लेखक परिचय

एस.के. चौधरी

एस.के. चौधरी

पेशे से पत्रकार हैं।

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“किस ऑफ लव”-खुलेआम सेक्स की मांग ?

8 नवंबर 2014 को दिल्ली मे आरएसएस दफ्तर के बाहर लगभग 70-80 की संख्या मे कुछ प्रदर्शनकारी एक कैंपेन के तहत जमा होते है, और विरोध प्रदर्शन के नाम पर सबके सामने एक-दुसरे को किस्स करते है । यह ओछी हड़कत मोरल पुलिसींग के विरोध के नाम होता है । प्रदर्शन करने वाले यूवक-युवतियों का कहना था कि यह संविधान उनको यह हक देता है कि वे जहां चाहे जो चाहे कर सकते है । लेकिन उनका यह “किस ऑफ लव” प्रदर्शन उससे ज्यादा शर्मनाक था जितना मोरल पोलीसींग के नाम पर स्वंयसेवी संस्थाओं का प्रेमी जोड़ो का विरोध संस्कृति के नाम पर होता है । हालांकि प्रदर्शनकारी अपने मकसद मे कामयाब रहे, बहुत ज्यादा नही पर थोड़ा-बहुत मीडिया कवरेज उनको जरुर मिल गया । पर ये प्रदर्शन उन संस्थाओं के तर्क को औऱ मजबूत कर गया जिनके खिलाफ इसका आयोजन किया गया था । प्रदर्शन के बाद अब आम लोगो के मन भी सवाल उठने लगे है कि इसके आगे क्या ? आज खुलेआम चुम्मा-चाटी की इजाजत मांग रहे है कल सार्वजनिक जगहों पर सेक्स करने की मांग करेंगे । एक अहम सवाल कि इस तरह के प्रदर्शन के आयोजन के लिए इन्हे फंड कौन दे रहा है ? और इसमे भाग लेने वाले लोग कौन है ? रोहीणी के छाबड़ा जी कहते है “ये वही लोग है जिनकी आंखो के सामने इनके मम्मी पापा अफेयर करते है, जिनका परिवार या समाज से कोई लेना देना नही है । ये लोग पुरे समाज को अपने परिवार की तरह बनाना चाहते है, ताकि इनसे कोई सवाल करने वाला ना बचे”। छाबड़ा जी गुस्से मे तमतमाएं आगे कहते है “मेरी भी दो बेटीयां है दोनो के ब्वायफ्रेंड है लेकिन आज तक हमने उनसे उनकी जाति-धर्म या समाज के बारे मे नही पुछा, मुझे मालुम है कि वो सबकुछ करती होंगी जो दो जवान लोग करते है लेकिन उसकी भी एक सिमा है”। ‘संघी गुंडे होशियार, तेरे सामने करेंगे प्यार’ जैसी लाइन वाली प्लेकार्ड के साथ जब दिल्ली के झंडेवालान मेट्रो स्टेशन से लेकर आरएसएस मुख्यालय केशव कुंज के पास युवाओं की भीड़ इकट्टठा हुई तो बहुतों को यह समझ में नहीं आया कि आखिर विरोध किस बात का हो रहा है। बात ‘किस’ करने से जुड़ी थी इसलिए भीड़ की उत्सुकता बढ़ रही थी। जमा हुए युवा कहीं भी प्यार करने का हक मांग रहे थे। युवाओं ने इसी मुहिम को किस ऑफ लव का नाम दिया था। इसकी शुरुआत 24 अक्टूबर को कोच्ची मे हुई । जब कोझिकोड (केरल) के कॉफी शॉप की पार्किंग में एक कपल को किस करते देख उन पर हमला कर दिया गया। इसे अनैतिक और सभ्यता के खिलाफ बताया गया। कुछ ही देर में तस्वीरें टीवी पर दिखाई देने लगीं। खास बात ये है कि इसका विरोध बीजेपी कार्यकर्ता और कांग्रेस कार्यकर्ता, दोनों ही कर रहे थे । दोनो इसे अनैतिक करार दे रहे थे। घटना की प्रतिक्रिया में प्रदेश के युवाओं ने 2 नवंबर को खुलेआम किस डे मनाने का फैसला लिया। ऐसे मे एक सवाल ये भी उठता है कि जब इस पुरे मामले से ना तो आरएसएस और ना ही वीएचपी का कोई लेना-देना है फिर प्रदर्शनकारियों के निशाने हिंदु शब्द क्यों था ? याद रहे “लव-जिहाद” शब्द का इजात पहली बार केरल से ही हुआ था, तो क्या यह आयोजन ऐसे किसी संगठन की देख-रेख मे किया गया जो हिन्दु संगठनो के निशाने पर है ? अब बात जरा उस नैतिक पुलिसींग की करते है जिसके खिलाफत के नाम पर दिल्ली कि सड़को पर यह नंगई हुई । कोच्ची के बाद जिन 3 बड़े महानगरों मे यह प्रदर्शन हुआ उनमे कोलकता, मुंबई और दिल्ली शामिल है । बाकि शहरों का कोई अनुभव नही लेकिन दिल्ली तो मासाअल्लाह । राजधानी का कोई ऐसा सार्वजनिक पार्क इन लव-बर्ड से अछुता नही है जहां यह प्यार के नाम पर अपनी हवस ना मिटाते हो । अभी कुछ दिन पहले दिल्ली मेट्रो का एक एमएमएस सार्वजनिक हुआ था, हालांकि वह फुटेज रात का था जिसमे बहुत भिड़ नही थी । पर दिन के समय मेट्रो मे ऐसे कई जोड़े मिल जाएंगे जो आपत्तिजनक हालात मे होंगे, हालांकि बाकि लोगो के लिए वह अवस्था आपतिजनक हो सकती है उनके लिए नही । एनसीआर का कोई मॉल, पार्क, मेट्रो या बाजार शायद ही कोई ऐसी सार्वजनिक जगह होगी जहां खुलेआम यह सब ना होता हो । तो क्या संविधान का हक सिर्फ इनके लिए है ? बाकि लोगो का कोई हक नही जो अपने परिवार के साथ इन जगहो पर बिना शर्मिंदा हुए जा सके । अगर दिल्ली मे नैतिक पुलिसींग होती तो क्या ये लोग खुलेआम सार्वजनिक जगहो को पोर्न स्टुडियो बना पाते ? इस आयोजन के लिए फेसबुक पर एक पेज बनाया गया था (https://www.facebook.com/events/306392516238539/) । इन्विटेशन करीब 9 हजार लोगों को भेजा गया था। इस पेज के मुताबिक, दक्षिणपंथियों और संघियों को चुनौती देने के लिए दिल्ली में ‘किस ऑफ लव’ का आयोजन किया जा रहा है। पेज पर लिखा है, ‘आइए, गले मिलिए, हाथ मिलाइए… और किस करिए। उन्होंने हमसे कैफे, पब, पार्क, गलियां और हमारे मोहल्ले छीन लिए हैं और किस करने के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी है। आइए, झंडेवालान चलते हैं, जहां राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ का बड़ा-सा ऑफिस है और वहां अपना विरोध दर्ज करवाते हैं। खाकी निकर वालों, हम आ रहे हैं।’ संघ या वीएचपी दोनो इस मुद्दे पर इसलिए बात नही करना चाहते क्योकि उन्हे लगता है कि यह सबकुछ मीडिया अटेंशन के लिए किया जा रहा है, मीडिया अगर तुल नही दे रहा तो सिर्फ हमलोगों के लिए । हम जैसे ही इसका विरोध करेंगे ये अपने मकसद मे कामयाब हो जाएंगे । बावजूद इसके नाम ना बताने की शर्त पर एक संघ कार्यकर्ता कहते है – पहली बात कि इस सारी घटना से संघ का कोई लेना-देना नही, हमारा नाम सिर्फ मीडिया कि सुर्खियों के लिए इस्तेमाल ह रहा है। ‘हमने कभी दो प्यार करने वालो का विरोध नही किया, लेकिन हर काम के लिए एक उचित समय या उचित जगह होती है । आपको जो करना है अपने घर मे करिए वहां अगर कोई संगठन आपका विरोध करता है तो हम आपके साथ है । पार्क का निर्माण सिर्फ आपके लिए नही होता, वहां बच्चे, बुढे महिलाएं हर तरह के लोग जाते है, ऐसी हड़कतो से उन सब पर बुरा असर पड़ता है । आप बताएं अगर बच्चे यह देखेंगे तो उन पर क्या असर पड़ेगा’? अब इन प्रदर्शनकारियों से एक सवाल तो बनता है जिन जगहो का जिक्र इन्होने खुद जिस काम के लिए किया है क्या वो सारी जगहें इसीलिए बनया गई है । एक पल के लिए मान भी ले कि विदेशों मे यह सब होता है (जबकि सार्वजनिक किस करने की इजाजत कही नही है) तो क्या यह देश तैयार है इस तरह के बदलाव के लिए ? जिस देश मे पुरे कपड़े पहनने वाली महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं लगातार होती है, वहां अंग प्रदर्शन करने वालो के लिए कोई गुंजाईश बनती है क्या ? अमेरीका मे एक रिवाज है कि राष्ट्रपति अपने शपथग्रहण के ठिक बाद अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड को किस करता है, तो आज तक कितने भारतीय प्रधानमंत्रियों ने शपथग्रहण के बाद यह किया है ? एक सबसे बड़ा सवाल कि यह प्रदर्शन किसके लिए है, महानगरो मे बेधड़क बेहयाई करने वालो के लिए या वाकई जहां नैतिकता के नाम पर दो प्रेमियों को मौत दे दी जाती है उनके लिए ? इतना तो स्पष्ट है कि ऐसे मुहिमो से गांव के उन पंचायतो पर कोई फर्क नही पड़ने वाला जहां लड़कियों के कपड़ो से लेकर मोबाईल तक प्रतिबंध लगा दिया जाता है । महानगरों मे तो नैतिकता सिर्फ नाम के लिए बची है, जिसके लिए एक कठोर कानुन कि आवश्यकता है कि कब और कहां आप किस, चुम्बन या सेक्स कर सकते है । जब सार्वजनिक जगहो पर सिगरेट पिने पर प्रतिबंध लग सकता है फिर ऐसी ओछी हड़कतों पर क्यों नही ? क्योंकी समाज सिगरेट से ज्यादा बुरा असर इस तरह की वाहियात हड़कतें डाल रही है

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