध्दार कर बाढ़ के पानी को संग्रहित करने से भूमिगत जल रिचार्ज होगा। जल संग्रह के और कई तरीके हैं, जैसे- मकानों के छतों पर इकट्ठा होने वाले जल को एक टैंक में जमाकर पाइप के जरिये उसे जमीन के अंदर जाने दें। इस तरह भूमि के अंदर का पेयजल रिचार्ज होगा। इस विधि को रेनवाटर हार्वेस्टिंग कहते हैं। मेघालय जैसा वर्षा बहुल प्रदेश में पानी का सही प्रबंधन नहीं होने की वजह से पानी की कमी महसूस की जाने लगी है जबकि मरुस्थलीय प्रदेश राजस्थान में सामुदायिक भागीदारी से सैकड़ों जोहाड़ (तालाब) बनाकर उसमें वर्षाजल संग्रह किया गया। फलतः मरुस्थल पानी-पानी हो गया। इधर, केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड ने भी प्रशंसनीय कदम उठाते हुए दिल्ली तथा अन्य शहरों में स्थित सरकारी भवनों पर जल संग्रह करने का विभागों को निर्देश दिया है। खबर है कि मेघालय में भी रेनवाटर हार्वेस्टिंग पर काम हो रहा है।

बहरहाल, जरूरत है जन भागीदारी की, एक-एक बूंद बचाने का संकल्प लेने की। कहीं भी नल खुले देखें तो बंद कर दें। सब्जी, दाल, चावल धोने के बाद शेष बचे पानी को पेड़-पौधे में डाल दें। बच्चे अपने जन्मदिन पर कम-से-कम दो-चार पेड़ अवश्य लगाएं। गाड़ी धोने के लिए पानी का उपयोग बाल्टी से करें, पाइप से नहीं। ये छोटे-छोटे कदम आने वाली पीढ़ी को प्यास से बिलबिलाने नहीं देगी।

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