लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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विषय विस्तार के लिए दो प्रसंगों का उल्लेख करना समीचीन होगा। प्रथम हिंदी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन का इंटरनेट की संपर्क करने और ज्ञान प्रदाता के रूप में असीम क्षमताओं को देखते हुए सार्वजनिक रूप से ‘नेटवर्किंग जी’ का अभिवादन करना और द्वितीय प्रसंग है जूलियन असांजे की रहस्योद्धाटन करनेवाली वेबसाइट ‘विकीलीक्स’ का समाज के प्रत्येक क्षेत्र एवं हर तबके पर होनेवाला प्रभाव। यह दोनों प्रसंग वेब पत्रकारिता की संभावनाएं, जो कि निश्चित ही मनुष्य की सोच (Beyond the thinking) से आगे है, की धारणा को पुष्टि प्रदान करती है।

अमिताभ बच्चन ने देश, समाज और विश्व को भी उस समय से देखा, समझा और जिया है, जब तकनीक अपने प्रारंभिक रूप में जरूर थीं, मगर इनका प्रभाव मानवीय जीवन और समाज पर प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता था और वह व्यक्ति डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू (WWW) यानी वर्ल्ड वाईड वेब से प्रभावित होकर कहता है कि -‘नेटवर्किंग जी! मैं तुम्हें सलाम करता हूं। आदमी ने तुम्हें ईजाद किया और यह मनुष्यता ही है जो तुम्हें गति देती है। दुनिया में ऐसी जगह और कहां है जहां हम इस तरह मिल सकें। आप हमें विवश करते हैं अपनी राय और टिप्पणी देने के लिए भी। और सबसे बड़ी बात है कि आप गलत निर्णयों और मूल्यों को बदलने की ताकत रखते हैं। उनके आगे के शब्द ‘वेब पत्रकारिता के लिए निश्चित ही उत्साहवर्धक होंगे।’ यह नेटवर्किंग इतनी बड़ी शक्ति है कि इसकी कल्पना भी कभी की नहीं गई थी। यह एक अनंत संपदा है। इससे प्रेम और भाईचारा परवान चढ़ता है। यह संबंधों को प्रगाढ़ता देता है, इंसानियत को और भी सजग बनाता है।” मुझे लगता है कि पत्रकारिता के उद्देश्य भी अमिताभ के इन्हीं शब्दों में तलाशे जा सकते हैं। अमिताभ महज फिल्मी महानायक नहीं हैं, वे टि्वटर पर लाखों चाहने वालों का जिस तरह मार्गदर्शन करते हैं, हौसला अफजाई करते हैं, उससे साबित होता है कि वे लोकजीवन के, नई पीढ़ी के भी महानायक हैं।

नई दुनिया समाचार पत्र के इंटरनेट संस्करण ‘वेब दुनिया’ को प्रथम औपचारिक प्रकाशन माना जा सकता है वेब पत्रकारिता का। लगभग 15 वर्ष पहले जब यह प्रारंभ किया था, तब इसे कोई खास तव्वजों नहीं दी गई थी और ‘एक विशेष वर्ग’ को लक्षित करके ही इसे निकाला जा रहा है, ऐसा भी बोला गया। बोलने के कारण भी साफ थे, कंप्यूटर और इंटरनेट गिने-चुने थे, इनका उपयोग भी काफी महंगा था और उपयोगकर्ता भी कम ही थे। दरअसल इंटरनेट को जन-जन तक पहुंचाने और उसकी गति बढ़ाने के लिए जो अधोसंरचना थी, हमारा देश उसके लिए संसाधन बढ़ाने में जुटा हुआ था, लेकिन बीते वर्षों में भारत में इंटरनेट और कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं की वृध्दि अप्रत्याशित रूप से हुई है और दूरस्थ अंचलों में सामान्य जन तक इसकी पहुंच बनी है। इसी संदर्भ में, उल्लेखनीय है कि चैन्नई के ‘द हिंदु’ समाचार पत्र ने अपने इंटरनेट संस्करण की शुरूआत 1995 में की थी और ऐसा करनेवाला यह देश का पहला समाचार पत्र था। अब आप देखिए ‘द हिंदु’ समाचार-पत्र ने सर्वप्रथम अपने स्वयं के हवाई जहाज पदार्पित किए थे, समाचार-पत्रों को देश के सभी शहरों में एक साथ पहुंचाने के लिए। जब कंप्यूटर के माध्यम से सभी शहरों के संस्मरण एक साथ निकालना संभव नहीं था। लेकिन वायुयान की भी अपनी सीमाएं होती है, मगर इंटरनेट के बारे में आपका क्या ख्याल है? इसके माध्यम से प्रसारित होने वाली सामग्री को आप किन सीमाओं में बांधोगे? तो समय और दूरी के बंधन से मुक्ति दिलाकर वेब ने हमें जीते जी ज्ञान और सूचना रूपी मोक्ष प्रदान किया कि नहीं? जूलियन असांजे ने वेब-पत्रकारिता की इसी असीमित शक्ति को भांपकर बिना किसी पते ठिकाने के ‘विकीलीकस’ को आधार बनाया देश-दुनिया में सूचनाएं प्रसारित करने के लिए जूलियन के इस कार्य को नैतिकता और अनैतिकता की कसौटी पर परखना हमारा विषय नहीं है, मगर उन्होंने जो माध्यम अपनाया है, उस पर हमें जरूर गौर करना होगा। क्या सिर्फ एक समाचार-पत्र, एक रेडियो चैनल, एक टेलीविजन चैनल या मीडिया के अन्य किसी परंपरागत माध्यम से लगातार ऐसा करना संभव होता? इस प्रश्न के उत्तर हममें से अधिकांश की यही राय होती कि वह सतत् रखने में असफल होते और इतने कम समय में सवाल ही नहीं होता। तकनीक के सहारे तो वह जगह बदलकर अपने अभियान को जारी रखे हुए हैं। यद्यपि कई देश की सरकारों ने ‘विकीलीक्स’ द्वारा प्रसारित सूचनाओं को रोकने के लिए भी तकनीकी का ही सहारा लिया है, मगर इसमें भी वह आंशिक रूप से ही सफल हुए हैं।

बीच में हम वेब-पत्रकारिता की चुनौतियों पर भी बात करते हैं। जब हमारे देश में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का आगमन हुआ तो मीडिया-विशेषज्ञों के मध्य बहस का सबसे चर्चित विषय यही होता था कि क्या इससे प्रिंट मीडिया की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। इस विषय पर समाचार-पत्रों, विश्वविद्यालयों, गोष्ठियों में बहुतेरा विचार-विमर्श हुआ, जिसमें से यह भी निकल कर आया कि जब सूचनाएं तत्काल और एक बटन दबाने पर ही उपलब्ध होगीं, तो बासी खबरों के लिए समाचार-पत्र पढ़ने की जहमत कौन उठाएगा? पक्ष-विपक्ष में इसी से मिलते-जुलते प्रश्न निकलते थे। कुछ समय पश्चात् ही इस प्रश्न का जवाब सभी लोगों को मिल गया और वर्तमान में तो यह प्रश्न ही विलोपित हो गया, क्योंकि इसकी प्रासंगिकता ही नहीं रही। प्रासंगिकता क्यों नहीं रही यह प्रश्न जरूर विचारणीय हो सकता है, मगर प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जरूर प्रासंगिक बने हुए हैं और अपनी-अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। वेब-पत्रकारिता के पोर्टल द्वारा ‘वैकल्पिक मीडिया’ शब्द का प्रयोग करने का मैं पक्षधर नहीं हूं, बल्कि मैं इसे ‘पूरक मीडिया’ कहना ज्यादा श्रेयस्कर समझता हूं। वह इसलिए क्योंकि आप किस मीडिया का पूर्णरूपेण विकल्प बनना चाहते हैं? क्या वास्तविकता में ऐसा होना संभव है? हां, ‘सहयोगी’ शब्द का प्रयोग मुझ जैसी सोच वालों को और ज्यादा खुशी दे सकता है। आज लगभग सभी छोटे-बड़े समाचार-पत्रों, टेलीविजन चैनलों की सूचनाएं प्रसारित करने के अपने ‘वेब-पोर्टल’ हैं, ई-पेपर संस्करण हैं। इनको संभालने के लिए कुछ लोगों की नियुक्ति भी कर रखी है, मगर सामग्री (content) थोड़े-बहुत फेरबदल के साथ वही रहती है, जो उनके सभी संस्करणों में दिख जाएगी। आज वेब-पोर्टल की सनसनीखेज एवं महत्वपूर्ण खबरें समाचार-पत्रों एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रमुखता से प्रसारित होती हैं और इसका विपरीत यानी कि समाचार-पत्रों एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खबरें वेब-पोर्टल में भी स्थान पाती है। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चयन का विस्तार उपलब्ध है, व्यक्ति अपनी पसंद से उनका आनंद लेता है। यह तो मनुष्य का स्वाभाविक गुण है कि वह सभी उपलब्ध-अनुपलब्ध वस्तुओं का स्वाद लेना चाहता है, उन्हें कम से कम एक बार जरूर चखना चाहता है, तो फिर मीडिया पर भी यही सिध्दांत लागू होगा। आज उनके पास मीडिया के कई प्रकार उपलब्ध हैं, उन्हें सभी प्रकारों का मजा लेने दो। वह समाचार-पत्र पढ़ने के बाद दोपहर में अपने कार्यस्थल पर पोर्टल देखें और सायं का टेलीविजन में सूचनाओं का आनंद ले। दिक्कत कहां है? तो फिर क्या वेब-पत्रकारिता के लिए कोई चुनौती ही नहीं बची? सर्वप्रथम वेब-पत्रकारिता का चुनौती तो स्वयं से ही है। तमाम पोर्टलों के बीच विश्वसनीयता बनाए रखने की चुनौती, पत्रकारित शब्द की गरिमा बनाए रखने की चुनौती, अपनी असीमित क्षमताओं का दुरूपयोग न करने की चुनौती। आप उन सूचनाओं विचारों को प्रसारित-प्रचारित करें जो समाज-हित में हों। बिना प्रमाण के कोई सूचना न दें। ऐसे कई मूलभूत सिध्दांत हैं, जिनका लिखना आवश्यक नहीं मगर एक जिम्मेदार नागरिक खासकर पत्रकार उन्हें बखूबी समझता है, अत: वेब-पत्रकारिता के पोर्टल का संचालन एक जिम्मेदार पत्रकार के हाथ में होना अनिवार्य है।

भारत में बहुत कम व्यक्तियों द्वारा इंटरनेट-उपयोगी (Net User) होना भी वेब-पत्रकारिता के विस्तार के लिए एक बड़ी चुनौती है। जिस देश में साक्षरता का प्रतिशत बढ़ाने के लिए सरकारी और गैर सरकारी संगठन जुटे हुए हैं, उस देश में कंप्यूटर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना निश्चित ही एक बड़ा कार्य है। मगर इसमें भी सुधार आ रहा है, मगर गंभीर प्रयासों की अभी भी जरूरत है।

आंकड़ों के हिसाब से देखें तो 1998 में सिर्फ 48 समाचार-पत्रों के इंटरनेट संस्करण थे, जबकि रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपरर्स फॉर इंडिया के कार्यालय में उस समय पंजीकृत समाचार-पत्रों की संख्या 4719 थी। इन 48 इंटरनेट संस्करणों को अगर हम भाषाई-वर्गीकरण में बांटे तो स्थिति इस प्रकार होगी-अंग्रेजी 19 (338), हिंदी 5 (2,118), मलयालम 5 (209), गुजराती 4 (99), बंगाली 3 (93), कन्नड़ 3 (279), तमिल 3 (341), तेलगु 3 (126), उर्दू 2 (495) तथा मराठी 1 (283) कोष्ठक के अंदर कुल प्रकाशन की संख्या तथा बाहर इंटरनेट संस्करणों की संख्या दी है। यह सर्वेक्षण पुणे विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्री किरण ठाकुर ने प्रस्तुत किया था, जिसमें उन्होंने असमी, मणिपुरी, पंजाबी, उड़िया, संस्कृत, सिंधी तथा शेष भारतीय भाषाओं के आंकड़े शामिल नहीं किए थे। 1998 के मुकाबले आज की स्थिति वेब-पत्रकारिता की सुदृढ़ता को स्वत: ही बयान करती है। सभी प्रमुख साप्ताहिक एवं प्रतिदिन प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्र, स्थापित पत्रिकाएं, टेलीविजन चैनल्स के वेब-संस्करण ही ऑनलाइन समाचार वितरित नहीं करते हैं, बल्कि कई समाचार-पोर्टल एमएसएन ढेराेंं ऐस नाम भी इसमें शामिल हैं। आप इस क्षेत्र का विस्तार तो देखिए, क्लिक करते ही सूचनाएं पटल पर हाजिर हैं। अब यदि यह सूचनाएं अधकचरी और भ्रमित करनेवाली हैं तो आपका स्वविवेक ही इनसे आपको बचा सकता है।

लेकिन हिंदुस्तान में वेब-पत्रकारिता की प्रसारित-सामग्री (content) को अधिकांश मीडिया विशेषज्ञ गंभीर एवं संतुलित श्रेणी में रखते हैं। इस संबंध में इंटरनेट के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करनेवाले पत्रकार रमेश मेनन कहते हैं कि वेब-पत्रकारिता ऐसी ताजी हवा के झोकें की तरह है, जो हमे भारतीय टेलीविजन पर प्रसारित होनेवाले समाचारों के पागलपन से बचाकर तरोताजा रखती है। श्री मेनन आगे लिखते हैं कि अधिकांश टेलीविजन चैनल तथाकथित ‘ब्रेकिंग न्यूज’ के प्रोमो में भूत, तंत्र, मंत्र, सर्प आदि की खबरें इस अंदाज में प्रस्तुत करते हैं कि सामान्य जन को छोड़िए, पढ़े-पढ़ाए समझदार लोग भी टकटकी लगाकर देखते हैं और भ्रमित होकर समाज में विभिन्न प्रकार की अफवाहें फेलाने का काम नि:संकोच करते हैं। टेलीविजन चैनल्स तो यह कार्य ‘टीआरपी’ के दौड़ में बने रहने के लिए करते हैं, मगर इन सब कार्यों में पत्रकारिता के सिध्दांत और नैतिकता का जो नुकसान करते हैं, उसकी भरपाई कौन करेगा? भरपाई करने के इस समाज हितैषी कार्य में वेब-पत्रकारिता एक पहल करती दिखाई दे रही है। वह बताते हैं कि वेब पर खबर ‘बोल्ड’ होती है, यह खबर त्वरित होती है, इसकी अपनी स्वतंत्र पहचान होती है, खोजपरक होने के साथ-साथ त्वरित संवाद (interactive) करती है। कुल मिलाकर वर्तमान में खबरों के मारा-मारी युग में वेब खबरें सुकुन के साथ संतुष्टि प्रदान करती है। वेब-पत्रकारिता ने बीड़ा उठाया है पत्रकारिता में सकारात्मक परिवर्तन का। आज का पत्रकार भी नई-नई तकनीक से युक्त होकर पाठकों को ज्ञानवर्धक सामग्री मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत कर रहे हैं और पाठक मनवांछित ग्रहण कर त्वरित टिप्पणी भी दे रहे हैं। पाठक वेब-पत्रकारिता के माध्यम से प्रसारित खबरों से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है और देश-विदेश के भिन्न-भिन्न विषय-विशेषज्ञों के विचारों से एक जगह बैठकर, एक ही स्क्रीन पर परिचित होता रहता है।

आलोच्य विषय में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी, क्योंकि वेब-पत्रकारिता से जुड़े व्यक्तियों को अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है। वह शनै:-शनै: ही इस क्षेत्र में व्याप्त चुनौतियों से निपटकर वेब-पत्रकारिता की संभावनाओं को बलवती कर पाएंगे। परन्तु यह तय है कि वर्तमान और भविष्य दोनों सुनहरे हैं, हां लेकिन इसे अपनी गरिमा का ख्याल रखना होगा। क्योंकि सिध्दांतों के साथ गरिमा बनाए रखने से लोकतंत्र और सामाजिक ढांचे का मजबूती प्रदान होगी, इससे पत्रकारिता के धर्म का पालन स्वत: ही होगा, अन्ततोगत्वा भला सबका होगा। तो वेब के रथ पर सवार होकर पत्रकारिता का ध्वज संभालने के इच्छुक गणमान्य सारथी और सवारी दोनों आप ही हैं, ध्वज को भी हाथ से न छूटने दीजिए, जिससे पताका लहराती रहे और युध्द की मारा-मारी में अपनी जगह बनाते हुए, पड़ाव-दर-पड़ाव तय करते हुए, मंजिल को अपने समीप लाइए।

संपर्क : 307, विज्ञान नगर (राजेंद्र नगर), इन्दौर-452012

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