लेखक परिचय

प्रतिमा शुक्ला

प्रतिमा शुक्ला

मूलत: लखनऊ से हूं। पत्रकारिता जगत में कार्यरत हूं। कविताएं, जनसरोकार के विषयों पर महिला और बाल कल्याण पर स्वतंत्र लेखन कार्य पिछले कई वर्षों से कर रही हूं। वर्तमान कार्यक्षेत्र नई दिल्ली हैं।

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प्रतिमा शुक्ला

नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु पर आज भी रहस्य बरकरार है। 18 अगस्त 1945 को ताईवान में हुए विमान हादसे में नेता जी की मृत्यु हो गई थी। इस पर बहुत से लोग यकीन नहीं करते हैं। बहुत से लोग ये भी यकीन नहीं करते हैं कि नेता जी फैजाबाद में कई साल तक गुपचुप तरीके से रहने वाले वो साधू थे, जिन्हें गुमनामी बाबा कहा जाता है। लेकिन गुमनामी बाबा की कहानी इतनी उलझी हुई है कि बहुत से लोग उनके नेता जी होने की संभावना से इंकार भी नहीं कर पाते।
फैजाबाद में सरयू नदी के किनारे गुप्तार घाट में गुमनामी बाबा की समाधि है।

18 सितंबर 1985 में गुमनामी बाबा के निधन के बाद यहीं उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस पर गुमनामी बाबा की जन्मतिथि 23 जनवरी 1897 दर्ज है। यानी वो तारीख जब नेता जी का जन्म हुआ। गुमनानी बाबा के अतीत के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। वो कुछ वक्त तक अयोध्या में रहे थे। 1982 से वो फैजाबाद के राम भवन में आकर रहने लगे थे। गुमनामी बाबा को करीब से देखने वाले कहते हैं कि उनकी बहुत सी बातें नेता जी से मिलती-जुलती थीं। गुमनामी बाबा की तस्वीर उन्हें देखने वालों के बयान के आधार पर एक चित्रकार ने बनाई है, लेकिन उन्हें देखने वाले कहते हैं कि वो नेता जी की तरह ही छह फुट के थे।

धारा प्रवाह जर्मन, संस्कृत और बंगाली बोलते थे। उनकी मौत के बाद राम भवन से उनका चश्मा, कई दस्तावेज, खत भी मिले जो गुमनामी बाबा के नेता जी होने के शक को पुख्ता करते हैं। गुमनामी बाबा ही अगर नेता जी थे तो सवाल है कि उनकी मौत पर बने आयोग ये सच क्यों नहीं तलाश सके कि विमान हादसे के बाद भी वो जिंदा थे। नेताजी की मौत की जांच के लिए 1956 और 1977 में दो आयोग बनाए। दोनों आयोग ने कहा कि नेता जी की मौत ताइवान में विमान हादसे में हुई मगर, दोनों आयोग ने ताइवान सरकार से बातचीत नहीं की थी। 1999 में मुखर्जी आयोग का गठन किया गया। मुखर्जी आयोग ने 2005 में ताइवान सरकार से बात की।

ताइवान ने कहा कि 1945 में उनके देश में कोई विमान हादसा नहीं हुआ। सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट खारिज कर दी। मगर, गुमनामी बाबा के बारे में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मुखर्जी ने भी जांच की थी। एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता से बात करते हुए उन्होंने भी ये शक जताया था कि गुमनामी बाबा सुभाष चंद्र बोस हो सकते थे। लेकिन सवाल ये है कि जो शख्स कभी भी अंग्रेजों के सामने नहीं झुका, वो एक छोटे से कस्बे में गुमनाम जिंदगी क्यों बिताएगा। इसीलिए नेता जी के बहुत से रिश्तेदार भी गुमनामी बाबा के बारे में खबरों को सिर्फ कहानी ही मानते हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या नेता जी की मौत के बारे में कोई पांचवा सच कभी सामने आएगा?

नेता जी सुभाष चंद्र बोस के साथ आजादी की लड़ाई में बहुत से लोगों ने काम किया था। ऐसी ही हस्तियों में एक थीं 1922 में नेताजी के संपर्क में आईं क्रांतिकारी लीला रॉय, जिन्हें यकीन था कि नेता जी की मौत विमान हादसे में नहीं हुई। नेता जी की तलाश उन्हें फैजाबाद के आयोध्या तक ले गई थी, जहां गुमनामी बाबा नाम के एक साधू के बारे में चर्चा थी कि वो ही नेता जी सुभाष चंद्र बोस हैं। उनसे मुलाकात के बाद लीला रॉय ने कहा था कि उन्हें यकीन है कि गुमनामी बाबा ही नेता जी हैं।

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