लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-

जल सत्याग्रह

-संदर्भ-भजन-कीर्तन करके जल सत्याग्रह का अनूठा विरोध प्रदर्शन-
ओंकारेश्वर बांध के जल भराव को कम करने व विस्थापितों की डूब में आई जमीन के बदले जमीन देने की मांग को लेकर एक बार ग्रामीण फिर से जल सत्याग्रह करने को विवश हुए हैं। आंदोलनकारी चाहते है कि बांध में पानी 191 मीटर तक भरने की बजाय,189 मीटर भरा जाए। जिससे ग्राम और ग्रामों से जुड़ी जमीन डूब में न आए। फिलहाल इस बांध में 191 मीटर तक पानी भर दिया गया है। इस कारण ग्रामों में जल भराव की स्थिति पैदा हो गई है। नतीजतन ग्रामीणों के रोजी रोटी के संशाधन तो नष्ट हो ही रहे हैं, लोगों को एक गांव से दूसरे गांव जाने के लिए नावों का साहारा लेना पड़ रहा है। इस भीषण समस्या से निपटने के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेतृत्व में सैकड़ों लोग खंडवा जिले के घोघलगांव में बीते एक सप्ताह से पानी में खड़े रहकर भजन-कीर्तन करते हुए विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन प्रदेश की भाजपा सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है।

तीन साल पहले प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सरकार ने इन्हीं आंदोलनकरियों की बांध में कम पानी भरे जाने और जमीन के बदले जमीन देने की मांग मान ली थी। लेकिन सरकार ने इन दोनों ही मांगे पर अमल नहीं किया। तब ऐसा ही आंदोलन हरदा के डूब प्रभावित लोगों ने किया था। यह जल सत्याग्रह इंदिरासागर बांध की डूब में आने वाले ग्राम खरदाना और बड़खलिया में चला था। 60 आंदोलनकारियों ने जल के बीच रहकर जंग जारी रखी थी। इस परिप्रेक्ष्य में प्रदेश सरकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवज्ञा कर रही थी। इस आदेश के मुताबिक इंदिरासागर बांध में पानी 260 मीटर से ऊपर नहीं भरा जा सकता था, लेकिन इस पर अमल नहीं किया गया। नतीजतन लोग जल सत्याग्रह को मजबूर हुए थे। सरकार ने तब ग्रामीणों को राहत देने की बजाय आंदोलन को कुचलने की निरंकुश कोशिशें की थीं। इस कड़ी में सत्याग्रहियों के ग्रामों की बिजली कांट दी गई थी। यहां रखी उन नावों को हटा दिया गया, जो लोगों के आवागमन का जरिया बनी हुई थीं। इस जल सत्याग्रह से जो खास बात उभरकर सामने आई थी वह यह थी कि कई दशक बीत जाने के बावजूद विस्थापितों के पूनर्वास की मुकम्मल व्यवस्थाएं नहीं हो पाई थी। कमोवेश यही स्थिति घोघलगांव में डूब प्रभावितों के साथ बनी हुई है। ये हालात केंद्र व राज्य सरकारों की बद्नीयति जाहिर करने वाले हैं।

सरकार ने एक सप्ताह बीत जाने के बावजूद सत्याग्रहियों की ओर रुख नहीं किया है। यह स्थिति सरकार की असंवेदनशीलता उजागर करती है। जबकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ओंकारेशवर बांध से जुड़े विस्थापितों के पुनर्वास संबंधी घोषणा के दौरान जमीन के बदले जमीन देने का वायदा हरदा आंदोलन के दौरान कर चुके थे। शायद इसीलिए तब सत्याग्रह से जुड़े कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल ने कहा था कि ‘अभी लड़ाई पूरी नहीं हुई है। अब तक मात्र जमीन देने की घोषणा की गई है। यह लड़ाई सभी विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन मिलने तक चलती रहेगी और जल सत्याग्रह स्थल अब भू-अधिकार स्थल के रुप में काम करेगा।‘

इस लड़ाई के लंबे खिंचने के आसार इसलिए थे,क्योंकि कुटिल चतुराई से सरकार ने इसमें ऐसा पेंच डाल दिया थी, जिसकी भरपाई नमुमकिन थी। हुआ भी यही। सरकार ने जमीन के बदले जमीन देना तो मंजूर कर लिया था, लेकिन शर्त लगा दी थी कि मुआवजेे की 50 फीसदी धनराशि वापिस करनी होगी,तभी विशेष पुनर्वास सुविधा प्राप्त होगी। मांगे मान लेने की शर्तों में यह एक ऐसी शर्त थी जो सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे कहावत को चरितार्थ करती थी। जाहिर है, किसान के पास हमेशाा नौ लाए तेरह की भूख बनी रहती है, इसलिए किसान न धनराशि जमा कर पाए और न उन्हें जमीन के बदले जमीन मिली। भला डूब की मार झेलता और कर्ज में डूबा किसान यह राशि कहां से लौटाता ? गोया पेंच उलझा का उलझा ही रहेगा।

यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण व विरोधाभासी स्थिति है कि एक तरफ तो प्रदेश सरकार इन्वेस्टर्स मीट के मार्फत पूंजीपतियों को लाल काॅर्पेट बिछाकर आमंत्रित करती हैै। उनकी आवभगत में करोड़ों रुपए खर्च करती है। मुफ्त में जमीन, बिजली व पानी देने के साथ तमाम कर संबंधी रियायतें भी देती हैं। बावजूद भाजपा के पिछले 12 साल के कार्यकाल में प्रदेश में एक भी ऐसा उद्योग नहीं लगा,जिसमें एक हजार लोगों को भी रोजगार मिला हो ? अलबत्ता  ऐसी बानगियां जरूर देखने में आ रही है कि पहले तो उद्योगपति ने जमीन हड़पी फिर उद्योग क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा और मानव संसाधन का भरपूर दोहन किया और फिर उद्योग को घाटे में दिखाकर चलते बने। सब्सिडी और बैंक ऋण भी ये उद्योगपति आसानी से डकार जाते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने जानकारी दी हैं कि बड़े औद्योगिक घराने राष्ट्रीयकृत बैंकों को अब तक दस लाख करोड़ से भी ज्यादा धनराशि को चूना लगा चुके हैं। मध्य प्रदेश के अकेले ग्वालियर अंचल में 15 साल के भीतर 700 उद्योग बंद हुए और इनमें काम करके आजीविका चला रहे 40 हजार लोग बेरोजगार हो गए। ये सब वे उद्योग हैं जो जमीन उपलब्ध कराने के साथ छूट की तमाम शर्तें सरकार द्वारा मान लिए जाने के बाद मध्यप्रदेश में आए थे। इन उद्योगों में ग्वालियर का जेसी मिल, कैलारस का शक्कर कारखाना और शिवपुरी का शारदा साॅल्वेंट प्लांट प्रमुख हैं। इन उद्योगों पर हजारों करोड़ बैंकों का ऋण बकाया है। इसलिए सरकार को चाहिए जो ग्रामीण मुआवजे की आधी राशि और विषेश पुनर्वास अनुदान देने की स्थिति में नहीं हैं, उनसे यह राशि लिए बिना ही जमीन के बदले जमीन दी जाए ?

हमारे देश में औद्योगिक विकास, बड़े बांधों का निर्माण, परमाणु विद्युत परियोजनाएं, राष्ट्रीय राजमार्गों का चैड़ीकरण और राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में दुर्लभ वन्य प्राणियों को संरक्षित करने के उपायों के चलते यदि सबसे ज्यादा त्रासदी जिन मानव समुदायों ने भोगी है, उनमें आदिवासी, मछुआरे और सीमांत किसान हैं। पिछले पचास सालों में आधुनिक विकास के नाम पर जितनी भी परियोजनाओं की आधारशिलाएं रखी गई हैं, उनके निर्माण के मद्देनजर अपनी पुश्तैनी जड़ों से उखाड़े गए चार करोड़ के करीब रहवासी विस्थापन का अभिशाप दशकों से झेल रहे हैं। यह केवल संयोग नहीं है कि अधिकांश परियोजनाएं एक सोची-समझी साजिश के तहत उन्हीं क्षेत्रों में वजूद में लाई जाती रही हैं, जहां का तबका गरीब व लाचार तो है ही, अड़ंगा लगाने की ताकत और समझ भी उसमें न हो ? लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। अपढ़ तबका भी अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हो रहा है। यही वजह है कि न्याय पाने की उसकी इच्छाशक्ति मजबूत हुई है। और वह आंदोलन से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक का दरवाजा  खटखटा रहा है। इस सब के बावजूद देश की एक भी राज्य सरकार ऐसी नहीं है, जिसने विस्थापन की शर्तों का हूबहू पालन किया हो और हितग्राहियों को संपूर्ण लाभ दिए जाने की सूची सार्वजनिक की हो ? जाहिर है प्रदेश सरकारों की नीयत में खोट है और वे विस्थापितों को बाजिव हक देना नही चाहती। गोया, मजबूरी में विस्थापितों को जल सत्याग्रह जैसा अमानवीय दंश झेलना पड़ रहा है।

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