लेखक परिचय

मोतीलाल

मोतीलाल

जन्म - 08.12.1962 शिक्षा - बीए. राँची विश्वविद्यालय । संप्रति - भारतीय रेल सेवा में कार्यरत । प्रकाशन - देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं लगभग 200 कविताएँ प्रकाशित यथा - गगनांचल, भाषा, साक्ष्य, मधुमति, अक्षरपर्व, तेवर, संदर्श, संवेद, अभिनव कदम, अलाव, आशय, पाठ, प्रसंग, बया, देशज, अक्षरा, साक्षात्कार, प्रेरणा, लोकमत, राजस्थान पत्रिका, हिन्दुस्तान, प्रभातखबर, नवज्योति, जनसत्ता, भास्कर आदि । मराठी में कुछ कविताएँ अनुदित । इप्टा से जुड़ाव । संपर्क - विद्युत लोको शेड, बंडामुंडा राउरकेला - 770032 ओडिशा

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poetry

उनके खुलने से जो पर्दा सरका था
उनकी आंखों से सबसे पहले
घुप्प अंधेरा डोल रहा था आंखों में
और यहीं समझी थी जीवन का पाठ ।

इस बीच खुलते गये सांसों की डोर
और उसने देखा अपने मम्मी-पापा को
विडियो गेम्स के संग
देखा उसने कमरे की आधुनिकता
अलग-अलग खंबों मे बंटा
कमरे सा ही परिवार के सदस्य ।

उसने कोशिश की
कि कभी भोजन न सही नाश्ता ही सही
सभी एक साथ जमीन पर बैठ खाया जाए
और चखा जाये रिश्तों का स्वाद ।

पर उसने नहीं जाना मम्मी या पापा
कितने सरके हैं बुढ़ापे की ओर
या भाई कालेज पहुंचा या नहीं
और वह खुद जब देखती है आईने को
कुछ काली तिरछी रेखायें
आईने के पार गुजर जाती हैं
जिनके साथ नहीं बंधा रहता
पापा का दुलार, मम्मी की ममता
या भाई का स्नेह और खुद
क्वांरी चिता में स्वाह हो जाती है।

पर सुनो
कुछ जलती है उनकी आंखों में
लोहे गलने का गंध सा
इसलिए नहीं चाहती डोली में बैठना
चाहती है बुनना कुछ सपने
अपने और उन भुतहा कमरों के बीच
और चाहती है बांटना
कुछ पल
अपनों के बीच स्नेह।

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