लेखक परिचय

राजीव प्रताप सिंह

राजीव प्रताप सिंह

स्नातकोत्तर, पत्रकारिता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकरिता एवं संचार विश्वविद्यालय संपर्क सूत्र- 7053649763, 9651519410

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भारत की अवधारणा एक ऐसे राष्ट्र की अवधारणा है जिसके लिए संघर्ष को निर्माण का आधार रूप में कभी स्वीकार नहीं किया गया. यहाँ आदि काल से ही चिंतन को प्राथमिकता दी गई और अनेकों भाषा, समुदाय, जाति इत्यादि के मष्तिष्क और शरीर यहाँ आएं और यहीं के होकर रह गए. ऐसे में सम्पूर्ण विश्वजगत की विवधता को स्तम्भ में समेटे भारत 1947 ईस्वी में एक संवैधानिक राष्ट्र बनने की और अग्रसर हुआ, राष्ट्र का स्वरुप लिया और भारतीय राष्ट्रवाद की नई अवधारणा का नया चक्र शुरू हुआ. राष्ट्र के बोध की नींव रखी, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उपजी पत्रकारिता ने जिसका उद्देश्य था जनजागरण और राष्ट्रहित में राष्ट्रीय चेतना का विस्तार. लोगो में यह भाव जाग्रत करना कि कैसे वह एक ही भू-भाग में रहने वाले है , उनके हित-अहित एक ही है और ऐसे में राष्ट्र चेतना को विस्तार देने वाली पत्रकारिता ने भारत को एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका अदा की.

भारत के आज़ाद होने के बाद लोकतंत्र की स्थापना हुई. लोकतान्त्रिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए तीन आधार स्तंभों को प्रतिष्ठापित किया गया. कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका. लेकिन जब हम आज के सन्दर्भ में बात करते है , तो पत्रकारिता को चतुर्थ स्तम्भ के रूप में देखा जाता है .

लोकतंत्र के तीनो स्तंभ एक दुसरे पर नियंत्रण स्थापित करते है . लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता लाने में पत्रकरिता की अहम भूमिका है . पत्रकारिता जनता और लोकतान्त्रिक व्यवस्था के मध्य सेतु का कार्य करता है . यह लोकतान्त्रिक व्यवाष्ठ की जनहित की ख़बरों को जनसामान्य में उजागर करता है , जिससे लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर जनता का नियंत्रण स्थापित हो पाता है .

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में यह समझना अत्यावश्यक है कि लोकतंत्र है क्या? इसका उद्देश्य क्या है ? एक ऐसा देश जहाँ लोकतान्त्रिक व्यवस्था हो, वहां लोकतंत्र का उद्देश्य जनता है, राष्ट्र है या स्वयं लोकतान्त्रिक व्यवस्था है ? लोकतंत्र का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र होना चाहिए, क्योंकि राष्ट्र है तो लोकतंत्र भी है और वहां की जनता भी. ठीक इसी प्रकार राष्ट्रवादी पत्रकारिता में भी राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए. राष्ट्र चेतना की विषय-वस्तु को प्रमुखता दी जानी चाहिए.

पत्रकरिता सत्यम शिवम् सुन्दरम की अभिव्यक्ति है . आज यह समझना नितांत आवश्यक है कि पत्रकरिता का मूल धर्म क्या है ? सच को सच दिखाना, सच को अपने तरीके से दिखाना या टीआरपी की होड़ में सच को मिर्च मसाला लगाकर पेश करना या स्वयं ही निर्णायक बनकर न्यूज़ रूम में बैठकर सही और गलत तय करना. आज की वास्तविकता यहीं है कि सभी दूसरों को पत्रकार और पक्षकार का सर्टिफिकेट देने लगते हैं .

मीडिया के स्वयं ही निर्णायक होने के इस दौर में राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता को ध्यान में रखकर पत्रकारिता की मूल अवधारणा को प्रतिष्ठापित करने की आवश्यकता है . राष्ट्रवादी पत्रकारिता की जिम्मेदारी वर्तमान परिदृश्य में और भी बढ़ जाती है , जब एक लोकतान्त्रिक देश में राष्ट्रविरोधी नारे लगे जाते है , जब एक नई सरकार के आते ही देश का कथित बुद्धिजीवी वर्ग भारत में असहिष्णुता दर्ज कराने लगता है . इस प्रकार पत्रकरिता में राष्ट्र चेतना के मूल्यों को स्थापित करके आम जन को इन सभी तरह के दुष्प्रचारों से अवगत कराया जा सकता है .

हिंदी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति पर किए गए एक अध्ययन में सामने आया कि देश के प्रमुख मीडिया संस्थान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति आज भी उदासीन बने हुए है . कुछ मीडिया संस्थान तो हमेशा विरोध में ही स्वर बुलंद किए रहते है . स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब पत्रकरिता में पूंजी का दखल बढ़ने लगा तो पत्रकारीय मूल्यों का तेज़ी से ह्रास भी हुआ. इसी कारण मुख्य धारा की पत्रकरिता में भी विकृतिया आने लगी. इसी दौरान देश में अज्नितिक और सामाजिक द्झंचो में तेज़ी से परिवर्तन हो रहा था. स्वाभाविक था की इससे पत्रकरिता कैसे अछूती रहती?

पत्रकरिता राष्ट्र के विभिन्न घटकों के मध्य संवाद स्थापित करता है . स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीय पत्रकारिता का नवसृजन प्रस्फुटित हुआ. इसी दौरान धीरे-धीरे उसका विकास होता रहा. उस समय में जब तक पत्रकरिता में पूंजी का दखल नहीं था, पत्रकारिता मूल्य आधारित होती थी. व्यवसायीकरण के इस आधुनिक युग में आज पत्रकरिता भी व्यवसायीकृत हो गई है . उस समय मुख्यधारा की पत्रकारिता ही राष्ट्रवादी पत्रकरिता थी. जब भूमिगत पत्रकारिता के माध्यम से भी ख़बरें जन-सामान्य तक पहुँचती थी. आज के आधुनिक युग में पत्रकारिता में पूंजी के निवेश के बाद पत्रकारिता में नियंत्रण कुछ रसिकदार लोगों के पास चली गई है .

समय बीतता गया और टेलीविजन का दौर आया, इसने पत्रकारिता को नई ऊचाईयां प्रदान की, वहीं दूसरी तरफ पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्यों से भी भटक गई. एक वक्त ऐसा आया टेलीविजन की दुनिया का, जब सनसनीखेज पत्रकारिता का दौर चल गया. जो आज भी जारी है . लेकिन संचार क्रांति के बाद वेब पत्रकारिता के दौर में पत्रकरिता का स्वरुप भी करवट ले रहा है . धीरे-धीरे राष्ट्रवादी पत्रकारिता का उदय हो रहा है . आज-कल पत्रकरिता में राष्ट्र-चेतना की ख़बरों को पर्याप्त जगह दी जा रही है .

किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए राष्ट्र के विभिन्न घटक उत्तरदाई होते है . आज-कल मीडिया संस्थान को राष्ट्र की एकता, अखंडता और संप्रभुता पर प्रश्न चिन्ह नहीं खड़ा किया जाना चाहिए. समाज में, देश में, राष्ट्र में राष्ट्र चेतना का विस्तार किया जाना चाहिए. इसके लिए मीडिया संस्थानों को नए-नए रचनात्मक प्रयास किए जाने चाहिए. इन प्रयासों के माध्यम से राष्ट्रवाद की भावना को प्रसारित किया जाना चाहिए.

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