लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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2921954277_1c8c438699विजयादशमी पर मोहल्ले के लोग रावण मारना चाहते थे। पगले कहीं के। रावण ससुरा कभी मरता नहीं, अमरता का वरदान पा चुका है लेकिन दिल है कि मानता नही। हर साल जाते हैं शान से- रावण मारने। जलाते हैं। पटाखे फोड़ते हैं। एक से एक आतिशबाजी करते हैं, और लौट आते हैं, लेकिन ढाक के तीन पात की तरह हालत जस की तस हो जाती है। रावण मर कर जिंदा हो जाता है। भाई लोग भी जानते-समझते हैं कि रावण जिंदा हो चुका है। लेकिन अब कोई उसको दूसरे-तीसरे फिर चौथे दिन जलाने का सिलसिला क्यों बनाये, इसलिए बेहतर है सालभर में एक दिन जलाने की भड़ास निकाल लो।

तो इसी परंपरा का निर्वाह करने के लिये मोहल्ले के लोग रावण मारने के मूड में थे। रावण की ऊंचाई को लेकर चिंतित थे। आखिर कितना ऊंचा हो रावण? पचास फुट? पचहत्तर फुट? नब्बे फुट या सौ फुट? रावण की ऊंचाई बढ़ाने की चिंता में आयोजक घुले जा रहे थे। तय हुआ कि अबकी रावण को निन्यानबे के फेर में डाल दिया जाये, अर्थात् निन्यानबे फुट का रावण बनाया जाये। न सौ फुट ऊंचा न पचहत्तर फुट ऊंचा। और साहब, ‘रावणजी’ तैयार निन्यानबे फुट के। दशहरा के दिन किसी बड़े अफसर, किसी बड़े नेता, किसी बड़े व्यापारी की उपस्थिति में रावण का काम तमाम कर दिया जाये।

रावण तैयार करने के लिये जिनकी ओर से आर्थिक मदद मिली है उन्हें अतिथि बनाना हमारी होशियारी या बुद्धिमत्ता का सदियों पुराना तरीका है। और ठीक भी है। जो तगड़ा चंदा दे, उस बंदे को आप मंचस्थ न करें, तो वह अनैतिकता ही कहलाएगी। आयोजकों ने चंदा देने वाले लोगों को और जिनसे कल को कुछ का सिद्ध हो सकता है, उन अफसरों को रावण मारने बुलवा ही लिया।

और दशहरा की शाम को शुरू हुई रावण दहन की तैयारी। हजारों की भीड़ देख रही थी तमाशा। जिस रावण को राम के हाथों मरना था उस रावण को आज इस इलाके के बड़े अफसरों और नेताओं के हाथ मरना था। लेकिन गजब है रावण की ‘बाडी’ जलने का नाम ही न ले। पहले नेताजी आए। आयोजकों ने उन्हहें मशाल दी कि रावण जलाएं। नेताजी ने मशाल थामी। पास में खड़े राम को मुस्करा कर देखा। लोग कह रहे हैं देखा राम, तुम तो खाली-पीली ‘ मेकप करके खड़े हो, और तुम्हारा काम हम किए दे रहे हैं। तुम बड़े हुए कि हम? और राम बनी दुखी आत्मा रामेश्वर वैष्णव की पंक्तियों को याद कर रही थी कि-

अपने ही घर में राम अकेले खड़े हैं, जबकि समूची भीड़ है रावण के आसपास।

उधर नेताजी रावण को आग लगा रहे हैं, लेकिन आग पकड़ ही नहीं रही है। रावण जल ही नहीं रहा। आखिर बात क्या है? हर बार तो रावण जल जाता था। इस बार इतने नखरे काय-कूं कर रिया है? आयोजक परेशान। नेताजी परेशान। रावण के पुतले पर आग ही नहीं पकड़ रही। फिर बड़ा अफसर आगे आया। उसने मशाल थामी। लेकिन अट्टहास करता रावण जलने का नाम ही नहीं ले रहा था। सब लोग चकराये। ये कैसा अपशकुन? पहली बार ऐसा हो रहा है। रावण तो आसानी से जल जाता था, इस बार क्या हो गया? उल्टे मशाल थामने वालों के हाथ ही झुलसने लगे।

आयोजक टेंशन में आ गये। कहीं रावण के पुतले पर चिपकाया गया कागज ‘फायर-प्रूफ’ तो नहीं है? तभी तो आग नहीं पकड़ रही। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। सामान्य कागज था जो अक्सर पुतलों पर चिपकाया जाता है। फिर क्या हो गया? नेताजी अफसर और दूसरे अतिथिनुमा लोग परेशान थे। सबके चेहरे पर पसीने की बूंदें नजर आ रही थी। उधर रावण के दस सिर एकसाथ हंस रहे थे- हा।।।हा।।।हा।।।!

आयोजकों को टेंशन में देखकर और रावण दहन का मुहूर्त निकलता देखकर भीड़ से एक सज्जन आगे आए। व्यवस्था के लिये तैनात पुलिस ने उसे रोकने की कोशिश की। लेकिन वे सज्जन आयोजकों के पास पहुंच ही गये। और बोले- ”बुरा न मानें, आप लोगों से ये रावण नहीं जलेगा। ये मुझसे या भीड़ में खड़े किसी भी आदमी से बड़ी आसानी से जल जायेगा।”

आयोजक भड़के- ”क्या बकवास कर रहे हो? अरे, बड़े-बड़े नेता-अफसर जो माहिर होने के बावजूद आग नहीं लगा पा रहे हैं, और तुम आम आदमी क्या खाक लगाओगे आग! जाओ भई, हमें अपना काम करने दो। अभी थोड़ी देर में लग जायेगी आग!”

सज्जन मुस्कराए। खड़े रहे। आग लगाने की प्रक्रिया फिर शुरू हुई, लेकिन रावण आगप्रूफ हो चुका था। तभी आयोजकों में से एक ने कहा- ”इस आदमी की बातों के पीछे गूढ़ार्थ नजर आता है। क्यों न भीड़ में से ही किसी को बुला लें और उससे आग लगवा लें?”

आयोजकों ने ऐसा ही किया। भीड़ में खड़े एक मजदूरनुमा व्यक्ति को बुलवाया और उसके हाथों में मशाल दे दी। और देखते ही देखते रावण धूं-धूं करके जलने लगा। ये कैसा चमत्कार!! बड़े-बड़े नेता, अफसर जो काम नहीं कर पाये वा काम एक आम आदमी ने कर दिखाया! कुछ ही क्षणों में रावण साफ हो गया। वो सज्जन जो भीड़ को चीरकर सामने आये थे, जाने लगे तो आयोजकों ने उन्हें घेर लिया और पूछा- ”आखिर इस रहस्य का खुलासा तो करो? ये रावण बड़े-बड़े नेताओं-अफसरों से नहीं जला, लेकिन आम आदमी से जलकर राख हो गया? आखिर क्यों?”

सज्जन बोले- ”इस देश का आम आदमी सर्वहारा ही किसी का अंत कर सकता है। परम्परा ही यही है। आपने राम बने व्यक्ति की उपेक्षा कर दी! अरे, नेता-अफसरों को बुलाने से तुम्हारे कुछ स्वार्थ सिद्ध हो सकते हैं तो वह सिद्ध करते रहो, लेकिन जब तुमने किसी को राम बनाकर खड़ा कर दिया है तो उस व्यक्ति का न सही उस आवरण का सम्मान तो करो, जिसे हम लोग ‘राम’ की तरह देख रहे हैं। जिसे भीड़ राम का रूप समझ कर प्रणाम कर रही है। इतना ऊंचा रावण बनाने के साथ-साथ अपनी बुद्धि भी तो उतनी ऊंची रखो। अफसरों को, नेताओं को अतिथि बनाए रखो, लेकिन रावण दहन का काम तो राम से ही करवाओ। याद रखो, हर युग में रावण को भीड़ ही मारती है। भीड़ राम की वंश है। इसी भीड़ में रहता है मर्यादा पुरुषोत्तम राम। आम आदमी सर्वहारा। बड़े-बड़े अत्याचारियों को निपटा देने वाला।”

सज्जन की बातें सुनकर आयोजक समझ गये कि गलती कहां हुई। उन्होंने तय किया कि अगली बार से रावण दहन, राम के हाथों ही होगा। बाकी वीआईपी लोग दर्शक ही बने रहेंगे।

-गिरीश पंकज

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1 Comment on "जब रावण मर न पाया।।।"

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pravesh chauhan
Guest

very nice

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