लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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jungleराकेश कुमार आर्य

‘जमीन से जुड़े रहने’ का मुहावरा बड़ा प्रसिद्घ है। इस मुहावरे का एक अर्थ ये भी है कि अपनी भारतमाता, गौमाता और जननीमाता से जुड़े रहना। कोई देश या संप्रदाय माने या न माने पर यह सच है कि उसके देश के लोगों में पारस्परिक सदभाव और समभाव, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समृद्घि तभी बन सकती है जब उनके बीच ऐसी भावनाओं को विकसित करने के लिए कुछ ऐसे प्रतीक खोज लिए जाएं जिन पर उस देश या संप्रदाय के लोग समान रूप से श्रद्घा रखते हों।

हमारे महान पूर्वजों ने इसी उद्देश्य से भारतमाता, गौमाता और जननीमाता के प्रति श्रद्घा को सामूहिक बनाया। हर देश अपने नागरिकों में ऐसे उच्चभाव भरने का हरसंभव प्रयास करता है-जिन्हें अपनाने से उस देश की एकता और अखण्डता सुनिश्चित रखी जा सके। पर भारत के बारे में विदेशी लेखकों और शत्रु इतिहासकारों ने कुछ दूसरा दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने भारत की एकता और अखण्डता को सुनिश्चित करने वाले प्रतीकों का उपहास उड़ाया, उन्हें हमारे पूर्वजों का पुरूषार्थ न कहकर उनका अज्ञान और रूढि़वादी सोच के रूप में उल्लेखित किया। दुर्भाग्य रहा कि इस देशघाती शत्रुभाव से लिखी गयी बातों का हमारे लोगों ने भी अनुकरण करना आरंभ कर दिया। यह नही सोचा गया कि जो लोग हमारे विषय में ऐसी अनर्गल बातें लिख रहे हैं-अंतत: वह भी अपनी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता को बनाये रखने के लिए क्यों कुछ प्रतीकों को अपनाते हैं?

हमारे पूर्वज जमीन से जुडक़र चलते थे। जल, जंगल और जमीन के प्रति उनकी गहन आस्था थी। इसलिए जल में थूकना भी ‘पाप’ था, जंगल काटना ‘पाप’ था और जमीन को अनुपजाऊ बनाना ‘पाप’ था। आधुनिक और प्रगतिशील सोच के कथित बुद्घिजीवियों ने हमारे पूर्वजों की सोच में व्याप्त ‘पाप’ को मिटाने के उद्देश्य से जल, जंगल और जमीन के साथ जो चाहो सो करो-पाप कुछ नही-कुछ ऐसी धारणा को स्थापित करके देखा। यह प्रयोग बड़ा घातक था, इसलिए परिणाम भी घातक ही आये। जल, जंगल, जमीन के साथ किये गये ‘पाप’ का परिणाम हम सब भोग रहे हैं। अब हमें पता चल रहा है कि हमने कितना बड़ा ‘पाप’ कर लिया है ? सनातन वैदिक धर्म की मान्यताओं का उपहास उड़ाकर देख लिया तो यह भी पता चल गया कि इस धर्म की मान्यताओं पर किसी प्रकार के प्रयोग की आवश्यकता नही है। वेद अपने आप में ही सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है।

हमारे ऋषियों ने सारे देश की अर्थव्यवस्था को जमीन से जोड़ा। जो लोग कृषि उत्पादों के आधार पर अपना कार्य-व्यापार चलते थे उन्हें भी अंतत: जमीन से जोडक़र रखने का प्रयास किया गया। लोहा, तांबा, सोना, चांदी आदि के व्यापारी को भी बताया गया कि तुझे भी धरती माता के प्रति ही कृतज्ञ रहना होगा, क्योंकि उसके गर्भ से ही तुझे यह सब कुछ मिलता है। ऐसी श्रद्घा भावना का ही परिणाम था कि इस देश की अर्थव्यवस्था कृषि बनी रही। यह तो सबको ज्ञात ही है कि कृषि का सारा संचालन गाय और उसके वंश से ही होता था, इसलिए गौपालन या पशुपालन को भी कृषि की परिभाषा में ही सम्मिलित किया गया।

‘प्रगतिशील’ सोच के कथित बुद्घिजीवियों ने व्यापारी को डाक्टर इंजीनियर, प्रोफेसर, वकील, पत्रकार आदि को यह बताना आरंभ किया कि तुम तो ‘बुद्घिजीवी’ हो, बुद्घि के सहारे जीते हो, इसलिए तुम भारत की किसी रूढि़वादी सोच में मत पड़ो और यह कहकर उन्हें जमीन से काट दिया गया। सभी की बुद्घि पर पत्थर पड़ गये, किसी ने यह नही सोचा कि बुद्घि के सहारे तो संसार का हर प्राणी जीता है। हर मनुष्य बुद्घि के अनुसार ही अपना कार्य-व्यापार और जीवन -व्यवहार चलाता है। अत: ‘बुद्घिजीवी’ तो सभी हैं।

वास्तव में यह ‘बुद्घिजीवी’ शब्द भी एक धर्मनिरपेक्ष शब्द की खोज है। इसे विद्वान का, पंडित का या ब्राह्मण का स्थानापन्न माना गया। अब विद्वान, पंडित या ब्राह्मण कहकर किसी व्यक्ति का महिमामंडन करने का अभिप्राय तो भारतीय मूल्यों को मान लेना था। जो कि साम्प्रदायिकता मान ली जाती। जब कि उद्देश्य यह था कि भारतीय मूल्यों को माना न जाए। जिससे कि भारत की धर्मनिरपेक्षता की रक्षा हो सके। इसलिए पंडित, ज्ञानी, विद्वान, ब्राह्मण के लिए ‘बुद्घिजीवी’ शब्द खोज लिया गया। इसी ‘बुद्घिजीवी’ ने जल को प्रदूषित करना कराना आरंभ किया, सारे शहरों के गंदे नाले नदियों में लाकर डालने का परामर्श देने वाला या उस योजना पर काम करने वाला कोई ‘बुद्घिजीवी’ ही तो था, जंगलों को काटने के लिए किसानों को प्रेरित करने वाला भी कोई ‘बुद्घिजीवी’ ही था और जंगल कटान विरोधी कानून होने के उपरांत भी पेड़ कैसे काटा जा सकता है, यह बताने वाला भी कोई घूसखोर ‘बुद्घिजीवी’ ही रहा है। इसी प्रकार गाय को और उसके वंश को मिटाने वाले भी कहीं ना कहीं ये ‘बुद्घिजीवी’ ही हैं। यह कैसी बुद्घिजीविता कि व्यक्ति अपने ही पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारे, अपनी मृत्यु का सामान स्वयं एकत्र करे और समाज में बुद्घिजीवी कहलाए।

सारे षडय़ंत्रों के उपरांत भी भारत में 1970 तक 70 प्रतिशत लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत जमीन ही थी। परंतु 1982 तक यह प्रतिशतता घटी और जमीन से जुड़े लोगों की प्रतिशतता 61.7 रह गयी। तब 40 प्रतिशत एकल राष्ट्रीय उत्पाद कृषि से ही आता था। भारत की कुल कृषि योग्य 15.4 करोड़ हेक्टेयर भूमि का 47 प्रतिशत भाग कृषि उपयोग में आता था। भारत में विदेशी खादों के प्रयोग का प्रचलन 1950 से आरंभ हुआ तो 1950 के दशक में ही कृषि उत्पादन 3.2 प्रतिशत बढ़ गया। कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए सरकारों ने विदेशी खादों के प्रयोग के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया तो देश का कृषि उत्पादन हर वर्ष और हर दशक में बढ़ते-बढ़ते 1970-80 के बीच देश कृषि उत्पादों के विषय में आत्मनिर्भर हो गया। यह उन ‘बुद्घिजीवियों’ की क्रांति थी जिन्होंने विदेशी खाद के प्रयोग के प्रचलन को देश में बढ़ाने की बात कही थी। पर उन ‘बुद्घिजीवियों’ के इस घातक प्रयोग का पता तब चला जब देश की भूमि की उर्वरा शक्ति के हृास का क्रम आरंभ हो गया। अब अपनी मूर्खता को छिपाने के लिए इन ‘बुद्घिजीवियों’ ने ही निष्कर्ष निकाला कि यह सब कुछ विदेशी खादों के प्रयोग और गोवंश की उपेक्षा के कारण हो रहा है। अब इनसे कौन कहे कि ऐसा कराने वाले भी तो आप ही थे, और यदि ऐसा होता रहा है तो फिर देश के कृषि विश्वविद्यालयों में हमारे आने वाले कृषि वैज्ञानिकों को ऐसी शिक्षा क्यों दी गयी, जो देश के लिए आत्मघाती हो। क्यों ऐसे विश्वविद्यालय स्थापित किये गये और क्यों उनमें पिछले सत्तर वर्ष से शिक्षा पर देश का धन बड़ी मात्रा में व्यर्थ ही व्यय किया जाता रहा? विकास के नाम पर सत्तर वर्ष से इस देश के बुद्घिजीवियों ने देश में कितने बड़े घोटाले कर दिये और घोटाले करके भी बच गये या घोटाले करने के उपरांत भी अपने आपको बुद्घिजीवी कहलाकर प्रसन्न होते हैं, यह किसी ने नही सोचा।
भारत में विश्व की कुल गौ संख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत अर्थात 18.20 करोड़ गायें (हम इस आंकड़े से असहमत हैं) हैं। विश्व भैंस संख्या 50 प्रतिशत अर्थात 3.2 प्रतिशत भारत में हैं। मुरगन लेंस हमें बताते हैं कि भारत में गाय के दूध का उत्पादन विश्व के कुल दूध उत्पादन का केवल 3.15 प्रतिशत ही है। जबकि भैंस के दूध का उत्पादन 6.3 प्रतिशत था। देश के कुल दूध उत्पादन में गाय का प्रतिशत 43 प्रतिशत तथा भैंस का 57 प्रतिशत है। ऐसा इसलिए है कि भारत की कुल गायों में से केवल 20 प्रतिशत गायें ही दूध देती हैं। जबकि यूरोप में यह 40 प्रतिशत है। भारत में प्रतिवर्ष गाय का दूध प्रति व्यक्ति मात्र दो किलो तथा भैंस का 25 किलो उपलब्ध है। प्रतिदिन यह मात्रा 123 ग्राम ही है। 1974 से यह उपलब्धता बढ़ी।

जब भारत स्वतंत्र नही था तो भारत के लोग जल, जंगल, जमीन को प्रदूषण मुक्त रखकर और अपनी गौमाता से प्राप्त दूधादि के सेवन से पूर्णत: स्वस्थ रहते थे। 1947 में देश में केवल 10 या 12 विदेशी दवा निर्माता कंपनियां थीं। देश की 34-35 करोड़ की जनसंख्या में से मात्र पांच करोड़ लोग बीमार थे। 1974 तक देश के लिए मात्र 117 दवाएं ऐसी थीं जो पूरे देश को स्वस्थ रखने की क्षमता रखती थीं। 1947 में देश में केवल 4780 अंग्रेजी दवाओं से उपचार करने वाले डाक्टर थे। परंतु 2012 तक आते-आते सवा अरब की जनसंख्या में से सौ करोड़ लोग बीमार हो गये, जबकि डाक्टर 4780 से बढक़र 18 लाख, दवा निर्माता कंपनी 10-12 से बढक़र 20000 और स्वस्थ रखने वाली दवाईयों की संख्या 117 से बढक़र 84000 हो गयी। इन आंकड़ों को इस प्रकार भी दिखाया जा सकता है कि हमने चिकित्सा क्षेत्र में कितनी प्रगति की है। ये आंकड़े भी ‘बुद्घिजीवियों’ के द्वारा ही तैयार किये जाते हैं-अपनी धाक जमाने के लिए कि हमने देश में कितना बड़ा परिवर्तन लाकर दिखा दिया है? पर इन ‘बुद्घिजीवियों’ के पास इस बात का कोई उत्तर नही है कि इतना सब कुछ होते हुए भी सवा अरब में से सौ करोड़ लोग बीमार क्यों हैं? इसका अभिप्राय है कि व्यवस्था ध्वस्त हो गयी है। पर विचारणीय बात केवल यह है कि इस ध्वस्त व्यवस्था के लिए कौन उत्तरदायी है? निश्चित रूप से हमारे द्वारा जल, जंगल और जमीन (गौ आधारित कृषि व्यवस्था) की उपेक्षा करने की हमारी प्रवृत्ति की ही इसके लिए उत्तरदायी है। आंकड़ों के जादूगर इन ‘बुद्घिजीवियों’ की गतिविधियों पर हम जितनी शीघ्रता से अंकुश लगाकर इनका भारतीयकरण कर देंगे उतनी ही शीघ्रता से हम अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा कर सकेंगे। हमें वास्तविक अर्थों में ऋषियों की, विद्वानों की और पंडितों की (यहां किसी जाति विशेष के लिए हमारे संकेत नही है) आवश्यकता है। क्योंकि उन्ही से हमारे सांस्कृतिक प्रतीकों की रक्षा होना संभव है। जल, जंगल और जमीन (गौ आधारित कृषि व्यवस्था) के साथ छेड़छाड़ को हम एक बार पुन: ‘पाप’ मानना आरंभ कर दें, परिणाम इतने सुखद आएंगे कि आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे।
– राकेश कुमार आर्य

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