लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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आजाद भारत में जनता को दो महत्वपूर्ण अधिकार दिया गया है, एक है वोट देने का, और दूसरा है कर देने का। वोट देकर वह अपना जनसेवक चुनता है और कर देकर उस जनसेवक के भोग विलास के मार्ग प्रशस्त करती है। आज आम आदमी को एक समय खाना खाने के पूरे पैसे न हों पर देश के नीति निर्धारक जनसेवकों के ठाठ देखते ही बनते हैं। लक झक चमचमाती मंहगी कारें, आलीशान अट्टालिकाएं, परिजनों के लिए विलासिता की चीजें और न जाने क्या क्या। इतना ही नहीं अपने सरकारी आवासों को भी ये आलीशान फाईव स्टार के कमरों जैसा बनाने से नहीं चूकते हैं। सवाल यह उठता है कि जब केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्लूडी) के पास इतना बजट है ही नहीं तो आखिर ये अपने अरमानों को परवान कैसे चढा पाते हैं।

देखा जाए तो केंद्रीय मंत्रियों के आवासों की देखरेख और संवारने की महती जवाबदारी अपने जर्जर कंधों पर उठाए सीपीडब्लूडी का बजट इतना है कि वह मंत्रियों की फरमाईशों के सामने उंट के मुंह में जीरे की कहावत को चरितार्थ करता है। सीपीडब्लूडी के पास मंत्रियों के आवास को चमकाने के लिए महज 75 हजार से ढाई लाख रूपए तक का बजट होता है। मकानों को निखारने, संवारने के लिए सीपीडब्लूडी के पास 75 हजार, टाईप 5 से टाईप 7 तक की कोठियों के लिए डेढ लाख तो टाईप आठ के लिए ढाई लाख रूपए का बजट प्रावधान है। अगर कोई सूचना के अधिकार में मंत्रियों के आवासों पर हुए व्यय की जानकारी ले ले तो भारत के महालेखा परीक्षक भी दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हो जाएंगे।

दरअसल जनसेवक जो मंत्री बन जाते हैं उनके विभाग के अंतर्गत आने वाले सार्वजनिक उपक्रम (पीयूसी) और विभाग में काम करने वाले ठेकेदारों द्वारा मंत्रियों के सरकारी आवास को चमकाने का काम किया जाता है। विडम्बना तो देखिए कि मंत्री के आवास पर हुए व्यय के बारे में कोई पूछ परख ही नहीं करता। अगर एक ईंट भी जोडी गई है, और वह सरकारी पैसे से नहीं जुडी है तो क्या उसके बारे में संबंधित मंत्री ने अपनी आयकर विवरण्ाी में इसका उल्लेख किया है। जाहिर है नहीं ही किया है। यह बात भी उतनी ही सच है जितनी कि दिन और रात कि मंत्रियों के आवासों को चमकाने के लिए पीयूसी द्वारा लाखों व्यय किए जाते हैं, यही कारण है कि मंत्रीपद से हटने के बाद भी जनसेवक अपने उस सरकारी आवास का मोह नहीं छोड पाते हैं, और महीनों वहां जमे ही रहते हैं।

जैसे ही आम चुनाव होते हैं और नए मंत्री चुनकर आते हैं, तब उनकी पत्नियों के हिसाब से मंत्री आवास का इंटीरियर डेकोरेशन किया जाता है। कमरों में वास्तु के हिसाब से दरवाजे, शयन कक्ष में फेरबदल कुल मिलाकर नए कमरे बनाना, पुराने को ठीक करना, रंग रोगन, प्लास्टर ऑफ पेरिस का काम, मंहगे रंग रोगन, फर्नीचर आदि को बाजारू कीमत पर देखा जाए तो एक आवास में 75 हजार से ढाई लाख रूपए का बजट बहुत ही कम है।

एकडों में फैले मंत्रियों के आवासों में उनके बंग्ला कार्यालय में भी मनचाहा परिवर्तन करवाया जाता है। उनके बंग्ला कार्यालय में पर्सनल स्टाफ के बैठने के स्थान को देखकर आम सरकारी बाबू रश्क ही कर सकता है। साथ ही ”शौकीन जनसेवकों” द्वारा तो अपने आवासों में मंहगी विदेशी लान ग्रास के साथ ही साथ लेंड स्केपिंग भी करवाई जाती है। इतना हीं नहीं मंत्रालयों में मंत्री कक्षों को सजाने संवारने में भी लाखों करोडों रूपए फूंक दिए जाते हैं। जनसेवकों का मानना होगा कि जब भी उनके निर्वाचन क्षेत्र से कोई मिलने आए तो वह वहां की साज सज्जा देख दांतों तले उंगली ही दबा ले। यही कारण है कि मंत्रियों के कार्यालयों में विजिटर्स रूम भी मंत्रीकक्ष से कम नहीं होते हैं।

बहुत ही साधारण सी बात है कि जब मंत्री द्वारा अपने आवास में लाखों खर्च कर उसे अपने अनुरूप बनाया जाता है तो फिर वे उसे मंत्रीपद से हटने के बाद जल्दी कैसे छोड दें। यही वजह उनके आवास में प्रवेश के दौरान आती है। जब मंत्री को आवास आवंटित होता है तब पुराना मंत्री उसे छोडता नहीं। बाद में साल छ: माह बीतने पर जब आवास खाली होता है, तब नए मंत्री के हिसाब से उसकी साज सज्जा में साल छ: महीना और लग जाता है, इस तरह इतने समय मंत्री कहां रहता है। जाहिर है फाईव स्टार होटल में। उस होटल का भोगमान कौन भुगतता है। पैसा पेडों पर तो नहीं लगता है, पैसा वही मतदाता करों के माध्यम से ही चुकाता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि ”सादा जीवन उच्च विचार” का नारा लगाकर देश के ”जनसेवक” किस तरह ”विलासिता पूर्ण जीवन और निम्न विचारों” को अंगीकार किए हुए हैं।

आज इस बात पर चिंतन करने की महती जरूरत है कि देश के नीति निर्धारक जनसेवक आखिर अपनी रियाया के साथ किस तरह का न्याय कर उसे क्या दे रहे हैं। इतिहास में इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि मुगल शासकों में सबसे अधिक लोकप्रिय रहे सम्राट अकबर ने भी अनेकों बार भेष बदलकर अपनी रियाया के हाल चाल जाने और उनके दुखदर्द दूर किए। आजाद भारत में जनता किस कदर कराह रही है, और जनता की सेवा के लिए तत्पर जनसेवकों द्वारा अपने स्वार्थों को कितनी संजीदगी, तन्मयता और मुस्तैदी के साथ पूरा किया जा रहा है यह बात देखते ही बनती है। कहने को तो राजनैतिक दलों द्वारा ”रामराज” और ”सुराज” लाने का दावा किया जाता है, पर जमीनी हकीकत इससे उलट कुछ और बयां करती नजर आती है।

-लिमटी खरे

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1 Comment on "जनता के पैसे का तबियत से दुरूपयोग करते हैं जनसेवक"

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Ravindra Nath Yadav,
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jamhuriyat vo shay hai, jahan bando ko tola nahi gina jata jhai.

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