लेखक परिचय

तिलक राज रेलन

तिलक राज रेलन

फिल्‍म उद्योग में मनोज कुमार, कविता में दिनकर, वातस्‍विक जीवन में भगत सिंह एवं आध्‍यात्मिक जीवन में कृष्‍ण से प्रेरणा ग्रहण करनेवाले तिलकजी ‘युगदर्पण’ के संपादक हैं। समसामयिक विषयों पर उनकी लेखनी निरंतर चलती रहती है।

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[हो सकता है मेरे आलेख का पूर्वार्ध विषयांतरण लगे किन्तु देश की दशा व दिशा सहित, दुष्टता की पराकाष्ठा व परिस्थिति की विकरालता की पृष्ठ भूमि की गहराई जानने के लिए आवश्यक है -तिलक ]

सर्वोच्चा प्राथमिकता मुख्य विषय से पूर्व इसकी पृष्ठ भूमि जानना आवश्यक है! सबसे पहले वर्तमान सरकारी एवं गैर सरकारी सांस्कृतिक मंचो, फिल्म, पत्रकरिता की भूमिका की सार्थकता का भारतीयता के परिप्रेक्ष्य में मंथन करते हैं !

भूमिका: यूनान मिस्र रोमा सब मिट गए जहाँ से;

कुछ बात है कि अब तक बाकि निशान हमारा !

यह मूल मंत्र उस समय हमारे रक्त प्रवाह को संचारित करता था; जब मैकाले के सुझाव के अनुरूप ब्रिटिश शासन की हिलती नीव को मजबूत बनाने के कुचक्र के रूप में हमारी श्रेष्ठ शिक्षा प्रणाली के समानान्तर चर्च के कान्वेंट स्कूल बने व इतिहास को दूषित कर हमारे समाज को दुर्बल बनाने के कुचक्र आरम्भ हो चुके थे! तब हमारे देश भक्तो ने इस मन्त्र से देश भक्ति के उत्तर द्वारा, समाज को चेतना प्रदान की थी! हमारी श्रेष्ठ सभ्यता व संस्कृति, आदर्शो व परमपराओं, ज्ञान विज्ञान व अध्यात्म ने ही हमें विश्व गुरु बनाया था!

इन सब बातों को भुला कर, पश्चिम की जिस अपसंस्कृति को मैकाले लाना चाहता था, उसे स्थापित करनेहेतु आजादी के पश्चात हमारे सरकारी गैर सरकारी मंचो के माध्यम भारतीय संस्कृति के विरोधियों (शत्रुओं ने ) हमारे लोक तंत्र व उसके द्वारा प्रदत अधिकारों का जम कर दुरूपयोग किया! तथा शब्दों व नियमों की मूल भावना के विपरीत तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करते ६० वर्षो में इस स्वर्ग को नर्क बनाने का मानो बीड़ा उठाया हो!

सांस्कृतिक मंचो पर मनोरंजन के नाम पर अपसंस्कृति ने सारी सीमाएं लाँघ कर अश्लीलता का रूप ले लिया! फिल्मों में मनोज कुमार की देश भक्ति, रामानंद सागर की धार्मिकता व राजश्री प्रा. की पारिवारिक कहानी कास्थान २५-३० वर्षो से जिस कूड़ेदान ने ले लिया है उसने तो देश के ग़ली गाँव तक ही गंदगी फैलाई थी किन्तु १० वर्षो से मीडिया ने उसे घर की चारदीवारी में प्रवेश करा के उसकी व्यापकता को सुदृद बना दिया है! इसी परिवेश ने सारा परिदृश्य बदल कर रख दिया है! परिणाम हमारे सामने है! किन्तु कुछ समझ रहे हैं कुछ दिग्भ्रमित है!

जिस देश में कभी रावण ने मात्र अपहरण किया था उस नैतिक अपराध ने उसके पूरे वंश का नाश कर दिया! इतना ही नहीं युगों युगों तक रामलीला के माध्यम से समाज को चेताया जाता रहा; इस अपराध का यह परिणाम है! लाखो वर्षो तक समाज का नैतिक स्तर उठाया रखने में सफल रहे!

मात्र ६ दशक में हमने समाज का स्तर यह बना दिया कि आज ग़ली ग़ली में रावण से १००० गुना अधिक उससे घातक रावण पैदा कर दिए! जिनके कृत्रित्व पर रावण भी शरमा जाए! विडंबना यह देखिये यह सब कुछ कर के भी निर्दोष कहलाते हैं!

अध्यात्मिक व नैतिक संबल ने हमारे शोर्य पराक्रम की पताका को सहस्त्र वर्ष के निरंतर संघर्ष काल में जिस प्रखरता से संभाला उससे भारत प्रेमी और भारतीयता आज भी गौरवान्वित होती है! पराधीनता के समय स्वाधीनता के जिस स्वरूप की कल्पना हमारे स्वाधीनता आन्दोलन में इस रूप में की गयी थी कि हम अपने स्वत्व, स्वाभिमान की रक्षा तथा राष्ट्रनिर्माण संवर्धन को विदेशी शासन में करने में कठिनाई पा रहे थे उसके लिए जब अपनी धरती अपना अम्बर तो फिर शासन क्यों पराया! इसके लिए, समाज को देखने वाली आँख जिस किशोरावस्था में खुलती है उस आयु में बलिदानी क्रांति वीरो ने देश पर जीवन पुष्प चढ़ा कर स्वतंत्रता का मूल्य चुकाया था!

उन श्रेष्ठ परम्पराओं को ध्वंस्त किया गया! धर्म निरपेक्षता की आड़ में शर्मनिरपेक्षता द्वारा जिस मैकालेवादी व मार्क्सवादी सक्रियता को विदेशी शक्तिओं से आर्धिक पौषण के साथ सता के मूक व कभी कभी सक्रिय समर्थन ने खुला अवसर प्रदान किया है! प्रदूषण फ़ैलाने के सहभागी हैं!

प्रथम प्रधान मंत्री नेहरु जी को जब कहा गया आप के एक मंत्री के भ्रष्ट आचरण की हम शिकायत ले कर आये हैं तो उन्होंने यह कहकर टाल दिया कि देश का पैसा देश में ही है! वहां से बोया भ्रष्टाचार का बीज आज वटवृक्ष बन करनित नए नए आयाम के साथ नए नए रूप में विपरीत कीर्तिमान स्थापित कर रहा है! आतंक इस देश में अपनी जड़ी इतनी जमा चुका व जमा रहा है कि उसे मिटाने के लिए अब लगता है कि सरकार नहीं स्वयं भगवान को अवतार लेना होगा! लोकतंत्र के चारो स्तम्भ एक एक करके धवंस्त हो चुके हैं!

फिर भी हमें यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है हमारा यह लोकतंत्रता व संविधान विश्व का सबसे बड़ा व श्रेष्ठ है! जबकि इस श्रेष्ट संविधान में 6 दशक में संविधान संशोधन 9 दशक पूरे करने जा रहा है जो जनहित में नहीं सताधिशों के सता हित में किये गए! लोकतंत्र के प्रति यह अलाप ही उनके अपने दुष्कृत्यो को छुपाने में सहायता करता है!

राज्य व्यवस्था की लोकतंत्रीय आकृति के चारो स्तंभों की चूले हिलने के अतिरिक्त समाज व्यवस्था को भी ध्वस्त करने की कसम खा कर शर्मनिर्पेक्षों ने सता से समाज के नियमों पर अपने विषाक्त नियम थोपने में सफलता पाई है! इसकी एक लम्बी सूचि व विवरण है जो कि उचित अवसर पर रखूँगा !

इस प्रकार राज्य व्यवस्था व समाज व्यवस्था को धवंस्त कर भारतीय संस्कारो परम्पराओं आदर्शो मान्यताओं को कलंकित कर, मात्र 6 दशक में वह कर दिखाया जो ब्रिटिश राज में मैकाले न कर पाया! इसमें विदेशी कुचक्रो को पूरा करने में सक्रिय भूमिका सत्ता सहित पूरी व्यवस्था के चारो सतम्भो की है!

उक्त शर्मनिरपेक्ष व्यवस्था पर रची एक कविता “शर्मनिरपेक्षता” अंतरताने पर रखी तो “शर्मनिरपेक्षता” शब्द कई मित्रों में प्रचलित हो गया! प्रस्तुत है : “शर्मनिरपेक्षता”

कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!

जो तिरंगा है देश का मेरे, जिसको हमने स्वयं बनाया था;

हिन्दू हित की कटौती करने को, 3 रंगों से वो सजाया था;

जिसकी रक्षा को प्राणों से बड़ा मान, सेना दे देती बलिदान;

उस झण्डे को जलाते जो, और करते हों उसका अपमान;

शर्मनिरपेक्ष बने वोटों के कारण, साथ ऐसों का दिया करते हैं;

मानवता का दम भरते हैं, क्यों फिर भी शर्म नहीं आती?

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष….

कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!

वो देश को आग लगाते हैं, हम उनपे खज़ाना लुटाते हैं;

वो खून की नदियाँ बहाते हैं, हम उन्हें बचाने आते हैं;

वो सेना पर गुर्राते हैं, हम सेना को अपराधी बताते हैं;

वो स्वर्ग को नरक बनाते हैं, हम उनका स्वर्ग बसाते हैं;

उनके अपराधों की सजा को,रोक क़े हम दिखलाते हैं;

अपने इस देश द्रोह पर भी, हमको है शर्म नहीं आती!

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष…

कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!

इन आतंकी व जिहादों पर हम गाँधी के बन्दर बन जाते;

कोई इन पर आँच नहीं आए, हम खून का रंग हैं बतलाते;

(सबके खून का रंग लाल है इनको मत मारो)

अपराधी इन्हें बताने पर, अपराधी का कोई धर्म नहीं होता;

रंग यदि आतंक का है, भगवा रंग बताने में हमको संकोच नहीं होता;

अपराधी को मासूम बताके, राष्ट्र भक्तों को अपराधी;

अपने ऐसे दुष्कर्मों पर, क्यों शर्म नहीं मुझको आती;

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष….

कारनामे घृणित हों कितने भी, शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!

47 में उसने जो माँगा वह देकर भी, अब क्या देना बाकि है?

देश के सब संसाधन पर उनका अधिकार, अब भी बाकि है;

टेक्स हमसे लेकर हज उनको करवाते, धर्म यात्रा टेक्स अब भी बाकि है;

पूरे देश के खून से पाला जिस कश्मीर को 60 वर्ष;

थाली में सजा कर उनको अर्पित करना अब भी बाकि है;

फिर भी मैं देश भक्त हूँ, यह कहते शर्म मुझको मगर नहीं आती!

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष…

कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!

यह तो काले कारनामों का,एक बिंदु ही है दिखलाया;

शर्मनिरपेक्षता के नाम पर कैसे है देश को भरमाया?

यह बतलाना अभी शेष है, अभी हमने कहाँ है बतलाया?

हमारा राष्ट्र वाद और वसुधैव कुटुम्बकम एक ही थे;

फिर ये सेकुलरवाद का मुखौटा क्यों है बनवाया?

क्या है चालबाजी, यह अब भी तुमको समझ नहीं आती ?

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष…

कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !

मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!

शर्म मुझको तभी नहीं आती !!

वह मीडिया जो समाज की आँख व मुख होना था; फिल्म के रुप में 25- 30 वर्ष, मीडिया के रूप में 10 वर्ष एवं अन्य सांस्कृतिक मंचो व बुद्धिभोगियो के रूप में आजादी के पूर्व से ही समाज को छलते रहे हैं तथा भ्रमित कर स्वार्थ साधते रहे हैं! पत्रकारिता व्यवसाय नहीं एक मिशन है-युगदर्पण

इसमें इन मंचो व मीडिया को चलाने वाले ढांचे में प्रयुक्त अथाह साधन सम्पन्नता एक बहुत बड़ा कारक हो सकता है! अत विकल्प एक ऐसा साधन जहाँ आर्थिक पक्ष की सक्रियता कम हो, वही उपयुक्त होगा!

इसी विकल्प को हम वेब पत्रकारिता का नाम दे सकते हैं तथा प्रिंट में यही विकल्प देने का प्रयास मिशन के रूप में देने का प्रयास 10 वर्ष से युग दर्पण के नाम से किया जा रहा है!

विविधतापूर्ण सप्त्गुणयुक्त सार्थक पत्रकारिता को पवित्र अभियान रूप में 10 वर्ष पूर्व शुन्य से प्रारंभ किया गया साधनविहीन प्रयास! युग दर्पण आरम्भ करते समय स्थापित पत्रकारिता के बदलते नकरातमक व घातक रूप पर हमारे विचारो को 10 वर्ष पशचात मीडिया की स्वीकारोक्ति मिली! मीडिया का नकरात्मक पक्ष नाडीया जैसी घटनाओ के प्रकट होने पर स्वयं मीडिया व समाज में चर्चा का केंद्र बनता है!

इस सफलता व कुछ शीर्ष लोगो में व्यक्तिगत छवि ही हमारी मात्र उपलब्धि रही! साधनों की कमी के कारण विस्तार की गति धीमी रही! तब गत 6 माह में अंतर ताने पर 20 ब्लॉग, विविध विषयों पर बनाने तथा बाद में ऑरकुट व फसबूक पर प्रतिदिन घंटो समय लगाकर काम करते हुए पाया इसमें व्यापकता व गतिशिलता भी हैं तथा विशेष आर्थिक संसाधन जुटाने की आवश्कता भी नहीं! केवल पाठको के लिये समाचार पत्र से खर्चीला अवश्य है; जो ग्रामीण परिवेश के पाठकों तक पहुचने में बाधक हो सकता है! अत: युग दर्पण के साथ वेब पत्रकारिता दोनों का ही महत्व रेखांकित किया जा सकता है!

अब प्रश्न उठता हैं वेब पत्रकारिता क्या है व इसकी चुनोतिया एवम सम्भावनाएँ क्या हैं ?

मीडिया संचार माध्यमो में मुद्रण (पत्र पत्रिका) व प्रसारण (रेडियो टीवी) के पश्चात अंतरताने पर वेब पत्रकारिता का अविर्भाव होने से पूर्व इ मेल से सन्देश प्रेषण १५-२० वर्षो से है! पहले विदेशो व अंग्रजी से चली वेब पत्रकारिता में मुद्रित पत्र पत्रिकाओं ने अपने वेब अंक देने तथा कुछ ने साहित्य के विविध आयामों पर चर्चा के रूप में उपस्थिति दिखाई! वेब पृष्ठों के अतिरिक्त समाचारों के लिए वेब पत्रकारिता का प्रचलन होने पर मुद्रण व प्रसारण मीडिया के बड़े घरानों ने भी अंतरताने पर अपने इ संस्करण आरम्भ कर दिये!

जो समाचार पहले प्रकाशन व प्रसारण की निश्चित अवधि के पश्चात हम तक पहुँचता था, अब दृश्य, श्रव्य तथा लिखित रूप में अंतरताने पर पूरे विश्व में प्रसारित हो जाता है! टीवी चैनल(दूरदर्शन) ने भी अंतरताने का उपभोग कर घटना की दृश्यावली को त्वरित प्रस्र्तुत करने में सफलता पाई है !

अंतरताने के महासमुद्र में टापू की भांति लाखो लोगो ने अपने वेब पृष्ठ बनाए होते हैं, जिसका परस्पर सम्पर्क बना रहता है! अपने अपने समूह बनाकर सूचना खंडो की आदान प्रदान किससे कितना करना हैं, यह हम स्वय निर्धारित करते है! जिसके लिये कुछ निर्धारित पथ निर्माण किये गए हैं ! जैसे विदेश यात्रा के लिये किसी समुद्री या वायु मार्ग पर जहाज में स्थान लेना हो, वेब पृष्ठ के लिए उसी प्रकार “डाट काम” या “डोट को इन” जैसे यान में स्थान चाहिए! वेब पृष्ठ रूपी उस पुस्तक में क्या लिखा हैं यह पुस्तक खोलकर ही देखा जा सकता है ! जिसके लिए जी मेल याहू हाटमेल के अपने अपने संस्करण हैं! हम अपनी सामग्री विभिन्न समूह के मित्रो के लिये विभिन्न थैलिओं (पॅकेज) में भरके रखते हैं!

सुरक्षा कारणों से अपने सामान के ताले की कुंजी सबकी भिन्न रहती हैं, इस प्रकार कुछ प्रकाशन प्रसारण समूह ने अपने फोंट ऐसे बना लिए कि जब उनके प्रकाशित संस्करण को कोई दूसरा नकल करना चाहें, तो न कर सकें; किन्तु इससे वह सूचना उनके समूह में ही सिमट कर ही रह गई! उसका व्याप बढ़ाने में कठिनाई आ गई! ऐसे कई प्रकार के भिन्न फोंट होने से सर्वभोमिकता नहीं बन पाई! अंग्रेजी की भांति हिंदी में भी सर्वभोमिक फोंट सूचना की ग्राह्यता के लिए आवश्यक है!

इसके अतिरिक्त आय का साधन नहीं होने से सूचनाओं का नियमितीकरण ()नहीं हो पाता तथा निरन्तरता नहीं बन पाती! विज्ञापन व विपणन प्रबंधन की भी आवश्यकता है !

कुछ बड़े गूगल, याहू जैसे समूह तकनीकी अन्वेषण पर व्यापक कार्य कर रहें हैं विकिपीडिया का अपना विशिष्ठ एवं वर्गिकृत ज्ञान कोष व शब्द कोष है! जो विदेश व अंग्रजी आधारित होने के कारण विविध भाषाओं के नाम पर जो कुछ देता है, भारतीयता की संवेदना व सोच से विहीन होने के कारण कई बार अर्थ का कुअर्थ कर अनर्थ कर देता है ! सामहिक, प्रशिक्षित, समर्पित व सम्वेदनशील प्रयास हो! क्योंकि इस सारे कार्य के लिय मशीनी उपकरणों पर निर्भरता में सम्वेदना कहीं छूट जाती है! विदेशी भाषा, हमारी भाषा संस्कृति व सम्वेदना के स्तर तक नहीं पहुँच पाती ! अत हिंदी अथवा संसकृत को आधार बना कर सभी भारतीय भाषाओँ में विकिपीडिया, गूगल, याहू व अन्य सभी जैसे समानांतर प्रयास स्वदेशी स्तर पर करने होंगे! कई तत्व वायरस बनाते है तो कई उसका तोड़ भी बनाते है !

सूचना को रचनात्मक व शिक्षाप्रद बनाने के प्रयासों को इन तकनीकी कारणों के अतिरिक्त, छला ने जा सके इसके लिए २ प्रकार की सावधानी चाहिए! एक तो मीडिया पर मैकालेवादी सोच के प्रभुत्व ने उसका चरित्र विकृत कर दिया, जो व्यवसायिकता को राष्ट्रद्रोह की सीमा तक जाकर समाचार, साहित्य व संस्कृति को प्रदूषित कर रहा है! उससे मुख्यधारा के मीडिया को भ्रष्ट्राचार का कैंसर हो चुका है! दूसरा कुछ विदेशी व राष्ट्र द्रोही तत्व छद्म नामो से हमारे बीच कार्य करते हुए भ्रमित करने का प्रयास करते है! यह भी हर बात को बिगाड़ने में लगे रहते है! यह दोनों ही प्रकार के तत्व इन उपलब्धियों को घातक शस्त्र की भांति असामाजिक कार्यो में उपयोग कर मानवता के लिए संकट उत्पन्न कर सकते हैं व करते रहते है!

इन समस्यों का समाधान कर सके तो सूचना तकनीक का समाज व मानवता के हित में व्यापक उपयोग किया जा सकता है !इसमें कोई संदेह व मतभेद नहीं !

समुद्र में कोई नया टापू, शितिज़ में कोई नया ग्रह खोजे तो मानवता के विकास में उपयोग होने से पूर्व दानवी प्रवृति के तत्व वहां पहुँच जाते है! हमारा सचेत न रहना ही उनकी सफलता है तथा सतर्क, संगठित व सुव्यवस्थित तथा समर्पित प्रयास, वसुधैव कुटुम्बकम के दृष्टान्त के अंतर्गत ही विश्व कल्यानार्थ किये जाये तो सफलता अवश्म्भावी है!

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3 Comments on "वेब पत्रकारिता : चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ- तिलक राज रेलन"

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Asif mohammad
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@ अंतरताने के महासमुद्र में टापू की भांति लाखों लोगों ने अपने वेब पृष्ठ बनाए होते हैं!..जिसके लिये कुछ निर्धारित पथ निर्माण किये गए हैं! जैसे विदेश यात्रा के लिये किसी समुद्री या वायु मार्ग पर जहाज में स्थान लेना हो…सुरक्षा कारणों से अपने सामान के ताले की कुंजी सबकी भिन्न रहती हैं, ऐसे कई प्रकार के भिन्न फोंट होने से सर्वभोमिकता नहीं बन पाई!..विकिपीडिया का अपना विशिष्ठ एवं वर्गिकृत ज्ञान कोष व शब्द कोष है,..!कई तत्व वायरस बनाते है तो कई उसका तोड़ भी बनाते है! उससे मुख्यधारा के मीडिया को भ्रष्ट्राचार का कैंसर हो चुका है! दूसरा कुछ… Read more »
Asif mohammad
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अंतरताने के महासमुद्र में टापू की भांति लाखों लोगों ने अपने वेब पृष्ठ बनाए होते हैं!..जिसके लिये कुछ निर्धारित पथ निर्माण किये गए हैं! जैसे विदेश यात्रा के लिये किसी समुद्री या वायु मार्ग पर जहाज में स्थान लेना हो…सुरक्षा कारणों से अपने सामान के ताले की कुंजी सबकी भिन्न रहती हैं, ऐसे कई प्रकार के भिन्न फोंट होने से सर्वभोमिकता नहीं बन पाई!..विकिपीडिया का अपना विशिष्ठ एवं वर्गिकृत ज्ञान कोष व शब्द कोष है,..!कई तत्व वायरस बनाते है तो कई उसका तोड़ भी बनाते है! उससे मुख्यधारा के मीडिया को भ्रष्ट्राचार का कैंसर हो चुका है! दूसरा कुछ विदेशी… Read more »
Asif mohammad
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Is it complete article ? can we read missing part of this ? how, where ?

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