लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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मंगलवार से शुरू हो रहे बजट सत्र के उत्तरार्द्ध के हंगामेदार रहने की प्रबल संभावनाएं हैं| यानी बजट सत्र के पूर्वार्द्ध की भांति जनहित के मुद्दों को बिसरा कर तमाम राजनीतिक दल सियासी रोटियाँ सेंकने की तैयारियां कर चुके हैं| वैसे भी बजट सत्र के पहले भाग में तेलंगाना, एनसीटीसी एवं अन्य मुद्दों इतने हावी रहे कि रेल बजट तथा आम बजट को पेश करने के इतर कोई काम नहीं हो सका था| विपक्ष के साथ सरकार के सहयोगी दल भी सरकार की पेशानी पर बल डालने में कामयाब रहे हैं और आगे भी यही स्थिति अनवरत रहने की संभावना है| इस बार बजट सत्र के उत्तरार्द्ध में नक्सलवाद, इतावली पोतरक्षक मामला, दूध की बढ़ती कीमतें, आर्थिक-वित्तीय मोर्चे पर सरकार की नाकामी, महंगाई, अन्ना-बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार के विरुद्ध भावी गठजोड़ सहित कई अन्य ज्वलंत मुद्दे भी सरकार का मिजाज बिगाड़ने में सक्षम नज़र आते हैं| बची-खुची कसर यक़ीनन ममता बैनर्जी पूरी कर देंगी| कुल मिलाकर सरकार को कहीं ठौर नहीं है|

 

हाल के दिनों में नक्सलवादी आंदोलन सरकार के समक्ष एक नई चुनौती बनकर खड़ा हुआ है| पहले दो विदेशी पर्यटकों का अपहरण और रिहाई, फिर उड़ीसा में सत्तारूढ़ दल के विधायक हिक्का का अपहरण और अब छत्तीसगढ़ में सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का दिन दहाड़े भरी सभा में अपहरण यक़ीनन सरकार की रणनीतियों की पोल खोलता है| इन मामलों में राज्य सरकारें भी केंद्र सरकार की भांति बराबर की दोषी हैं| नक्सलवाद पर कोई भी राजनीति करने से बाज नहीं आ रहा| ऐसा प्रतीत होता है कि चाहे केंद्र हो या संबंधित राज्य सरकारें; कोई भी नक्सल समस्या का समाधान ही नहीं चाहता| सभी नक्सल समस्या के मुद्दे को चुनाव के दौरान भुनाने में लगे हैं| वैसे इस मुद्दे पर केंद्र दबाव बनाकर भी तो नक्सलवाद के विरुद्ध सीधी लड़ाई शुरू कर सकता है ताकि नासूर बन चुके नक्सलवाद से आंशिक छुटकारा तो मिले| कहा जा सकता है कि इस बार नक्सलवाद का मुद्दा सदन को गर्माने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा| आरोप-प्रत्यारोप के दौर चलेंगे और हमेशा की तरह हमें उम्मीद है कि कोई हल नहीं निकलेगा| फिर भी हंगामा ज़रूर होगा|

 

वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा इस बार सरकार को राजनीतिक मुद्दों पर घेरने की बजाए जन-सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर घेरेगी| इनमें नक्सलवाद का मुद्दा तो प्रमुखता से उठाया जाएगा; साथ ही दूध की बढ़ती कीमतों को लेकर भी सरकार की जन-विरोधी छवि को बेनकाब किया जाएगा| बीते शनिवार को ही दूध की बढ़ती कीमतों एवं इसके व्यापार में मोटा मुनाफा कमाते विचौलियों के विरोध में सैकड़ों की संख्या में दूध बेचने वालों ने जंतर-मंतर पर एकदिवसीय धरना प्रदर्शन किया था| चूँकि दूध हर घर की ज़रूरत है और इस मुद्दे ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है; लिहाजा दूध का मुद्दा उठाकर विपक्ष जनता की दुखती राग पर हाथ रखना चाहेगा; वहीं सरकार को बचाव के एवज में तर्कों का सहारा लेना पड़ेगा| इसी के साथ महंगाई का मुद्दा भी सरकार के सामने सुरसा के मुंह की भांति खुला हुआ है| फर्क सिर्फ इतना है कि सरकार के पास अब बचाव के तमाम रास्ते खत्म हो चुके हैं जो उसे जनता की नज़रों में आम आदमी की सरकार का तमगा देते|

 

एनसीटीसी के मुद्दे पर गैर-कांग्रेसी राज्य सरकारें अपना विरोध दर्ज कराती रहीं हैं और सदन में भी इस विधेयक के विरोध में उनका एकजुट होना तय है| आर्थिक मोर्चे पर नाकामी वाले बसु के बयान पर भी सियासी दल अपनी ढपली-अपना राग अलापने का निश्चय कर चुके हैं| ममता ने तो बाकायदा सरकार को १५ दिनों का अल्टीमेटम दे दिया है कि यदि उनके राज्य को वाम मोर्चा शासनकाल में दिए गए क़र्ज़ का सूद माफ़ नहीं किया तो सरकार को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे| एन सत्र के ममता की धमकी से सरकार सहमी हुई है और संख्याबल पर पुनः मंथन शुरू हो गया है| बाकी पिछली बार के बचे मुद्दे तो हैं ही सियासी दलों को जन-हित की चर्चा से दूर करने के लिए|

 

कुल मिलाकर मंगलवार से पुनः सदन में लोकतंत्र का विकृत स्वरुप देखने को मिलेगा और इसके गवाह बनेंगे आप और हम| हाँ; आश्चर्यजनक रूप से यदि कोई जन-हित का मुद्दा उठता है तो यह हमारी खुशनसीबी होगी| ऐसा नहीं है कि जो भी मुद्दे सदन में उठाये जाते हैं; सभी निरर्थक हैं| नहीं वे हमीं से जुड़े मुद्दे हैं किन्तु उनको प्रस्तुत करने एवं उनका समाधान खोजने हेतु जो तरीका अपनाया जाता है उससे कैसे सहमत हुआ जाए? सदन में आधे से अधिक मंत्री-सांसद गायब दिखते हैं, जनता की गाढ़ी-कमाई का अपव्यय होता है, राजनीतिक दलों के बीच सर-फुटव्वल की नौबत आती हैं किन्तु बाहर सभी एक हो जाते हैं| अपने हितों पर कुठाराघात होते देख नहीं सकते और जनता के सपनों को तोड़ने में लगे हैं| खैर यह तो होता आया है और शायद होता रहेगा| सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है और विपक्ष सरकार के मुकाबले मजबूत विकल्प पेश करने में असमर्थ रहा है| खैर देखिये; इस सत्र में सरकार के पिटारे से जनहित का कौन सा मुद्दा राहत प्रदान करता है और कब ऐसा प्रतीत होता है कि जनता की आवाज सही मायनों में बुलंद हो रही है?

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