लेखक परिचय

मनोज कुमार

मनोज कुमार

सन् उन्नीस सौ पैंसठ के अक्टूबर माह की सात तारीख को छत्तीसगढ़ के रायपुर में जन्म। शिक्षा रायपुर में। वर्ष 1981 में पत्रकारिता का आरंभ देशबन्धु से जहां वर्ष 1994 तक बने रहे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समवेत शिखर मंे सहायक संपादक 1996 तक। इसके बाद स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य। वर्ष 2005-06 में मध्यप्रदेश शासन के वन्या प्रकाशन में बच्चों की मासिक पत्रिका समझ झरोखा में मानसेवी संपादक, यहीं देश के पहले जनजातीय समुदाय पर एकाग्र पाक्षिक आलेख सेवा वन्या संदर्भ का संयोजन। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रकारिता विवि वर्धा के साथ ही अनेक स्थानों पर लगातार अतिथि व्याख्यान। पत्रकारिता में साक्षात्कार विधा पर साक्षात्कार शीर्षक से पहली किताब मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 1995 में पहला संस्करण एवं 2006 में द्वितीय संस्करण। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता शोध परियोजना के अन्तर्गत फेलोशिप और बाद मे पुस्तकाकार में प्रकाशन। हॉल ही में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा संचालित आठ सामुदायिक रेडियो के राज्य समन्यक पद से मुक्त.

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मनोज कुमार
सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का यह मुद्दा उन लोगों का है जिनके पेट भरे हुए हैं। जो दिन-प्रतिदिन टेलीविजन के पर्दे पर या अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पर पक्ष लेते हैं दिखते हैं अथवा देश और सरकार को कोसते हैं। ये वही आमिर खान हैं जिन्होंने कभी भोपाल में कहा था कि उनकी मां उनसे कहती हैं कि बेटा, चार पैसा कमा ले। बेचारे गरीब आमिर को इस बार उनकी पत्नी कहती हैं कि देश असहिष्णु हो चला है, चलो देश छोड़ देते हैं। आमिर अपनी निजी बातें सार्वजनिक मंच से शेयर करते हैं. आमिर का यह विलाप देश की चिंता में नहीं है, यह अपने गिरते हुए फिल्मी बाजार को सम्हालने की कोशिश हैं। देश आमिर से पूछना चाहता है कि आमिर तुम स्टार नहीं होते तो यह बातें किस सार्वजनिक मंच से कहने का अवसर मिलता? कौन तुम्हें बोलने का मौका देता और मिल भी जाता तो कौन सुनता? चलो, आमिर कुछ देर के लिए मान भी लेते हैं कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे से तुम जख्मी हो और पत्नी की बात देशवासियों को अपना परिवार मानकर उनसे शेयर कर रहे हो। अब सवाल यह है कि देश में लगभग हर राज्य में किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो क्या एक देशभक्त आमिर का कर्तव्य नहीं है कि वह किसानों के बीच जाए और उनके दर्द बांटे, देशवासियों से किसानों की पीड़ा शेयर करे और उनकी मदद के लिए कोई उपाय तलाशे। यह शायद तुम नहीं करोगे. तुम अपनी ड्यूटी और राईट्स भूल जाते हो क्योंकि किसानों की पीड़ा हरने का काम तो सरकार और तंत्र का है, एक सेलिबे्रटी का तो है नहीं।
आमिर एक बात और बता दूं। मेरे और मुझ जैसे लाखों लोग इस देश में होंगे जिनके घरों में मां, पत्नी, बहन, भाभी, चाची और मौसी के साथ साथ बच्चे भी कई मुद्दों पर बात करते हैं लेकिन इनके दिमाग में गलती से देश तो क्या शहर छोडऩे का ख्याल भी नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि जहां हम सब लोग रहते हैं, वहां परेशानी नहीं है लेकिन परेशानी से भागने के बजाय हम उस समस्या का हल ढूंढऩा जानते हैं। हमें अपना राइट्स भी पता है और ड्यूटी भी क्योंकि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हम अपनी निजी बातें सार्वजनिक रूप से शेयर कर अपना और समाज का मजाक नहीं बनाते हैं। आमिर ध्यान रखो, यह भारत है और भारत देश कभी सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का विलाप नहीं करता है। इस देश ने 1947 से लेकर 2015 के इस दौर तक अनेक बदलाव देखे हैं लेकिन कभी किसी ने देश छोडऩे की बात नहीं की। इस देश का आम आदमी देश तो दूर, अपना शहर और अपना मोहल्ला तक नहीं छोड़ना चाहता है. पुश्तैनी मकान की परम्परा इस बात को साबित करती है.

aamir shahrukhआमिर के इस विलाप को हवा देते हुए एक दूसरा सेलिब्रिटी शाहरूख खान इस बयान के खिलाफ अपना बयान दे डालता है। इसका चरित्र भी आमिर से अलग नहीं है। उम्रदराज होते इन अभिनेताओं को पता है कि जल्द ही बाजार इन्हें खारिज करने जा रहा है तब यह इस तरह की बातें बोल कर खुद का मार्केट बनाये रखने की जुगत में लग जाते हैं। सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता इनके लिए कोई मुद्दा नहीं है। इनका मुद्दा है करोड़ों की लागत से बनी फिल्में पीटे नहीं और करोड़ों कमा ले जाएं। शाहरूख जो सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता की बात कर रहे हैं, वो याद कर लें कि खेल के मैदान में कितने सहिष्णु रहे हैं ? दरअसल इनका काम है लोगों का मनोरंजन करना, वही करें और देश की चिंता छोड़ दे. चिंता करना भी है तो एक भारतीय बनकर करें, हीरो बनकर नहीं.

अनुपम खेर को भी आप इस लाइन से बाहर नहीं कर सकते हैं क्योंकि इस फिल्मी बाजार का वो भी हिस्सा है। वो भी चाहता है कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे के बहाने कुछ नाम पक्का कर लिया जाए तो कभी न कभी राजदरबार में प्रवेश का अवसर मिले। यह और बात है कि वो मीडिया से बात करते समय इससे सहजता से ना कर जाते हे. बावजूद अचानक से वे संवेदनशील हो जाते हैं और उन्हें अपनी ड्यूटी और राईट्स दोनों समझ आने लगता है. सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता पर जुलूस-जलसा निकालने लगते हैं. जिन कश्मीरी पंडितो की पीड़ा का वे इजहार कर रहे है, दुख जता रहे है, क्या कभी उनके बारे में कभी कुछ किया? कभी उनके हक़ के लिए लड़ाई लड़ी? शायद नहीं। केवल टेलीविज़न के परदे पर ही उनका दुख दिखता है. काश! सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता से बाहर आकर देशवासियों के पक्ष में अनुपम खड़े हो पाते। हम उम्मीद कर रहे है कि “सारांश ” का वह बूढ़ा बाप परदे से बाहर आकर अपने चरित्र को साकार करेगा।

सेलिब्रेटियों की सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता पर चिंता महज मगरमच्छ के आंसू हैं। मेरी सहमति उनसे भी है जो लगातार चीख-चीख कर असहिष्णुता का विलाप कर रहे है. एक आम आदमी का लगातार मंहगाई से टूटने को क्या कहेंगे? अपराधों से जो डरा हुआ है, उसकी चिंता कौन करेगा? आप सब बुद्दिजीवी हैं, आप सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता को समझते है लेकिन मेरे जैसा आम आदमी इन बातों को बहुत नहीं समझता है. मेरा मानना है कि आप सब हमारे बीच आये, सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के बारे में हमें बताये। आम आदमी जानना चाहेगा कि मंहगाई, बेरोजगारी, अपराध, असुरक्षा से बड़ा असहिष्णुता का कोन सा मुद्दा है। उसकी रूचि यह भी जानने में होगी कि जो लोग असहिष्णुता के मुद्दे पर मोर्चे पर है, क्या उन लोगो को आम आदमी के मुद्दे पर सड़क पर नहीं आना चाहिए? भूखा पेट केवल रोटी ना मिलने पर असहिष्णु होता है, भरा पेट इस बात को क्या जाने और समझे। यह वो लोग है जिन्होंने कभी रेल की जनरल बोगी में सफर नहीं किया और ना ही सरकारी अस्पताल में इलाज कराया। इन्हे तो इस बात का भी इल्म नहीं कि सरकारी स्कूल बच्चों को पढ़ाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं.

दुर्भाग्य की बात है कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का विलाप करने वाले लोगों ने अपने ही एक और हीरा जैसा कलाकार नाना पाटेकर से कुछ नहीं सीखा? नाना महाराष्ट्र के किसानों के बीच गये और अखबार या टेलीविजन में खुद को स्टार बताने के बजाय उनके बीच जाकर अपनी हैसियत से ज्यादा मदद कर आये। ऐसे और भी लोग है, जो सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता को लेकर बेकरार नहीं हैं बल्कि अपनी जवाबदारी समझ कर मदद में जुटे हुए है. क्या दिल पर हाथ रखकर सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे पर देश को बदनाम करने वाले आमिर, अनुपम और शाहरूख बता सकते हैं कि ऐसा कोई पराक्रम उन्होंने कभी किया हो? शायद नहीं।

माफ करना मेरे वो दोस्त, जिनकी मोहब्बत आमिर, अनुपम और शाहरूख से होगी, उन्हें यह बात नागवार गुजरे लेकिन मुझे पता है कि आप मेरी बातों से सहमत ना हों लेकिन असहमति की गुंजाईश ही मैंने कहां छोड़ी है। सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का प्राथमिक तौर पर मुद्दा बेमानी लगता है क्योंकि जिस देश में दाल के भाव 2सौ रुपये किलो बिक रहा हो, प्याज और आलू खरीदने की आम आदमी की ताकत जवाब दे रही हो, वहां सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का मुद्दा केवल सियासी और बौद्धिक जुगाली है। एकबारगी यह मान भी लिया जाए कि सरकार का व्यवहार असहिष्णु है तो उसके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए लेकिन इसके पहले आम आदमी को उसकी हैसियत जीने का हक नहीं मिलना चाहिए? यह देश भारत है जिसने अंग्रेजों को भगा कर दम लिया, उसके लिये असहिष्णुता कोई बडा मुद्दा नहीं है. यह भी नहीं भूलना चाहिये कि इसी देश ने आपतकाल को सिरे से खारिज कर दिया था. जो लोग असहिष्णु है, उन्हें चुनाव में जनता बाहर का दरवाज़ा दिखा देती है.

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1 Comment on "सहिष्णुता-असहिष्णुता का विलाप"

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Himwant
Guest

किसी बेवकूफ ने कुछ कह दिया तो उस पर इतनी अधिक प्रतिकृया देना हमारी असहिष्णुता को दर्शाता है. ए.आर.रहमान का फतवा भी असहिष्णुता को ही दर्शाता है. सलमान खान के विरुद्ध ओवैशी का बयान भी असहिष्णुता को ही दर्शाता है. आमिर की बात को लोगो ने कुछ ज्यादा ही दिल से लगा लिया है. ठीक नहीं. इतना कुछ लिखा या कहा जाना आवश्यक न था.

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