लेखक परिचय

प्रतिमा शुक्ला

प्रतिमा शुक्ला

मूलत: लखनऊ से हूं। पत्रकारिता जगत में कार्यरत हूं। कविताएं, जनसरोकार के विषयों पर महिला और बाल कल्याण पर स्वतंत्र लेखन कार्य पिछले कई वर्षों से कर रही हूं। वर्तमान कार्यक्षेत्र नई दिल्ली हैं।

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nirbhaya16 दिसम्बर : विशेष

वर्ष 2012 से 16 तारीख भी इसमें जुड़ गई है। एक ऐसे शर्मनाक, दर्दनाक, भयानक, रोंगटे खड़े करनी वाली घटना की दुखद स्मृति के साथ, जिसे दुनिया निर्भया कांड के नाम से जानती है। एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के इस जघन्य अपराध ने जनता से लेकर सरकार तक सबको झकझोर कर रख दिया। व्यथित लोग सड़कों पर उतर आए, सरकार को महिला उत्पीडऩ रोकने के लिए नए कानून बनाने पर विवश होना पड़ा, स्त्री सुरक्षा का मुद्दा हाशिए से उठकर मुख्यधारा में आ गया। ऐसा लगा कि अब समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार आएगा, बलात्कार जैसे गंभीर अपराध को कम होंगे ही, छेडख़ानी आदि पर भी रोक लगेगी। साल-दर-साल बीतते गए और महिलाओं की दशा यथावत रही।

देश में महिलाएं घरों से लेकर सड़कों तक हर जगह असुरक्षित हैं। केेंद्र और राज्य सरकारें महिलाओं की सुरक्षा में नाकाम साबित रही हैं और समाज ने मानो प्रतिज्ञा उठा रखी है कि वह महिलाओं को उपभोग के सामान से अधिक कुछ नहींसमझेगा। इसलिए एक दिन नहींबीतता, जब स्त्रियों, युवतियों, किशोरियों, बच्चियों के साथ किसी तरह के अपराध की खबर न आती हो। बल्कि अब यह इतना सामान्य माने जाना लगा है कि ऐसे अपराध एफआईआर करवाने पर पुलिस डायरी में दर्ज होकर ही रह जाते हैं, समाज इनसे व्यथित होना तो दूर, इन्हें खबर तक नहींमानता। इसलिए जब महाराष्ट्र के प्रसिद्ध शनि शिगनापुर गांव में स्थित मंदिर में एक महिला भीड़ में शामिल होकर गर्भगृह तक पहुंचती है, और इसके बाद मंदिर का शुद्धिकरण होता है, तो असहिष्णुता, जलवायु परिवर्तन, भारत-पाक संबंध के बीच यह कोई खबर ही नहींबनती। हां, जब कोई महिला शराब पीकर हंगामा मचाती है, तो वह राष्ट्रीय खबर जरूर बन जाती है। पाठकों को याद होगा कि कुछ दिनों पहले मुंबई में एक पुलिस थाने के सामने एक युवती ने शराब पीकर हंगामा मचाया तो समाचार चैनलों ने पूरे विस्तार से इसे दिखाया। याद नहींपड़ता कि किसी आदमी के शराब पीकर हंगामा मचाने पर ऐसा राष्ट्रीय कवरेज किया जाता हो, जबकि देश में रोजाना ऐसे प्रकरण घटते हैं। जो बात स्त्री के लिए गलत है, वह पुरुष के लिए सही कैसे हो जाती है?

बहरहाल, शनि शिगनापुर मंदिर में सदियों से महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है। लेकिन उस गुमनाम महिला ने इस रूढि़ को तोडऩे का साहस दिखाया और गर्भगृह तक पहुंचकर पूजा की। मंदिर प्रशासन को इसकी जानकारी हुई तो उसने सात सुरक्षाकर्मियों को निलंबित कर दिया, जबकि परंपरा टूटने से दुखी ग्रामीणों ने दूध से अभिषेक कर मंदिर का शुद्धिकरण किया। दूध से पाप धोने की समझ रखने वाले शायद इतनी समझ नहींरखते हैं कि उन्हें इस दुनिया में लाने वाली भी स्त्री ही है। शनि शिगनापुर के इस विवाद पर विरोध के कुछ सुर तो उठे हैं, लेकिन वे गिने-चुने हैं। दिन-रात सोशल मीडिया में क्रांति करने वाली जनता को अभी इस विषय पर राय देना बाकी है कि भगवान के मंदिर में कौन जा सकता है और कौन नहीं, यह तय करने का अधिकार मनुष्यों को कैसे है? जबकि संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देते हैं और धर्म व लिंग के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव से इन्कार करते हैं। याद रहे कि वर्ष 2006 में इसी तरह एक बड़ा विवाद पैदा हो गया था जब कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला ने दावा किया था कि केरल के सबरीमाला मंदिर में किशोरावस्था में उन्होंने प्रवेश किया था और वहां मंदिर के गर्भगृह में भीड़ के साथ पहुंच कर उन्होंने भगवान की प्रतिमा का स्पर्श किया था।

महिला उत्पीडऩ और अपमान का यह महज एक पहलू है। दूसरा पहलू उत्तरप्रदेश में देखने मिला, जहां तीन से छह साल की तीन बहनों को पहले उनके पिता ने त्याग दिया और मां जब अपने पिता के घर उन्हें लेकर पहुंची, तो नाना ने उन्हें पैसेंजर ट्रेन में छोड़ दिया। बच्चियों के रोने से यात्रियों का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ और पुलिस को इसकी सूचना दी गई। फिलहाल बच्चियां बाल संरक्षण गृह मेंंहैं। सेल्फी विद डाटर और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे सरकारी अभियानों के बीच समाज का सच यह है कि अभी भी भ्रूण परीक्षण, कन्या भ्रूण हत्याएं, लड़की पैदा होने पर मां को ताने मिलना और कई बार घर से निकाल देना बदस्तूर जारी है।

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