लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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-पंडित सुरेश नीरव

ये छोटेपन का दौर है। कभी छुटपन में पढ़ा था कि बड़ा हुआ तो क्या हुआ,जैसे पेड़ खजूर..मगर अब जब बड़े हुए तब समझ में आई बड़ेपन की फालतूनेस। और छोटेपन की यूजफुल उपयोगिता। जिधर देखो उधर छोटेपन का जलबा। छोटेपन का दंभ। बड़े तो बेचारे अपने बड़प्पन की शर्मिंदगी के मारे गर्दन झुकाए बैठे हैं। और कोस रहे हैं अपने आप को कि काहे को बड़े हुए जबकि सब जगह छोटे की पूछ है।छोटा पर्दा,छोटीकार,छोटे कारोबार,छोटे-छोटे कपड़ों में सजी बड़े-बूढ़ों की छोटी-छोटी प्रेमकाएं। और छोटे-छेटे लोगों के बड़े-बड़े कारनामें। कल रघुवंशीजी को एक लघुवंशीजी ने जमकर पीट दिया। हड्डियों के तंबूरे पर बड़प्पन का राग आलापते हुए कराह रहे थे-अरे इन छोटे लोगों के क्या मुंह लगना। हम बड़े लोग हैं। हमारा बड़प्पन देखो वह हमें पीटता रहा और हम विनम्रतापूर्वक उससे पूछते रहे कि तुम्हें कहीं चोट तो नहीं आई,मेरे भाई। आखिर हम बड़े हैं। क्षमा बड़न को चाहिए छोटन कौ उत्पात। हमने उसे वीरतापूर्वक क्षमा कर दिया। फिर धीरे से मेरे कान के पास रघुवंशीजी आए और फुसफुसाए-क्या ऑफ द रिकार्ड में आपको डांट सकता हूं। मैं वैसे भी आपसे उम्र में छोटा हूं। इत्ती-सी लबर्टी लेना तो मेरा संवैधानिक अधिकार है। अगर इजाजत हो तो छोड़ी देर के लिए छोटे होने के फायदे मैं भी उठा लूं। थोड़ा मन बहल जाएगा। तम-मन में बड़ी पीढ़ा है। सोचता हूं आपको विनम्रतापूर्वक पीटकर थोड़ा हलका हो लूं। अब आप तो बड़े हैं। बस सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दीजिए कि मैं आपके दो-तीन लातें जमा सकूं। संकोच हो तो जरा रावण को याद कीजिए। उसने तो मिस्टर राम को विजयी भव होने का आशीर्वाद तक दे डाला था। जब कि उसे अच्छी तरह मालुम था कि अगले ने उसको मारने की सुपारी उठा रखी है। सचमुच रावण बड़ा आदमी था। इसीलिए मारा गया। आप भी बड़े आदमी हैं। और मैं कोई आपका वध थोड़े ही करूंगा। बस महिला पुलिस की तरह हल्का-फुलका लाठी चार्ज करूंगा। आप उदार हैं,दयालु हैं,विनम्र हैं,हर तरह से बड़े हैं। इस छोटे की मुराद पूरी कर दीजिए,प्लीज। भगवान आपको अच्छी सेहत दे ताकि आप ज्यादा-से-ज्यादा अपने छोटों को अनुग्रहीत कर सकें। वैसे आपके सूचनार्थ विनम्र निवेदन है कि आजकल छोटों से पिटना लेटेस्ट फैशन है। अब अध्यापक छात्रों से, अफसर चपरासियों से और डैडी लोग अपने श्रवण कुमारों से खूब हेप्पिली पिट रहे हैं। ऐसी ही दिव्य लीलाओं से ही हमारा इतिहास गौरवशाली हुआ है। टुच्चे फिरंगियों के लुच्चे अऱमानों की खातिर हमारे क्रांतिकारी हंसते-हंसते,फांसी के फंदों पर चढ़ गए थे। फांसी लग रही है,वे हंस रहे हैं। क्षमा बड़न को चाहिए,छोटन कौ उत्पात। उन्होंने सिद्ध करके बता दिया था। बड़े लोग थे। किताबों में ही पढ़ा था ऐसे बड़े लोगों के बारे में। आज आप साक्षात मिले हैं। आप भी बड़े आदमी हैं। मेरी नज़रों में तो आफ भी जिंदा शहीद हैं। प्लीज अब आप और बड़े हो जाइए। और इस छोटे आदमी की मर्मांतक प्रार्थना को स्वीकारिए और कृपानिधान मुझे वरदान दीजिए कि मैं अपनी मनोकामना पूरी कर सकूं। आपको सामाजिक न्याय की दुहाई,। आपको सामाजिक समरसता की कसम। हे,प्रभु मेरे अवगुण चित न धरो। रघुवंशीजी अपने बड़े को पीटने की भावुक मनुहार करता रहे। मगर जब कथित बड़ा मैं पिटने के लिए मानसिकरूप से तैयार नहीं हुआ तो छोटे आदमी को गुस्सा आ गया। उसने फटाक से करुणरस से उछलकर वीर रस में छलांग लगा दी और बोला- आप मेरी शराफत का नाजायज फायदा मत उठाइए। आप इतनी देर से मेरा उत्पीड़न कर रहे हैं और मैं चुपचाप सहन किये जा रहा हूं। आप अपने आप को समझते क्या हैं। इस उधारी के बड़प्पन के बोझ से दबकर आप भी एक दिन डायनासौर की तरह खत्म हो जाएंगे। अरे हम तो मच्छर हैं। हमारा क्या। मच्छर को मारने के लिए मच्छरदानी,डीडीटी,ऑलआउट,कॉयल और तमाम ऑयल आदमी ने निकाले मगर क्या हुआ मच्छर का। मुद्दई लाख बुरा चाहे क्या होता है,वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है। मच्छर की शान में क्या कमी आई। आदमी ही रुआंसा हुआ कहता फिरता है- कि एक साला मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है। देख लो सारे आदमी मिलकर एक मच्छर को हिजड़ा नहीं बना सकते। और एक अदना-सा मच्छर अकेला ही अच्छे खासे आदमी को जब चाहे किन्नर बना देता है। अबे मलेरिया अफसर की औलाद। ध्यान रख मैं मच्छर हूं, तुझे तबाह कर दूंगा। मच्छर की ऐसी निर्भीक भिभिनाहट को सुनकर मैं बड़ा आदमी थरथर कांपने लगा। यह हाहाकारी दृश्य देखकर तभी एक चूहे ने अट्टहास किया और मुझ बड़े का मजाक उड़ाता हुआ बोला-अबे बड़े, अभी भी तेरे कान नहीं हुए खड़े। हमारे समुदाय में भी एक बार एक सीनियर सिटीजन चूहे ने ऋषि से बड़े होने का वरदान ले लिया था। शेर बन कर उसकी जो मट्टी-पलीत हुई उसके बाद से हम चूहों ने फिर कभी ऐसी गलती नहीं की। आज जंगल के शेर खत्म हो गए और हम चूहेदानियों का मजाक उड़ाते हुए सपरिवार आदमी की छाती पर पिकनिक मना रहे हैं। मेरी मान और मौका देखकर तू भी छोटा हो जा। कोई फायदा नहीं है फालतू के बड़े होने में। बड़े लोगों के महल फ्लैटों में तब्दील हो गए हैं। कोठियां कोठों में बदल गई हैं। हमारी चुहियाएं खुश हैं कि तमाम बुलडोजरों के आतंक के बावजूद हमारे बिल सुरक्षित हैं। क्योंकि इन्हें कोई ठेकेदार नहीं बनाता है। अरे हम आत्मघाती चूहों से जब भी आदमी ने कोई हरकत की है हम चूहों ने मर के प्लेग फैला दिया। बस्ती–की बस्तियां उजाड़ दीं आदमी की। आदमी हमारा क्या बिगाड़ पाया। आदमी विशाल है, हम लघु हैं। और ये तो तुम भी जानते होगे कि लघुता से प्रभुता मिले,प्रभुता से प्रभु दूर। आज तक आदमी को प्रभु नहीं मिला। वो तो अभी तक इस बहस में उलझा हुआ है कि ईश्वर होता भी है या नहीं। उस बेचारे के लिए तो उसका मालिक या बॉस ही प्रभु होता है। मगर हम लोगों को तो सचमुच में गणेशजी की कंपनी खानदानी विरासत में मिली हुई है। इसलिए हे बड़े तुम्हें मेरी एडवाइसात्मक सलाह है कि मौका देखकर तुम भी अपना ये फालतू का बड़प्पन छोड़ दो। ठीक वैसे ही जैसे कि मौका देखकर एक चतुर नेता अपनी पार्टी छोड़ देता है। याद रखो लघुता से प्रभुता मिले। आदमी जितना चोटा हो जाता है वह उतना ही बड़ा पद हथियाता है। गांधीजी ने लघु उद्योग को काफी बढ़ावा दिया। वो लघुता की इंपोर्टेंस समझते थे। सूट छोड़कर लंगोटी में आ गए। और राष्ट्रपिता बन गए। मल्लिका शेरावत ने भी लघुता का महत्व समझा। फटाक से स्टार बन गईं। लॉंग-ल़ांग एगो एक हनुमानजी ने लघुमा सिद्धि से अपने को छोटा किया और सुरसा के मुंह में घुस गए। लघुता से प्रभुता मिले। और जब प्रभु ही लघु हो जाएं तो तय है कि उन्हें परम प्रभु का पद मिलना ही था. सुरसा मर गई। क्योंकि उसे छोटे होने की टेक्नीक आती ही नहीं थी। वह वैसी ही मारी गई जैसे कि छोटे से चरखे से फिरंगियों का राज खेत रहा। औरंगजेब लघुभ्राता था। उसने अपने सारे बड़े भाइयों को अपने छोटेपन से निबटा दिया और बादशाह बन बैठा। लघुता से प्रभुता मिले। सुग्रीव लघु था बड़े भाई बाली के प्राणभंजन कर उसने मनोरंजन भी किया और उसकी पोस्ट भी हथिया ली। लघुता का महत्व समझकर ही विष्णुजी ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि के साम्राज्य को सिर्फ तीन पगों में नाप लिया। लघु विष्णु से नप गया बाली। इसलिए भैया बड़े होना है तो छोटेपन पर उतर आओ। बड़ा हुआ तो क्या हुआ। कौन परवाह करता है बड़े की। और जब छोटे बड़े हो जाएंगे तो बड़े अपने आप छोटे हो जाएंगे। छोटे हमेशा बड़े के विलोमानुपाती होते हैं। इत्ता छोटा-सा गणित है जो बड़ों को समझ नहीं आता। अरे,जो जितना बड़ा होगा उसके उतने ही बड़े झंझट। सूरज-चांद को ग्रहण लगता है। मोमबत्तियों और सिगरेट लाइटरों को नहीं। राहू-केतु छोटे हैं इसलिए बड़े से पंगा लेते हैं। छोटों से उलझकर कौन अपनी बेइज्जती खराब कराए। इज्त तो उनकी वैसे भी नहीं है। इसलिए हे बड़कूराम तो छोटूराम हो जा। छोटू हुआ तो सर बनेगा,बड़ा हुआ तो सर कटेगा। मेरी नहीं तो कवि बिहारी की मान ले, जो कह गए हैं कि-देखन में छोटे लगें,घाव करें गंभीर। छोटे अस्त्र-शस्त्रों से वे महाकवि बन गए। बड़े का वार तो हर छोटा झेल जाता है मगर छोटे के बार से कथित बड़ा शर्तिया निबट जाता है। एक नन्ही-सी लघुशंका अगर अपनी जिद पर मचल जाए तो बड़ों-बड़ों की पेंट गीली हो जाए। और अगर उसकी खोपड़ी घूम जाए तो आदमी डायलेसिस पर सिधार जाता है। लघुता की प्रभुताओं की कथाएं अनंत हैं। लघु अनंत,लघु कथा अनंता।

अब देखिए न आदमी को सुधारने और कभी-कभी बिगाड़ने में बड़े-बड़े शास्त्रों और ग्रंथों पर एक छोटी-सी पीली पन्नीवाली नन्ही-सी पॉकेट बुक कितनी भारी पड़ती है,इसे कहने की क्या जरूरत है। आप सब शरीफ लोग है। इसके शरारती इनर्जी लेबिल से आप सब अच्छी तरह से बाकिफ हैं। सूटकेस से लेकर मर्डर केस तक एक छोटी-सी चूक समझदार आदमी के उज्ज्वल भविष्य को चौपट कर देती है। एक चींटी-सी गलती के आगे वह बेचारा हाथी ही साबित होता है। अब देखिए न भारतीय दंडसंहिता में शादी कोई अपराध नहीं है। मगर एक जरा-सी ये चूक कितनी भारी पड़ती है, अगर आप शादीशुदा हैं तो बुरी तरह जानते ही होंगे और कुंआंरे हैं तो एक दिन अच्छी तरह से जान जाएंगे। अपुन खाली-पीली काहे को अपना टाइम खोटा करें। और अगर आप अपने को छोटा मानते हैं तो इस गलती को छोटा कतई न समझें। और इसे बड़ा मानकर तुरंत और छोटे हो जाइए। क्योंकि एक छोटेपन में बड़ी-बड़ी गलतियां बड़े करीने से दुबक जाती हैं। छोटा होना ही हमेशा परम प्रोफिट का सौदा रहा है। बड़ों की लुटिया तो चुल्लूभर पानी में ही डूब जाती है। उस प्रचंड लघुवंशी की विराट बातें सुनकर मेरे शरीर में छोटेपन का जो अदम्य संचार हुआ, उसके सुफल से लघुवंशीजी ससम्मान अस्पतालवासी होकर मोक्ष को प्राप्त हुए और मैं व्यंग्य लेखक बनकर छोटेपन की संस्कृति का महा प्रचारक बन गया। एक छोटे आदमी ने मेरी मौलिक जिंदगी में कितना बड़ा काम किया,उसके लिए आभार व्यक्त करने का बड़ा काम मैं कतई नहीं करूंगा क्योंकि अब मैं बाकायदा आईएसआई मार्क्ड छोटा आदमी बन चुका हूं।

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1 Comment on "क्या फायदा बड़े होने में"

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श्रीराम तिवारी
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लेकिन ये छोटे जब बड़े बन जाते हैं तो बड़ी मुसीवत भी कड़ी कर सकते हैं .
जो रहीम ओछो बढे …तो अति ही इतराय…
प्यादे से फर्जी भयो ,टेड़ो टेड़ो जाय ….

१-ओछो याने छोटो ,खोटो ,हीन …
२-फर्जी याने वैकल्पिक .कार्यवाहक या एवजी ..

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