लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

Posted On by &filed under कविता.


manजब कुछ अनचाहा सा,

अप्रत्याशित सा घट जाता है,

जिसकी कल्पना भी न की हो,

साथ चलते चलते लोग,

टकरा जाते हैं।

जो दिखता है,

या दिखाया जाता है,

वो हमेशा सच नहीं होता।

सच पर्दे मे छुपाया जाता है।

थोड़ा सा वो ग़लत थे,

थोड़ा सा हम ग़लत होंगे,

ये भाव कहीं खोजाता है।

कुछ लोग दरार को खोदकर,

खाई बना देते हैं,

जिसे भरना,

हर बीतते दिन के साथ,

कठिन होता जाता है।

माला का धागा टूट जाता है,

मोती बिखर जाते हैं।

आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला,

चलता है, समाप्त हो जाता है,

पूरा सच अधूरा ही रह जाता है।

सामने नहीं आता है,

अटकलों का बाज़ार लगता है,

मीडिया ख़रीदार बन जाता है।

आम  आदमी जहाँ था,

वही खड़ा रह जाता है।

Leave a Reply

1 Comment on "हम जीत कर भी हार गये!"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Jitendra Mathur
Guest

बिलकुल ठीक कहा बीनाजी आपने । यह एक बारीक सच है जिसे लोग देखकर और जानकर भी समझना नहीं चाहते ।

जितेन्द्र माथुर

wpDiscuz