लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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chandrashekhar venkat raman28 फरवरी विज्ञान दिवस पर विशेषः-

28 फरवरी का दिन हर साल विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस को जनता को विज्ञान के प्रति जागरूक करने के लिए ही मनाया जाता है। आम जनता व विद्यार्थियों को विज्ञान के प्रति आकर्षित करने के लिए पूरे देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। जिसमें निबंध प्रतियोगिता, प्रदर्षनी, मेले व क्विज कार्यक्रमों की बहुलता रहती है।

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक डा़ चंद्रशेखर वेंकट रमण ने प्रकाश किरणों के गुणधर्म की खोज और विवेचना करके विज्ञान जगत में अविस्मरणीय योगदान दिया था। उनके अन्वेषण की महत्ता को समझकर उनके निष्कर्षो को उनके ही नाम पर रमण प्रभाव कहा गया। डा. रमण ने सैकड़ों ऐसे प्रयोग किये थे जिनका दूरगामी लाभ था किन्तु रमण प्रभाव उनका सबसे बड़ा आविष्कार माना जाता है। इसमे उन्होनें सिद्ध किया कि जब अणु प्रकाश को बिखेरते हैं तो मूल प्रकाश में परिवर्तन हो जाता है। नवीन किरणों की उपस्थिति से हम यह परिवर्तन देख सकते हैं। प्रक्षिप्त प्रकाश में जो किरणें दिखाई पड़तीं वे ही रमण प्रभाव व रमणकिरणें कहलाई। डा. रमण ने यह खोज 28 फरवरी 1928 को थी ।इसलिए इस इस खोज के महत्व को देखते हुए देश में 28 फरवरी का दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारतीय गौरव में चार चांद लगाने वाले डा. रमण का जन्म 7 नवम्बर 1888 को त्रिचनापल्ली के एक ब्राहमण परिवार में हुआ था । इनके पूर्वज जमींदार एवं कृषक थे।इनके पिता श्री चन्द्रशेखर एक शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। रमण ने 16 वर्ष की अवस्था में मद्रास विश्वविद्यालय से कला के स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रे्रणी में उत्तीर्ण की। तत्पश्चात भौतिक विज्ञान की स्नातकोत्तर परीक्षा प्रथम श्र्रेणी में उत्तीर्ण की।डा. रमण के परीक्षाफलों से प्रभावित होकर 20 वर्ष की अल्पायु में ही भारत सरकार ने इन्हें अर्थ विभाग में डिप्टी एकाउन्टेंट जनरल पद पर नियुक्त किया।

सरकारी पद पर नियुक्ति के बाद डा. रमण का विवाह हुआ।उनकी कार्यशैली से प्रभावित होकर सरकार ने डाक- तार विभाग में उनकी नियुक्ति कर दी। अब डा. रमण को वैज्ञानिक कार्य करने का पर्याप्त समय मिलने लगा। एक दिन डा. रमण अपने घर से वापस जा रहे थे कि मार्ग में उन्होनें इण्डियन एसोसिएशन फाॅर दा कल्टीवेशन आफ साइन्स नामक संस्था का बोर्ड देखा और वे वहीं चले गये। अंदर जाने पर उनकी भेंट डव. अमृत लाल सरकार से हुयी जो रमण से बहुत प्रभावित हुए और उन्होने डा. रमण को प्रयोगशाला सम्बंधी समस्त सुविधाएं देने का वचन दिया। डा. रमण के सहयोग से उक्त संस्था की काया पलट गयी। यहीं पर उनकी भेंट डा. आशुतोष मुखर्जी से हुई जिसने उनके भावी जीवन को सामूल परिवर्तित कर दिया।

सर आशुतोष मुखर्जी ने डा. रास बिहारी घोष और सर तारकनाथ पालित की सहायता से 1914 ईसा में कलकत्ता में विज्ञान की शिक्षा और शोधकार्य के लिए विज्ञान कालेज की स्थापना की। जब इस कालेज के लिये विज्ञान के आचार्य पद पर नियुक्ति का प्रश्न आया तो सुयोग्य व्यक्ति की समस्या आई तब डा. रमण नियुक्ति की गयी। यहां पर उन्होनें विज्ञान प्रेम और प्रतिभा का परिचय देते हुए भारतीय वैज्ञानिकों के मन में जो स्थान बनाया वह सर आशुतोष के भाषण से स्पष्ट होता है। उनका कहना था कि ,“हमारा सौभाग्य है कि हम आचार्य पद के लिए रमण की सेवाएं प्राप्त करने में सफल हुए हैं। रमण अपनी भौतिक विज्ञान सम्बंधी खोजों के लिए योरोप में अच्छी सफलता प्राप्त कर चुके हैं।” डा. रमण 1917 से 1932 तक अनवरत अनुसंधान कार्य करते रहे।

उन्होनें नयी खोजों के साथ पुरानी खोजों पर संशोधन भी किया। उनके महत्वपूर्ण खोजों में रमण किरणें ही उल्लेखनीय हैं। यह प्रकाश- विज्ञान से सम्बंधित है। उन्होनें यह सिद्ध किया कि प्रकाश किरणें न केवल पारदर्शी वस्तुओं में अपितु बर्फ जैसे ठोस पदार्थो में भी अणुओं की सतत् संचरणशीलता के कारण प्रवेश कर सकती है। उन्होनें न्यूटन के प्रकाश विक्षेपण के विज्ञान की और व्याख्या की तथा बादलों के विभिन्न रंगों और इन्द्रधनुष की जानकारी प्राप्त की। डा रमण की सर्वश्रेष्ठ खोज रमन प्रभाव ही है। जिसके लिए उनको 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने के बाद दो वर्ष तक कलकत्ता विश्वविद्यालय में रहे। 1922 से 37 तक भारत की प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्था इण्डियन इंस्टीट्यूट आॅफ साइन्स के निदेशक रहे। उन्होनें बंगलौर में स्वतंत्र अन्वेषण संस्था रमन इन्स्टीटयूट की स्थापना की। उन्होनें हीरे की चमक पर महत्वपूर्ण शोध किया। यह भी बताया कि प्रोटोन की शक्ति पदार्थ में ही आंशिक रूप से परिवर्तित कर सकती है। इस सत्य का प्रदर्षन करने वाले रमण प्रथम वैज्ञानिक थे। अपने कड़े परिश्रम से रमण ने कई महत्वपूर्ण शोध किए । अनेक विषयों पर उनके महत्वपूर्ण निबंध देशी- विदेशी पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे।

उन्होनें कई विदेश यात्राएं समुद्र के जहाज से भी की थी । अपनी इस यात्रा के दौरान वे जहाज के डेक पर बैठकर घंटों समुद्र के गहरे नीले विस्तार को निहारते रहते थे। समुद्र की संुदरता ने उनका मन मोह लिया।गहन शोध के बाद उन्होनें समुद्र के नीले रंग जल का मौलिक रंग सिद्ध करते हुए लेख लिखा था ,” समुद्र का नीलापन“ जिसमें उन्होनें समुद्र का नीलापन उजागर करने के साथ विर्वतन ग्रेटिंग का प्रयोग करते हुए यह भी सिद्ध किया कि नीले आकाश और नीले समुद्र की उच्चतम वर्णक्रमीय तीव्रता भिन्न होती है।

बचपन से लेकर 82 वर्ष की आयु तक डा. रमण ने सफलता के अनेक कीर्तिमान स्थापित किये। उनके सााथ पुरस्कार, उपाधियों की एक लंबी श्रृंखला है। जीवन मूल्यों के प्रति उनमें भरपूर आस्था थी ।

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2 Comments on "जब दुनिया चकित हो गयी रमन प्रभाव से"

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मानव गर्ग
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मानव गर्ग

महत्त्वपूर्ण लेख । लेखक को धन्यवाद ।

sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar
श्री रमन ने समुद्र यात्राएं की। गणितन्य श्री रामानुजम ने भी समुद्र यात्राएं की किन्तु आज भी हमारा रूढ़िग्रस्त समाज समुद्र यात्रा को ठीक नहीं मानता. और तर्क देता है की वरुण देवता पर पैर रखना हिंसा और देवता का अपमान है. हमारे धर्माचार्यों ने हमें हिंसा और अहिंसा के ऐसे भरम में डाल दिया की हम अन्वेषी समाज नहीं हो पाए. फलस्वरूप हम खोजी,अनुसन्धान करता रहने से वंचित हो गये. हम साहसिक समुद्री यात्री नहीं बन पाए. हमारे ऐसा करने से हिंसा हो जायेगी ,चूहों पर दवाई का इस्तेमाल करने से हत्या होगी, अगले जन्म में उसका भुगतान करना… Read more »
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