लेखक परिचय

मुजफ्फर भारती

मुजफ्फर भारती

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मुस्लिम एकता मंच से जुड़े हुए हैं। आप अजमेर के निवासी हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


u.p.election मुजफ्फर भारती-

हिंदुस्‍तान की राजनीति में वोट बैंक पॉलिटिक्‍स कोई नई बात नहीं है, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्‍या अगले चुनाव में राजनीतिक सिर्फ और सिर्फ हिंदू और मुस्लिमों की बात करेंगे। क्‍या कांग्रेस/भा.ज.पा. की ये पहल अगले लोकसभा चुनाव का सांप्रदायिक एजेंडा तो नहीं है? क्या लोक सभा चुनाव अयोध्या में राम मंदिर निर्माण काॅमन सिविल कोड और हिन्दुत्व के विचारों और हिन्दू मतदाताओं पर आधारित होगा या भारतीय जनता पार्टी की ओर से मोदी को प्रोजेक्‍ट किए जाने के बाद अगले चुनाव का मुद्दा सिर्फ और सिर्फ हिंदू बनाम मुस्लिम वोट बैंक के इर्द गिर्द घूमेगा, अगले चुनाव में सिर्फ गोधरा दंगे राम मंदिर निर्माण काॅमन सिविल कोड और हिन्दुत्व की बात होगी और अर्थव्‍यवस्‍था की बदहाली केंद्रीय मुद्दा नहीं होगा, क्‍या पेट्रोल.डीजल और दो वक्‍त की रोटी पर महंगाई की मार को हिंदू मुस्लिम कार्ड दबा देगा मैं ये तो नहीं कह सकता कि अगले चुनाव टॉप 5 मुद्दे क्‍या होंगे लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि देश के प्रमुख राजनीतिक दल इस बात की भरसक कोशिश करेगें कि इस बार का चुनाव सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक कार्ड पर खेला जाए और उसके नेता ऐसा करते दिख रहे हैं।

बात कांगे्स से शुरू की जाये तो कांग्रेस के चिंतन शिविर के बाद इसे अगले लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखने की बजाय एक विवाद के तौर पर देखा जा रहा है। हम इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे, क्‍योंकि मेरी नजर में यह मुद्दा अगले लोकसभा चुनाव में बाकी मुद्दों पर हावी हो सकता है। दरअसल, इस मुद्दे को कांग्रेस के जयपुर चिंतन शिविर में राहुल गांधी को उपाध्‍यक्ष बनाए जाने के बाद देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने हवा दी और मुद्दा था हिंदू और मुस्लिम वोट बैंक का। देश में पिछले कई चुनावों से बाबरी मस्जिद और मंदिर कोई बहुत बड़े मुद्दे नहीं रहे हैं। उन्‍होंने चिंतन शिविर में भगवा आतंकवाद/हिंदू आतंकवाद जैसे शब्‍दों का प्रयोग कर बीजेपी और आरएसएस के ट्रेनिंग कैंपों में आतंकी तैयार करने की बात कहकर बखेड़ा खड़ा कर दिया था। जवाब में बीजेपी ने तगड़ा विरोध किया, लेकिन कमलनाथ, सलमान खुर्शीद, दिग्‍गी राजा समेत सभी कांग्रेसी नेता शिंदे के पीछे खड़े दिखाई दिए। यहां तक बात सिर्फ इतनी ही थी कि शिंदे ने अपरिपक्‍वता के चलते ये बयान दिया, लेकिन क्‍या वाकई ऐसा सोचना सही है कि वो सिर्फ एक भूल थी। ऐसा तो नहीं जयपुर चिंतन शिविर से अगले चुनाव के एजेंडे का साफ संकेत दिया गया था।

ताजा विवाद राजस्‍थान के सीकर की एक जनसभा से पैदा हुआ है इस सभा में कांग्रेस नेता शकील अहमद ने लालकृष्ण आडवाणी पर एक विवादित बयान देते हुए कहा कि आडवाणी सत्ता के लिए पाकिस्तान छोड़कर भारत आए। आडवाणी का जन्‍म पाकिस्‍तान के सिंध प्रांत की राजधानी कराची में हुआ था। अहमद ने कहा कि अगर उनको हिंदुओं की इतनी ही चिंता थी तो पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं की सेवा करते। हाल में कांग्रेस ओर से दिया गया ये दूसरा बड़ा विवादित बयान है। सवाल ये है कि आखिर कांग्रेस चाहती क्‍या है? क्‍या वह असल मुद्दों से ध्‍यान भटकाने के लिए ऐसा कर रही है या फिर हिंदू और मुस्लिम की लाइन पर वोट बैंक बांटने के लिए बार बार ऐसा कर रही है

इससे पहले दिग्‍गी राजा और सलमान खुर्शीद मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने के लिए मुंबई हमले में हिंदू आतंकियों का हाथ और बटला एनकाउंटर को फर्जी बताने की बात कह चुके हैं। बात गंभीर तब हो गई जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बयान आया। मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय विकास परिषद की 52वीं बैठक में कहा कि अल्पसंख्यकों को समाज में समान दर्जा हासिल कराने के लिए अनोखे तरीके से काम करने की जरूरत है। खासतौर पर मुस्लिम समुदाय को सशक्‍त बनाने के लिए आगे बढ़कर काम करना होगा।

इधर राम के नाम पर सिंहासन की सियासत पर भाजपा ने अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया है काॅमन सिविल कोड और राम मंदिर पर राजनीति से उसे यह यकीन है कि यह मुद्दे एक बार फिर उसके वोट बैंक का ध्रुविकरण करेगें और अगले लोक सभा चुनाव में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण एक सियासी मुद्दा बनकर उभरेगा जो उसे फायदा देगा यही कारण रहा कि इलाहाबाद के महाकुंभ में राम मंदिर का पुराना राग फिर गहरा गया है। विशव हिन्दू परिषद् की और से धर्म सांसद का आगाज किया गया है। जिसमें बीजेपी आरएसएस और विहिप ने राम मंदिर बनाने पर फिर से जोर देना शुरू कर दिया है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने महाकुंभ में एक बार फिर राम मंदिर निर्माण का संकल्प दोहराते हुए राम मंदिर को देश की अस्मिता से जोड़ते हुऐ कहा कि हम देश को एक स्वस्थ देश बनाएंगे।

विश्व हिन्दू परिषद द्वारा आयोजित हिन्दू संतों की घर्म संसद में जिस नाटकिय ढ़ंग से नरेन्द्र मोदी के सर्मथन में आवाज उठी कि यूपीए चाहिये ना एनडीए चाहिये हमें राम मंदिर निर्माण के लिऐ नरेन्द्र मोदी चाहिये और उन्हे देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया गया उससे साफ प्रतीत हो रहा कि देश की सियासत अब साम्प्रदायिक उड़न खटोले पर सवार हो चुकी है। सवाल ये नही कि मोदी के प्रोजेक्शन में सिर्फ संतों की भावना काम कर रही है बल्कि सवाल यह है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी स्पष्ट रूप् से कह दिया कि जो देश की आवाज वही संघ का विश्वास यानी भागवत संतों की आवाज को देश की आवाज मान कर चल रहे हैं।

इस बीच भाजपा ने अधिकारिक रूप से ये ऐलान करने में किसी तरह की हिचक नहीं दिखाई कि संत समाज आदीकाल से देश की दिशा तय कर रहा तो अगर प्रधानमंत्री तय कर दे तो क्या बुराई है। भाजपा ने यह प्रतिब्धता भी दोहराई कि राम जन्म भूमी पर राम मंदिर बने इसके लिये भाजपा आज भी कटिबद्ध है। सवाल यह है कि 90 के दशक में जो मुद्दा जवलंत था क्या फिर से वो जन आंदोलन का रूख इख्तियार करेगा हमारा नजरिया तो यही है कि नरेन्द्र मोदी और राम मंदिर एवं हिन्दुत्व के मुद्दे को हवा देकर हिन्दू समाज की भावनाओं को भड़काने की कोशिश मात्र की जा रही है भावनात्मक मुद्दों को भुनाने का दौर खत्म हो चुका है। संघर्षरत भारत और प्रगतिशील इंडिया अब भ्रष्टाचार और दुष्कर्म पर उद्वेलित होता है, मंदिर पर नहीं। देश में 2009 के आम चुनाव में 55 करोड़ से ज्यादा हिंदू वोटर थे, लेकिन भाजपा को वोट मिले आठ करोड़ से भी कम। यानी हर सात हिंदुओं में से छह ने उसे खारिज किया। अयोध्या विवाद के चरम काल में 1991 का चुनाव हो या 1996 का, इस दल का वोट प्रतिशत लगभग एक ही रहा और 1998 एवं 1999 के चुनावों में जो चार प्रतिशत बढ़ा वह बाद के दोनों चुनावों में बुरी तरह नीचे आ गया। देश के दूसरे सबसे बड़े राजनीतिक दल भाजपा का वापस मंदिर और कट्टर हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर जाना केवल इस दल में शीर्ष पर बैठे लोगों की संकुचित सोच को दर्शाता है, जिस देश में 100 करोड़ से ज्यादा हिंदू हों और महज 15 करोड़ मुसलमान उसमें अगर हिंदुत्व आधारित राजनीतिक दल को आठ करोड़ से भी कम वोट मिलें तो क्या उसे मंदिर मुद्दे अथवा कट्टर हिंदुत्व की ओर वापस जाना चाहिए? क्या इन आंकड़ों से स्पष्ट नहीं कि आम तौर पर हिंदू उदारवादी होता है और एक सीमा से अधिक कट्टरता से उसे गुरेज है? वैसे ही जैसे कट्टर अल्पसंख्यकवाद से देश के मुसलामानों को भी एतराज होने लगा है।

कुल मिला कर देश की दोनों प्रमुख सियासी जमातें अपनी सियासत की बिसात साम्प्रदायिक मुद्दों पर बिछा रही हैं जो देश के भविष्य के लिऐ नासूर का काम करेगी अगला लोक सभा चुनाव अयोध्या में राम मंदिर निर्माण काॅमन सिविल कोड और हिन्दुत्व के विचारों और हिन्दू मतदाताओं पर आधारित होगा या भारतीय जनता पार्टी की ओर से मोदी को प्रोजेक्ट किए जाने के बाद अगले चुनाव का मुद्दा सिर्फ और सिर्फ हिंदू बनाम मुस्लिम वोट बैंक के इर्द गिर्द घूमेगा अगले चुनाव में सिर्फ गोधरा दंगे राम मंदिर निर्माण काॅमन सिविल कोड और हिन्दुत्व की बात होगी और अर्थव्यवस्था की बदहाली केंद्रीय मुद्दा नहीं होगा क्या पेट्रोल डीजल और दो वक्त की रोटी पर महंगाई की मार को हिंदू मुस्लिम कार्ड दबा देगा। इसके बावजूद राजनीतिक दल अपने सियासी हित साधने की जद्दोजहद में देश हित को नजरअंदाज करते है तो ये देश का दुर्भाग्य ही कहा जीऐगा

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz