लेखक परिचय

कुन्दन पाण्डेय

कुन्दन पाण्डेय

समसामयिक विषयों से सरोकार रखते-रखते प्रतिक्रिया देने की उत्कंठा से लेखन का सूत्रपात हुआ। गोरखपुर में सामाजिक संस्थाओं के लिए शौकिया रिपोर्टिंग। गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातक के बाद पत्रकारिता को समझने के लिए भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी रा. प. वि. वि. से जनसंचार (मास काम) में परास्नातक किया। माखनलाल में ही परास्नातक करते समय लिखने के जुनून को विस्तार मिला। लिखने की आदत से दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण, दैनिक जागरण भोपाल, पीपुल्स समाचार भोपाल में लेख छपे, इससे लिखते रहने की प्रेरणा मिली। अंतरजाल पर सतत लेखन। लिखने के लिए विषयों का कोई बंधन नहीं है। लेकिन लोकतंत्र, लेखन का प्रिय विषय है। स्वदेश भोपाल, नवभारत रायपुर और नवभारत टाइम्स.कॉम, नई दिल्ली में कार्य।

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कुन्दन पाण्डेय

यदि महात्मा गांधी जिंदा होते और कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करते, तो क्या सरकार उनके साथ भी ऐसा ही करती जैसा अण्णा हजारे के साथ किया गया। बेशक कर सकती थी क्योंकि यह कांग्रेस लाल, बाल, पाल, गांधी, सरदार पटेल या गोविन्द वल्लभ पंत की कांग्रेस नहीं है, बल्कि नेहरु खानदान की जागीर है। यदि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ लाल, बाल, पाल, गांधी, सरदार पटेल या गोविन्द वल्लभ पंत जैसे कांग्रेसी भी अनशन करने की जुर्रत करते तो सरकार उनसे अंग्रेज सरकार से भी बदतर तरीके से निपटती। ये सारी राष्ट्रीय विभूतियां देश की वर्तमान आजादी को शायद तथाकथित आजादी ही कहतीं। क्योंकि इस स्वतंत्र देश में संसद की सर्वोच्चता के नाम पर सरकार क्या लोकपाल नाम से ऐसा कानून भी बना सकती है? जिसके तहत देश में हर काम करने के एवज में घूस लेने की दर तय कर दी जाय। बिल्कुल बना सकती है। क्योंकि सत्ता दबंग, क्रूर, बर्बर, हिंसक, असहिष्णु होती है। लॉर्ड एक्टन ने तो कहा है कि सत्ता सत्ताधारियों को भ्रष्ट बनाती है और पूर्ण सत्ता तो पूर्ण भ्रष्ट बनाती है। यह वही पूर्ण भ्रष्ट सत्ता का आदर्शतम रुप है।

सरकारी लोकपाल कुछ वैसे ही है, जैसे किसी व्यक्ति को उसी के घर में नजरबंद कर दिया जाय और ‘नजरबंदी’ का नाम ‘आजादी या लोकतंत्र या न्याय या कानून व्यवस्था’ कुछ भी रख दिया जाय। नकारा विपक्ष के नाते सरकार बहुत ही अधिक पराक्रमी हो गयी है। सक्षम विपक्ष राष्ट्र की खातिर न सही, कुर्सी की ही खातिर सही, ऐसी सरकार को उखाड़ फेंकने को प्रचंड आन्दोलन खड़ा करता। लेकिन विपक्ष जानता है कि मेरे साथ उतने लोग सोशल नेटवर्किंग साइटों पर भी नहीं आते जितने हजारे के साथ लाठी खाने के लिए सड़कों पर तैयार खड़े हैं। हजारे को युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और लगभग सभी व्यवसाइयों के मिल रहे अपार जन-समर्थन से घबड़ाकर सरकार, लोगों को अपने निर्णयों और उठाये जाने वाले कदमों में उलझाकर आन्दोलन की त्वरा व धार को कुंद करना चाह रही है, जो अब संभव नहीं है।

‘जब किसी से जीता न जा सके, तो उसका चरित्र-हनन करके उसे पराजित करना कूटनीति का अचूक अस्त्र माना जाता है।’ इसी को ध्यान में रखकर केन्द्र सरकार, अण्णा हजारे के चरित्र-हनन करने पर रणनीतिक रूप से काम कर रही है। अनन्य समाजवादी डॉ. लोहिया ने सच ही कहा था कि, “जिंदा कौमे 5 साल तक इंतजार नहीं करती।” परन्तु 42 सालों से लोकपाल की प्रतीक्षा कर रहा भारतीय लोकतंत्र अभी तक जिंदा तो है, किन्तु जीवन जीने के लायक नहीं है।  यदि लोकपाल पर सख्त कानून न बन सका तथा अगले आम चुनाव में प्रमुख मुद्दा नहीं बन सका तो भारतीय लोकतंत्र काले धन रूपी प्रदूषित ऑक्सीजन से ही जिंदा रहेगा।

यह स्पष्ट है कि सरकार ने हजारे के जनसमर्थन को तौलने के लिए ‘ऑफेंस इज द बेस्ट डिफेंस’ के आधार पर अनशन से पहले ही हजारे को गिरफ्तार कर लिया। इससे सरकार ने बिना किसी बड़े खतरे के प्रत्यक्ष रुप से देख लिया कि हजारे को कितना और कैसा जनसमर्थन मिल रहा है। अब सरकार आन्दोलन से निपटने के सारे तरीकों पर रणनीतिक रुप से विचार कर रही होगी। कांग्रेसी केन्द्र सरकार अघोषित रुप से आपातकाल लगाने पर भी सोच रही होगी, आपातकाल लेकिन अघोषित अगर अगले कुछ दिनों तक अण्णा को अनशन-आन्दोलन नहीं करने दिया गया और पूरे देश में धारा 144 लागू करके सड़कों पर लोगों को समूह में एकत्र नहीं होने दिया गया तो यही तो आपातकाल है, भले ही इसे बिना किसी नाम के अमल में लाया जा रहा हो। जैसे ‘ग्रीन हंट’ चिदम्बरम साहब के अनुसार गृह मंत्रालय के किसी सरकारी दस्तावेज में नहीं है, लेकिन व्यवहार में चर्चाएं तो होती ही रहती हैं।

सरकार ने जान बूझ कर अण्णा के आन्दोलन को भोथरा करने के लिए उन्हें सुबह गिरफ्तार किया और शाम को रिहा कर दिया, जिससे आन्दोलनकारियों में असमंजस की स्थिति पैदा हो जाए और वे रणनीतिक रुप से आन्दोलन न चला सके। दरअसल सरकार डर गयी कि यदि दिल्ली में कुछ लाख लोग अचानक संसद को चारों ओर से घेर लें जैसा कि अरब देशों में हो रहा है, तो सरकार पर तुरंत इस्तीफा देने का प्रचंड अदम्य दबाव आ जाएगा। टीम अन्ना ने 17 अगस्त को इंडिया गेट से संसद मार्च करने का आह्वान किया है। यदि कुछ लाख की शांतिप्रिय भीड़ हिंसक होकर चौरीचौरा जैसा कांड कर दे तब तो सरकार और आन्दोलन दोनों के मुंह पर कालिख पुत जाएगी।

सरकार को बिना शर्त हजारे को अनुमति देनी ही पड़ेगी, क्योंकि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि देश के सारे पैरामीलिट्री एवं फोर्स के बहुत अधिक गुना हजारे समर्थक हैं। जहां तक हजारे पर लगाये गये आरोपों का सवाल है तो उसे अलग से कानूनी से साबित करने की जरुरत है। गांधी ने जब अंग्रेजों से कभी अनशन या आन्दोलन करने की अनुमति नहीं ली, तो क्या उन्हीं के देश में, उनके अनुयायियों को शांतिप्रिय अनशन करने की अनुमति लेनी पड़ेगी। हजारे कम से कम अनुमति लेकर अधिसंख्य शर्तों पर राजी हो गए थे। आन्दोलन को दबाकर, सरकार राष्ट्र-पिता का घोर अपमान करेगी।

जब झामुमो रिश्वत की आरोपी सरकार देश में पांच साल पूरा कर सकती तो कोइ आरोपी व्यक्ति भ्रष्टाचार से जंग क्यों नहीं लड़ सकता? खासकर तब जब जनता का अपार समर्थन उसे मिल रहा हो। अप्रैल के अनशन में हजारे भ्रष्ट नहीं थे, तब सरकार ने मांगे मान लीं। अब छल-कपट कर रही है। क्या आन्दोलनकारी महात्मा गांधी ने ऐसे लोकतंत्र के लिए आजादी दिलायी थी जिसमें अनशनों एवं शांतिप्रिय आन्दोलनों को येन-केन-प्रकारेण प्रतिबंधित कर दिया जाता हो?

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