लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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congressडॉ. वेदप्रताप वैदिक
पांच राज्यों के चुनाव-परिणाम आ गए हैं। सबसे पहले यह विचार किया जाए कि इनके अखिल भारतीय अर्थ क्या हैं? भाजपा और कांग्रेस के भविष्य पर इनका प्रभाव क्या होगा? देश की भावी राजनीति की दिशा क्या होगी? जिन पांचों राज्यों में अभी चुनाव हुए हैं, वे दिल्ली से काफी दूर है। पं. बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी ! ये पूर्व और दक्षिण के राज्य हैं। इन राज्यों ने कभी कोई प्रधानमंत्री अभी तक देश को नहीं दिया लेकिन पहली बार शायद ऐसा होगा कि बंगाल और तमिलनाडु की आंखें दिल्ली के सर्वोच्च पद पर गड़ने लगें। ममता और जयललिता ने अपने झंडे अलग फहराए हैं। उन्होंने नीतीश की तरह गठबंधन नहीं किया है। उनकी जीत अपनी है। उन्होंने न तो किसी विचारधारा का नकाब अपने चेहरे पर चढ़ाया है और न ही किसी दिल्ली के दल के दलदल में फंसी हैं। दोनों दुबारा चुनकर आई हैं। जयललिता ने तमिलनाडु की तीन दशकों की परंपरा तोड़ी हैं और ममता ने अपनी इस बार की विजय को नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। तो बताइए, तीन साल बाद होनेवाले संसद के चुनाव में वे अपने आपको नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर क्यों नहीं खड़ा करना चाहेंगी? दोनों देवियां मानती हैं कि यदि भाग्य ने उन्हें मौका दिया तो वे कोई भी जिम्मेदारी संभालने से मना क्यों करेगीं? ये अलग बात है कि भाजपा के विरुद्ध एक अखिल भारतीय वैकल्पिक गठबंधन खड़ा करना बेहद कठिन है। हर प्रांतीय नेता अपने आपको तीस मार खां समझता है। वह किसी अन्य प्रांतीय नेता को अपना नेता कैसे मान लेगा? इसके अलावा दोनों देवियों- दीदी और अम्मा के भाजपा से मधुर संबंध रहे हैं। राज्यों की कोशिश भी होती है कि केंद्र से उनके संबंध सहज रहें।
यों भी इन पांच राज्यों के चुनाव ने भाजपा की छवि चमका दी है। दिल्ली और बिहार ने दहशत बैठा दी थी। मोदी का जादू हवा होता-सा लग रहा था लेकिन अब भाजपा का छत्र कश्मीर से केरल तक और कच्छ से कामरुप तक तन गया है। यह पहली बार हुआ है। मेरे जैसे राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी को बरसों से जो डर था, उसका समाधान हो रहा है। मुझे लगता था कि अगर कांग्रेस खत्म हो गई तो भारत का क्या होगा? भारत के हर प्रांत और जिले को जोड़े रखनेवाली तीन ताकते हैं। फौज, नौकरशाही और कांग्रेस पार्टी। पार्टियां जनता को जोड़े रखती हैं। सोवियत संघ- जैसा अत्यंत विशाल राष्ट्र तब तक जुड़ा रहा, जब तक वहां की कम्युनिस्ट पार्टी जिंदा थी। जैसे ही वह टूटी, सोवियत संघ टूट गया। अब कांग्रेस टूट जाए या बिखर भी जाए तो देश को कुछ चिंता करने की जरुरत नहीं है। असम में भाजपा ने सरकार बना ली है, बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी को पीछे छोड़ दिया है, केरल में खाता खोल लिया है और तमिलनाडु में अपने समर्थक बढ़ा लिये हैं। क्या मालूम अगले चुनाव में इन्हीं प्रांतों में भाजपा सत्ता का दरवाजा खटखटाने लगे?

जहां तक असम का सवाल है, यह कहना सही मालूम नहीं पड़ता कि वहां विचारधारा की जीत हुई है। असम में भाजपा की जीत के दो मुख्य स्तंभ हैं। एक सर्वानंद सोनोवाल और दूसरे हिमंत बिस्व सरमा। कौन हैं, ये दोनों नेता? क्या ये दोनों संघ के स्वयंसेवक रहे हैं? क्या ये लोग मूलतः भाजपाई हैं? नहीं। सरमा तो असम की कांग्रेस पार्टी के सूत्रधार थे। तरुण गोगई को तीनों बार जिताने का श्रेय सरमा को है। सरमा ने अभी छह माह पहले ही भाजपा में प्रवेश किया है। सरमा ने अपने पुराने रिश्तों को भुनाया और असम गण परिषद और बोदोलैंड जन मोर्चा के साथ भाजपा का गठबंधन करवा दिया। इसी प्रकार सर्वानंद सोनोवाल लोकप्रिय छात्र नेता रहे हैं। वे आदिवासी हैं। वे असम गण परिषद के विधायक रहे। सांसद रहे। वे पांच साल पहले ही भाजपा में आए लेकिन अपने साथ वे ‘जातीयनायक’ की कीर्ति लेकर आए। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से अवैध घुसपैठियों संबंधी कमजोर कानून को रद्द करवाया। सरमा और सोनोवाल, दोनों ने सांप्रदायिक पत्ता नहीं चला। उन्होंने असम के हित की और असम के विकास की बात की। उन्होंने भाजपा को नया चेहरा दिया। कांग्रेस ने जरुर अल्पसंख्यक वोटों पर नजरें गड़ाई थीं लेकिन असम के 35 प्रतिशत अल्पसंख्यक भी आपस में बंट गए। खुद बरुद्दीन अजमल हार गए और उनका मुस्लिम मोर्चा भी घाटे में रहा। यह अच्छा हुआ कि खुद मोदी और भाजपा सिर्फ मोदी पर निर्भर नहीं रहे, दिल्ली और बिहार की तरह! उन्होंने प्रांतीय नेताओं को आगे बढ़ाया। इसका अखिल भारतीय सबक यही है कि अगले साल आनेवाले प्रांतीय चुनावों में प्रातीय नेताओं की नियुक्त अभी से होनी चाहिए और गठबंधनों का निर्माण भी!

पांच राज्यों के इस चुनाव ने कांग्रेस की कमर तोड़ दी है। सिर्फ पुदुचेरी में वह किसी तरह अपनी इज्जत बचा पाई है। जिस मार्क्सवादी पार्टी और द्रमुक ने उसके साथ गठबंधन किया था, वह उन्हें भी ले डूबी। अब वह कहां है? सिर्फ छह राज्यों में, जिनमें से बस कर्नाटक ही बड़ा है। बाकी सब ये हैं- मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, हिमाचल और उत्तराखंड! इन राज्यों की हैसियत क्या है? ये सब मिलकर भी अकेले उप्र के बराबर नहीं हैं। इस दुर्दशा पर रोनेवाला भी कोई नहीं है। प्रांतीय पार्टियों की तरह कांग्रेस भी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गई है। अगर कोई रो दिया तो उसकी नौकरी गई। दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी रही इस कांग्रेस पार्टी का अब ईश्वर ही मालिक है।
2019 के संसदीय चुनावों तक कहीं ऐसी नौबत न आ जाए कि कांग्रेस को उम्मीदवारों के ही लाले पड़ जाएं? भारत-जैसे विशाल लोकतंत्र में कम से कम दो अखिल भारतीय दलों का होना जरुरी हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी कहां से मार्क्सवादी है और कहां से कम्युनिस्ट है, कुछ पता नहीं लेकिन यह जरुर है कि वह बंगाली और मलयाली क्यारियों में सिमट कर रह गई है। वह भाजपा का अखिल भारतीय विकल्प बनने का सपना भी नहीं देख सकती। रुस और चीन ने रंग बदला तो मार्क्सवादी पार्टी की ऊपर की डोर कट गई और जिस कांग्रेस ने उसके नीचे डोरियां लगा रखी थीं, वह भी अस्ताचलगामी हो रही है तो मानकर चलना चाहिए कि भारतीय राजनीति से विचारधारा की विदाई हो रही है। असम में भाजपा की जीत का भी संदेश यही है। तो क्या भाजपा ही अब कांग्रेस बनने की कोशिश करेगी? भारत-जैसे विशाल और विविधतामय देश पर सफलतापूर्वक राज करना भी क्या किसी विचारधारा से कम है?

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