लेखक परिचय

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर धानापुर-चन्दौली (उत्तर प्रदेश) के निवासी हैं। इन्होने समाजशास्त्र में परास्नातक के साथ पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। स्वतंत्र पत्रकार , स्तम्भकार व युवा साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। पिछले पन्द्रह सालों से पत्रकारिता एवं रचना धर्मीता से जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अखबारों , पत्रिकाओं और वेब पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिखते रहते हैं। Mobile- 8081110808 email- mafsarpathan@gmail.com

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हम भारतीय ईसवी सन के प्रथम दिन एक जनवरी को अज्ञानतावस नये वर्ष के रूप में बड़े धूम-धाम से मनाते हैं। जिसका न तो कोई खगोलीय प्रतिष्ठा है, न प्राकृतिक अवस्था और न ही ऐतिहासिक पृष्ठभूमी। जनवरी के सर्द मौसम में हाड कपाती ठंड व रक्त संचार जमा कर मनुष्य की गतिशीलता को रोक देता है। पेड़ पौधों का विकास रूक जाता है तथा उनके पत्ते पीले पड़ जाते हैं। इस मौसम में भगवान भाष्कर का प्रकाश भी मध्म पड़ने लगता है। कोहरे के धुंध में सब कुछ धुधला दिखता है तथा जल के श्रोत बर्फ का चादर ओढ़ लेते हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू ने इसी सब को देखकर नवम्बर 1952 में परमाणु वैज्ञानिक मेघनाथ साहा की अध्यक्षता में पंचांग सुधार समिति का गठन किया था। इस समिति में एस. सी. बनर्जी, गोरख प्रसाद, वकील के एल दफतरी, पत्रकार जे. एस. करंडिकर व गणितज्ञय आर. वी. वैद्य थें। समिति ने सन 1955 में सर्व सम्मती से विक्रमी संवत पंचांग को स्वीकार करने की सिफारिश की। मगर श्री नेहरू ने ग्रेगेरियन कैलेंडर को ही सरकारी कामकाज के लिए उयुक्त मानकर 22 मार्च 1957 को ग्रेगेरियन कैलेंडर को राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में स्वीकार किया।

भारतीय नव वर्ष मनाने के लिए सबसे उपयुक्त विक्रम संवती का प्रथम दिन है क्योंकि प्रकृति इस समय शीतलता एवं ग्रीष्म की आतपता का मध्य बिन्दु होता है। जलवायु समशीतोष्ण रहती है। बसंत के आगमन के साथ ही पतझड़ की कटु स्मृति को भुलाकर नूतन किसलय एवं पुष्पों के युक्त पादप वृन्द इस समय प्रकृति का अद्भुत श्रृंगार करते दिखते हैं। पशु-पक्षि, कीट-पतंग, स्थावर-जंगम सभी प्राणी नई आशा के साथ उत्साहपूर्वक अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त दिखाई पड़ते हैं। चारों तरफ सब कुछ नया-नया दिखई पड़ता है। मनुष्य की प्रवृत्ती उस आनन्द के साथ जुड़ी हुई है जो बारिश की प्रथम फुहार के स्पर्श पर, प्रथम पल्लव के जन्म पर, नव प्रभात के स्वागत में पक्षी के प्रथम गान या फिर नवजात शिशु का संसार में प्रथम आगमन के किलकारी से होता है।

चैत्र मासि जगद् ब्रहमा ससर्ज प्रथमे अहनि

शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदय सति।

ब्रहम पुराण में वर्णित इस श्लोक के मुताबिक चैत्र मास के प्रथम दिन, प्रथम सूर्योदय पर ब्रहमाजी ने सृष्टि की रचना एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष पहले इसी दिन से विक्रमी संवत की शुरूवात की थी। ऐसा माना जाता हैं कि सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने की याद में 2068 साल पहले इसी दिन राज्य स्थापित कर विक्रमी संवत की शुरूवात की। मर्यादा पुरूषोततम राम के जन्मदिन रामनवमी से नौ दिन पहले मनने वाले उत्सव भक्ति व शक्ति के नौ दिन अर्थात नवरात्र का प्रथम दिन तथा लंका विजयोपरान्त आयोध्या लौटे राम का राज्याभिषेक इसी दिन किया गया। युगाब्द संवत्सर का प्रारम्भिक दिन, 5113 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ। यही नहीं शालिवाहन संवत्सर का प्रारम्भ दिवस विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हुणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु इसी दिन का चुनाव किया। उत्तर भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, आन्ध्र प्रदेश में उगादी, महाराष्ट में गुड़ी पड़वा, सिंधु प्रांत में चेती चांद के रूप में नव वर्ष बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। इसी दिन को दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना दिवस के रूप में चुना। भारतीय परम्परा व शास्त्र के अनुसार विक्रम संवत का पहला दिन ही भारतीय नव वर्ष के रूप में मनाया जाना उचित व प्रसंगिक है।

एम. अफसर खां सागर

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