लेखक परिचय

शम्‍स तमन्‍ना

शम्‍स तमन्‍ना

लेखक विगत कई वर्षों से प्रिंट एवं इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। बिहार तथा दिल्ली के कई प्रमुख समाचारपत्रों में कार्य करने के अलावा तीन वर्षों तक न्यूज एजेंसी एएनआई में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। खेल तथा विभिन्न सामाजिक विषयों पर इनके आलेख प्रभावी रहे हैं। वर्तमान में मीडिया के साथ ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं पर कार्य करने वाली गैर सरकारी संस्था चरखा में ऐसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं।

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शम्स तमन्ना

 

इस वर्ष देश के विभिन्न भागों में गर्मी पिछले सारे रिकार्डों को तोड़ती नज़र आ रही है. उत्तर पूर्वी राज्यों को छोड़ दें तो तकरीबन समूचा भारत सूर्य देवता के प्रकोप से झुलस रहा है. सबसे बुरा हाल ओडिशा का है जहाँ अभी से पारा रिकॉर्ड 50 डिग्री (तितलागढ़ में 48.5 डिग्री) को छूने के करीब पहुँच रहा है. जबकि मई और जून का महीना आना अभी बाकी है. वहीँ तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में धरती अनाज की जगह आग उगल रही है. इलेक्ट्रॉनिक सिटी बंगलुरु की नई नस्ल ने शायद पहली बार सूरज का ऐसा रौद्र रूप देखा है. सालों भर एक समान तापमान वाले इस शहर में भी गर्मी सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है. भयंकर गर्मी ने अबतक सैकड़ों की जान ले ली है. देश की राजधानी दिल्ली में भी बढ़ती गर्मी ने लोगों के पसीने छुड़ा दिए हैं. हर तरफ हाहाकार मचा हुआ है. ऐसे में सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी की हो रही है. जिसके सभी स्रोत एक के बाद एक ख़त्म हो रहे है. विदर्भ और मराठवाड़ा की अधिकतर नदियां, डैम और जलाशय करीब-करीब सूखने की हालत में आ गए हैं. इन क्षेत्रों में भूजल का स्तर भी लगातार घटता ही जा रहा है. लोग जान जोखिम में डालकर कुँए में उतर कर पानी का इंतज़ाम कर रहे हैं. बच्चे स्कूल न जाकर पानी की खोज में दर-दर भटक रहे हैं. तो वहीँ दूसरी ओर पानी माफिया ऐसे अवसरों का खूब फायदा उठा रहे हैं. हालांकि प्रशासन इससे इंकार करता रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि उसके नाक के नीचे पानी माफिया अपना धंधा चला रहे हैं. वहीँ दूसरी ओर गर्मी और पानी की कमी के चलते लोग पलायन को मजबूर हो रहे हैं.
गर्मी के कारण देश में लगभग सूखे की हालत हो गई है. उचित मात्रा में पानी नहीं मिलने से फसलें बर्बाद हो रही हैं. ऐसी विषम परिस्थिती में सबसे बुरा हाल छोटे और मझौले किसानों का हो रहा है. जिनके पास खुद अपने बच्चों को खिलाने के लिए अनाज नहीं बच रहा है. यह वह किसान हैं जो फसल उगाने के लिए सूद और ब्याज पर क़र्ज़ लेते हैं, लेकिन फसल खराब होने के बाद वह क़र्ज़ तो दूर ब्याज के पैसे लौटाने लायक भी नहीं रह जाते हैं. हताश और निराश किसान आत्महत्या जैसा संगीन क़दम उठाने को मजबूर हैं. आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस सालों में देश में तक़रीबन तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है. जिसमे सबसे अधिक किसान महाराष्ट्र से हैं. माना जाता है कि क़र्ज़ का बोझ और फसल खराबी के बाद हताशा में औसतन रोज़ तीन किसान अपनी जान दे रहा है. सबसे दुखद पहलू तो यह है कि कुछ किसान की बेटियों ने सिर्फ इसलिए मौत को गले लगा लिया ताकि उनके क़र्ज़दार पिता को उनकी शादी के लिए और अधिक क़र्ज़ न लेना पड़े. लेकिन विडंबना देखिये हमारी मीडिया की संवेदनहीनता का, जो संवेदनशील और ग्लैमर से दूर असली खबर दिखाने का दावा तो खूब करता है लेकिन उसकी नज़र में ऐसी बेटियों की मौत हेडलाइन बनने लायक़ भी नहीं होती है.

हालांकि सूखे की मार झेल रहे किसानों के लिए मौसम विभाग की भविष्वाणी उम्मीद की किरण बन गई है. मौसम विभाग की माने तो इस बार समूचे देश पर इंद्र देवता की असीम कृपा बरसेगी और तपती धरती वर्षा की बौछारों से तृप्त हो जायेगी। मौसम विभाग की यह घोषणा कि इस वर्ष औसत 106 प्रतिशत बारिश हो सकती है, मुरझाए चेहरों को अभी से ख़ुशी से सराबोर कर रही है. ख़ुशी केवल किसानों को ही नहीं हो रही है बल्कि महंगाई की मार झेल रहे आम आदमी को भी हो रही है. एक तरफ जहाँ किसान इस बात से खुश है कि फसल अच्छी होने से उसके नुकसान की भरपाई हो जाएगी तो वहीँ दूसरी ओर आम आदमी इस बात से ही खुश हो रहा है कि अच्छी फसल होने से महंगाई कम होगी और कम आमदनी में भी वह अपने परिवार को भरपेट भोजन करा सकेगा। वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में देश में मानसून के आंकड़े बहुत खुश करने वाले नहीं रहे हैं. 2009 में देश में केवल औसत 78 प्रतिशत वर्षा हुई थी. यह वह समय था जब भारत वैश्विक वित्तीय संकट की छाया से मुक्त हो कर आगे बढ़ रहा था. लेकिन कम वर्षा ने महंगाई को बढ़ाया और इसका सीधा असर आम मध्यमवर्गीय परिवार की जेब पर पड़ा था. जिसका मुनाफाखोरों और कालाबाज़ारियों ने जमकर फायदा उठाया था. याद कीजिये कैसे उस वक़्त महंगी चीनी ने खाने के स्वाद को कड़वा बना दिया था. ज़ाहिर है इसके पीछे उन्हें मिलने वाली राजनीतिक सरपरस्ती सबसे बड़ी ज़िम्मेदार थी. हालाँकि उसके बाद के वर्ष में मानसून की चाल में रफ़्तार आई थी और उम्मीद के मुताबिक बारिश हुई थी, जिससे सरकार ने भी राहत की साँस ली. परंतु पिछले दो वर्षों से बरखा रानी जैसे देश से रूठ ही गई थी. इन वर्षों में क्रमशः 89 और 86 फीसद ही बारिश हुई है. ऐसे में देश में तेज़ी से सूखे जैसी हालत होती जा रही है. इस बुरे हाल में मौसम विभाग की औसत 106 प्रतिशत बारिश होने की भविष्वाणी के सच होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाता है. लेकिन एक बात गौर करने की है, मौसम विभाग की ओर से अबतक जारी अगले-पिछले आंकड़े समूचे देश से लिए गए औसत आंकड़े होते हैं. यानि पूरे देश में कहीं बहुत अधिक तो कहीं बहुत कम होने वाली वर्षा को जोड़कर औसत निकाला जाता है. ऐसे में देखना होगा कि इस बार देश के किस क्षेत्र में बहुत ज़्यादा बारिश होगी और किस हिस्से को पानी के लिए एक बार फिर से तरसना होगा। इंतज़ार कीजिये मानसून का और प्रार्थना कीजिये कोने-कोने में उसके झमाझम बरसने का. ताकि एक बार फिर से इंसान और खेत सभी को भरपूर पानी मयस्सर हो सके.

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