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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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विजन कुमार पाण्डेय

आज से करीब 80 लाख वर्ष पूर्व मानव असितत्व में आया उसमें भी आधुनिक मानव का निर्माण करीब दो लाख वर्ष पूर्व हुआ। 75 हजार वर्ष पूर्व सुमात्रा नामक स्थान पर एक भयानक ज्वालामुखी फूट पड़ा था। इसके कारण धरती से जीवन समाप्त हो गया था। चारों ओर आग और धुंए के बवंडर से धरती पर छ: वर्ष तक अंधेरा छाया रहा। वैज्ञानिकों के अनुसार अफ्रीका के जंगलों में मुठठीभर मानवों का एक समूह स्वंय को सुरक्षित रख पाया था, जिसके कारण आज धरती पर मानव का असितत्व बना हुआ है। लेकिन आज प्रलय संबंधी अधूरे ज्ञान के कारण फिर दुनिया डर रही है। आज भी लोगों में भय कौतुहल और मनमानी चर्चा का दौर जारी है। अब सवाल यह उठता है कि क्या कारण है कि सारी दुनिया को प्रलय से पहले प्रलय की चिंता खार्इ जा रही है। क्या कारण है जो लोगों को भयभीत किया जा रहा है और यह भी कि क्या सचमुच ही ऐसा कुछ होने वाला है? लेकिन अब प्रश्न यहां यह है कि धरती पर से जीवन का नष्ट होना और धरती नष्ट होना दोनों अलग-अलग विचार है? आज दुनिया क्यों डर रही है? इसके कर्इ कारण हैं।

पहला है धार्मिक मान्यता। हर धर्म ने मानव को र्इश्वर और प्रलय से डराया है। धर्मग्रंथों में प्रलय का भयानक चित्रण मनुष्य जाती को र्इश्वर से जोड़े रखता है। दूसरी ओर माया सभ्यता के कैलेंडर में शुक्रवार 21 दिसम्बर 2012 में दुनिया के अंत की बात कही गर्इ है। कैलेडर में पृथ्वी की उम्र 5126 वर्ष आंकी गर्इ है। माया सभ्यता के जानकारों का कहना है कि 26 हजार साल में इस दिन पहली बार सूर्य अपनी आकाशगंगा के केंद्र के सीध में आ जाएगा। जिसके कारण पृथ्वी बेहद ठंडी हो जाएगी। इससे सूरज की किरणें पृथ्वी पर पहुंचना बंद हो जाएगी और हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा छा जाएगा। माया सभ्यता के अंधविश्वास को जर्मनी के एक वैज्ञानिक रोसी ओडोनील और विली नेल्सन ने और हवा दी है। उनका कहना है कि 21 दिसंबर 2012 को एक्स ग्रह की पृथ्वी से टक्कर की बात कहकर पृथ्वी के विनाश की भविष्यवाणी की है। लेकिन यहां भी विरोधाभास है। कर्इ बड़े वैज्ञानिकों को आशंका है कि एक्स नाम का ग्रह धरती के काफी पास से गुजरेगा और अगर इस दौरान इसकी पृथ्वी से टक्कर हो गर्इ तो पृथ्वी को कोर्इ नहीं बचा सकता। कुछ वैज्ञानिक यह आशंका जताते रहे हैं कि 2012 के आसपास ही अंतरिक्ष से चंद्रमा के आकार के किसी उल्कापिंड के धरती से टकराने की संंभावना है। यदि ऐसा होता है तो इसका असर आधी दुनिया पर होगा। हालांकि कुछ वैज्ञानिक ऐसी किसी भी आशंका से इनकार करते हैं। गौरतलब है कि इससे पहले कर्इ बार उल्कापिंड धरती पर गिरते रहे हैं, लेकिन वे धरती का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके।

दूसरी आपदा है ग्लोबल वार्मिंग। इसके चलते ग्लैशियर पिघल रहे हैं। जलवायु परिवर्तित हो रहा है। कहीं सुनामी तो कहीं भूकंप और कहीं तूफान का कहर जारी है। हाल ही में जापान में आर्इ सुनामी ने दुनिया को प्रलय की तस्वीर दिखा दी। बदलती जलवायु आवासीय ह्रास और मानवीय हस्तक्षेप के चलते पंक्षियों के असितत्व पर खतरा मडरा रहा है और ऐसा अनुमान है कि आने वाले 100-150 साल में पक्षियों की करीब 1190 प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं। अभी तक करीब 140 प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। हजारों-लाखों की तादाद में पशु, पक्षी और मछलियों के किसी अनजान बीमारी से मरने की खबर से दुनिया सकते में है। अक्सर समुद्र तट पर लाखों मरी हुर्इ मछलियां की खबर आती रहती है। अभी हाल ही में अमेरिका के एक छोटे से गांव बीबे में नए साल की सुबह लोगों को सड़कों पर, घरों के आंगन में और पूरे गांव में करीब 4900 ब्लैकबर्डस मरे हुए मिले। इस वैज्ञानिक युग में प्रलय की डरावनी छाया बनायी जाती है। माया सभ्यता से पहले एक र्इसार्इ धर्मोपदेशक हैराल्ड कैपिंग ने बाइबिल के सूत्रों के आधार पर दावा किया था कि 21 मर्इ शनिवार को शाम छ: बजे दुनिया का अंत होना तय है। प्रलय की शुरूआत में तत्काल ही दुनिया की एक तिहार्इ आबादी प्रलय के गर्त में समा जाएगी। केवल 20 करोड़ लोग बच जाएगे। 21 मर्इ से 21 अक्टूबर 2011 के बीच प्राकृतिक आपदाओं और युद्धों की झड़ी लग जाएगी। लेकिन हुआ क्या यह आपके सामने है। इसीतरह कुछ लोग नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी का हवाला देकर अपनी धार्मिक मान्यता को पुष्ट करते हैं। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि प्रलय की धार्मिक मान्यता में कितनी सच्चार्इ है। कहीं यह सिर्फ कल्पना मात्र तो नहीं जिसके माध्यम से लोगो को भयभीत करते हुए धर्म और र्इश्वर में पुन: आस्था को जगाया जाता है। आखिरकार धार्मिक पुस्तकें किसने लिखी? कलैंडर किसने बनाये? ये सब तो मानव ही बनाया न। लकिन इन भविष्यवाणियों का कोर्इ ठोस आधार न होकर पूर्ववर्ती धारणाएं और र्इश्वर का डर ही अधिक है।

इस साल पड़े ऐतिहासिक सूखे की मार से अमेरिकी अभी उबरे भी नहीं थे कि सैंडी टाइफमन की आपदा आ धमकी। करीब 2000 कि.मी. चौड़ा और 130 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार वाले सैंडी को अमेरिकी इतिहास सबसे भयानक तुफान बताया जा रहा है। स्थलीय भागपर आने के बाद इसकी रफ्तार और तीव्र हो गयी है क्योंकि पूर्वी बर्फीले तूफान ने इसे बढ़ाने के लिए आग में घी का काम किया है। हालांकि अमेरिका के लिए सैंडी जैसा तूफान कोर्इ नयी बात नहीं है। 1900 में टेक्सास में आये तूफान ने काफी तबाही मचायी थी। फिर 1928 में ओकीचोबी हरीकेन ने तीन हजार लोगों को निगल लिया था। 2005 में आए कटरीना तूफान से भारी तबाही हुर्इ थी। अमेरिका में आने वाले विनाशकारी तूफानों के संबंध में नयी बात यह है कि पहले जहां यह 40-50 सालों में दस्तक देते थे वहीं अब यह आये दिन अपनी विनाशलीला दिखाते रहते हैं। अमेरिका में ही नहीं बलिक पूरी दूनिया में प्राकृतिक आपदाएं रोजमर्रा की बात हो गयी है। और शायद ही कोर्इ महीना ऐसा गुजरता हो जब पृथ्वी के किसी कोने से प्राकृतिक आपदा की खबर न आती हो। पिछले तीन दशकों में गर्म हवा के थपेड़ों ने धरती के दस फीसदी हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले लिया। जबकि 1980 तक यह महज 0.1 से 0.2 फिसदी ही महसूस किये जाते थे। इसे हाल के कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है। 2003 में यूरोप में चली गर्म हवाओं ने 76000 लोगों को निगल लिया था। 2010 की गर्मियों में रूस में गर्म हवा के थपेड़ों से न सिर्फ 56000 लोगों की अकाल मौत हो गयी बलिक यहां के जंगलों में लगी आग से देश की 20 फीसदी गेहूं की फसल भी राख हो गयी। 2011 में एक और थार्इलैंड में भयानक बाढ़ आयी तो दूसरी ओर अमेरिका में आइरिन तूफान ने कहर बरपाया। 2012 में तो प्राकृतिक आपदाओं की तो मानों झड़ी ही लग गयी। मर्इ-जून में पूर्वोत्तर भारत और बंगलादेश में भीषण बाढ़ आयी तो मानसून की देरी ने शेष भारत में हाहाकार मचा दिया। अमेरिका में पहले तो रिकार्डतोड़ गर्म हवाओं के कारण ऐतिहासिक सूखा पड़ा और अब सैंडी तूफान कहर बरपा रहा है। यदि पिछले दो सालों से अमेरिका में चल रहे गर्म हवा थपेड़़ों से लेकर आइरिन, ऐतिहासिक सूखे और सैंडी की जड़ तलाशी जाये तो वह वैशिवक तापवृद्धि और उसके कारण गर्म होते समुद्रों में मिलेगी। दरअसल फ्लोरिडा से कनाडा तक फैली अटलांटिक की 800 किमी चौड़ी पÍी में समुद्र तल का तापमान औसत से तीन डिग्री सेलिशयस ज्यादा है। यहां न सिर्फ सतह पर गर्मी ज्यादा है बलिक गहरे समुद्र में पानी की धाराएं भी बेहद गर्म हो चुकी है। यह गर्मी और इससे पैदा हाने वाली ऊर्जा जब सतह से उठ रही भाप के साथ मिलती है तो एक तुफानी प्रणाली पैदा हो जाती है। गौरतलब है कि समुद्री जल के तापमान में एक डिग्री की वृद्धि से वायुमंडल की नमी सात फीसदी तक बढ़ जाती है। यह बढ़ी हुर्इ नमी तूफानी हवाओं की तीव्रता को बढ़ा देती है जिससे तटीय इलाकों में भारी बारिश होती है। जाहिर है सैंडी तूफान के जन्म और विकास में अमेरिकी तट से लगे अटलांटिक महासागर के बुखार की मुख्य भूमिका रही है। फिर कैरिबियन सागर में उठने और उत्तर के ध्रुवीय क्षेत्र से आ रही बर्फीली हवाएं मिल गयी जिससे इसने रौद्र रूप धारण कर लिया। इसके बाद इसने पूर्वी अमेरिका के हजारों किलोमीटर इलाके में कहर बरपाया। इसके बाद यह तूफान पशिचम की ओर मुड़ गया है जिसके चलते मध्य अटलांटिक के पहाड़ों में छह से आठ इंच तक बर्फबारी हुर्इ।

इन सब परिसिथतियों को देखते हुये हमें सतर्क हो जाना चाहिए। अगर वैज्ञानिक इस विपरीत परिसिथतियों से निकलने कोर्इ रास्ता नहीं निकाला तो वह दिन दूर नहीं जब हमें अन्य ग्रहों पर शरण लेनी होगी। और यही तभी संभव होगा जब वहां जीवन होगा। इस क्षेत्र में भी बहुत तेजी से शोध चल रहा है। मंगल ग्रह पर जीवन की तलाश जारी है हो सकता है भविष्य में सफलता मिल ही जाए। लेकिन पहले हम पृथ्वी को तो बचाने की कोशिश करें।

विजन कुमार पाण्डेय

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