लेखक परिचय

अरूण पाण्डेय

अरूण पाण्डेय

मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले श्री अरुण पाण्डेय अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ‘दैनिक आज’ अखबार से की उसके बाद ‘यूनाइटेड भारत’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘देशबंधु’, ‘दैनिक जागरण’, ‘हरियाणा हरिटेज’ व ‘सच कहूँ’ जैसे तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय अखबारों में बतौर संवाददाता व समाचार संपादक काम किया। वर्तमान में प्रवक्ता.कॉम में सम्पादन का कार्य देख रहे हैं।

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67 सीटें जीतकर इतिहास बनाने वाली दिल्ली सरकार में सबसे ज्यादा पीडित लेबर है और यह वही लेबर है जिन्होंने झुग्गी में प्रवास के दौरान अपने अच्छे सपनों को लेकर वोट दिया था लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद न तो कोई शौचालय उनकी झुग्गी में बना और ही कोई एैसा काम हुआ जिससे यह लगे कि लेबर का जीवन बिताने वाले इन लोगों को कुछ मिला हैं । वह कल भी फटे हाल थे और आज भी फटे हाल है। अब उन्हें समझ में आने लगा है कि बिना खर्च किये कुछ नही होने वाला , खास तौर पर निचले स्तर पर उनके लिये काम करने वाले उपश्रमायुक्त के कार्यालयों में।
उनके काम हो सभी कैसे, जहां काम नही है वहां सरकार ने कई अधिकारी लगा रखे है और जहां काम है वहां एक अधिकारी को तीन जिलों का काम दे रखा है। लंबी लाइनों को देखकर उस लेबर कार्यालय के सरकारी कर्मचारी छुट्टी पर चले जाते है और तारीख लेने का काम भी बेचारे लेबरों को खुद करना पडता है। चाहे वह कर्मपुरा हो , नईदिल्ली हो या फिर पूसा अमूनन सभी कार्यालयों की स्थित एक सी है। अशोक विहार में कुछ काम होता भी है तो वहां अधिकारी नही है एक ही कोर्ट के पास सभी तरह के मामले है जिसके कारण लेबरों को दो महीने से पहले की तारीख नही मिलती, आदेश मिलना तो दूर की बात है।
अब सबसे पहले बात करते है अशोक विहार की , दिल्ली शाप स्टैलिश एक्ट के तहत एक प्रार्थनापत्र लेबर इंस्पेक्टर के पास प्रस्तुत हुआ जिस पर आदेश हुआ कि उनके labour officesसहयोगी इस बाद को देखेगें । आप डेढ महीने बाद आ जायें , तारीख दे दी गयी । डेढ महीने बाद जब वादी आया तो पता चला कि आपके पत्रावली को फला अधिकारी को भेज दिया गया है जिसका रजिस्टर नम्बर यह है । वादी उस अधिकारी के पास गया तो पता चला कि अभी तक उसे प्रार्थनापत्र को देखा ही नही है । फिर देखने के बाद पुनः डेढ महीने की तारीख इसलिये दे दी जाती है कि नोटिस भेजकर प्रतिवादी को बुलाते है। इसी तरह कई बार जब तारीख मिली और मामला शिफर रहा तो उसने अधिकारी से कहा कि आप बतायें कि क्या करें । अधिकारी ने एक यूनियन वाले एक वकील को बुलाया और कहा कि आप इनसे बात कर ले और कोर्ट में मामला दायर करें , वहीं से कुछ हो पायेगा।
इसके बाद उस वादी ने मामला उपश्रमायुक्त की कोर्ट में दाखिल किया तो नोटिस के लिये दो महीने की तारीख दे दी गयी । उसके बाद जब वह दो महीने बीतने के बाद आया तो प्रतिवादी भी हाजिर था । उससे पूछा गया कि आप इस वाद में आये है कुछ दस्तावेज लाये है जिससे साबित हो कि आप प्रतिवादी है। उसने उसके लिये समय मांगा और फिर दो महीने की तारीख उसे दस्तावेज दाखिल करने के लिये दे दिये गये और जबाब के लिये कापी भी दे दी गयी । फिर न वह आदमी आया न जबाब । तारीख लगती गयी और मामला शिफर रहा ।अब तक साल भर का समय निकल चुका था । वादी को किसी भी प्रकार से कही से राहत नही थी। वादी को अपनी जायज पगार लेने के लिये साल भर का समय निकल गया किन्तु पैसे नही मिले । अंत में वह अगली तारीख पर नही आ सका और फाइल उसकी गैरमौजूदगी को आधार बनाकर दाखिल दफतर कर दी गयी।
पूसा व कर्मपुरा का मामला इससे अलग है । वहां एक अधिकारी एैसे है जिनके पास तीन जिलों का प्रभार है और वह इस कारण वश सिर्फ एक दिन ही बैठते है। उनके भी काम करने का अलग अंदाज है , साहब आज नही आयेगंे आप तारीख लेकर जायें यह कहते हुए पुकार शुरू होेती है और पहले बारह बजे तक फाइलों पर तारीख देने का काम होता है और कई महीनों तक चलता है । जिन्हें पता है कि बाद में ंआयेगें तो वह अपनी तारीख नही लेेता और बाद में फाइल पेश हो जाती है । तारीख के बाद , बची हुई फाइलों पर कुछ टालने वाले आदेश देकर उनको रफा दफा कर दिया जाता है । लंच के बाद उन फाइलों का नम्बर आत है जिनपर आदेश होता है। इसके पहले दो अधिकारी सारी बात को कर चुके होेते है और लगभग आदेश का सारा खाका बना लिया जाता है सिर्फ अधिकारी की उपस्थित व उसे असली शक्ल देने की बात होती है। इस काम के लिये समय की सीमा तय नही है। वादी कितना दब सकता है और प्रेितवादी कितना दबाया जा सकता है इस पर आदेश को अंेितम रूप दिया जाता है।जिसमें सभी की मिली भगत रहती है।
कुछ और कार्यालयों की और कहानी है वहां लेने व दिलाने का जो तरीका अपनाया जाता है वह और भी हैरान कर देने वाला होता है । लेबर की अपनी कोर्ट में भी उसके वाद को सुनने वाले अधिकारी थाने के दरोगा जैसा व्यवहार करते है। लेकिन सरकार बेखर होकर अपना काम करती रहती है क्योंकि लेबर कुछ कर नही सकता , वह तनख्वाह न मिलने पर अपने परिवार का पेट कैसे पले इस पर घ्यान देता है और अगर कोई लेबर भूले से इस कार्यालय में आ गया तो उसे वहां के अधिकारी यह बात समझाने में तनिक देर नही करते कि वह लेबर की औकात का आदमी है । जिसे भगवान ने काम करने के लिये पैदा किया है।
सवाल यह नही कि लेबरों के साथ क्या हुआ ,सवाल यह है कि इतनी अधिक पगार के बाद क्या सरकार ने इन अधिकारियों को प्रतिवादी से दलाली के लिये रखा है । अगर इनके हाथों में कोई कानूनी अधिकार नही है कि वह प्रतिवादी को पकडने का आदेश जारी कर सके और वादी को उसकी पगार दिला सके तो एैसे विभाग को चलायमान रखने का औचित्य क्या है जिन्होनें गांधी जी के बंदरों के सरीखे कसम खा रखी है। बाल मजदूर इनको दिखते नही है, कम्पनी मालिको में भगवान दिखता है और तो और महिलाओं के उत्पीडन के मसले में यह भूल जाते है कि कोई महिला शौक वश काम नही करती , मजबूरी में करती है , उसकी मजदूरी भी नही दिलाना चाहते।
अब यहां यह बंता देना उचित होगा कि लेबरों के पास फलैट नही होते व किराये के कमरे या झुग्गी झोपडी में रहते है । उनका दर्द पगार न मिलने के बाद क्या होता है यह कारपोरेट की उपज दिल्ली सरकार के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल नही जानते । परिवार तंगहाली में कैसे दिन बिताता है यह बात नही जानते , अगर जानते तो लेबरों को जल्दी से न्याय मिले इसका कोई इंतजाम सोचते , नही तो अब तक की सरकारों व उनके में अंतर क्या है। इस प्रदेश में क्यों लेबरों को ही दो महीने की तारीख मिलती है । कोई अधिकारी व मंत्री यह क्यों नही सोचता कि खानाबदोश जिन्दगी यापन करने वाले लेबर आखिर दो महीने खायेगें क्या ? अगर उनके लिये सबकुछ भगवान भरोसे ही है तो सरकारों में आने वाले उनकी चैखटों पर अपना मुंह दिखाने क्यांे जाते है।

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