लेखक परिचय

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी

लेखक एन.डी. सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष हैं।

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पंकज चतुर्वेदी

पिछले दिनों उत्तरपूर्व से सटे दार्जिलिंग क्षेत्र में एक लंबे समय से चले आ रहें गोरखा आंदोलनकारियों और पश्चिम बंगाल की नयी सरकार के मध्य एक नए समझौते पर सहमति बनी है ,यद्यपि यह समझौता सुभाष घिसिंग के संगठन के बजाय हाल ही के वर्षों में बने संगठन के साथ हुआ है| इस सबसे यह आशा है कि बरसो से धधक रही गोरखा अन्दोलन की यह ज्वाला कुछ शांत हो सकेगी |

एक त्रिपक्षीय समझौते पर भारत सरकार,बंगाल सरकार और विमल गुरंग के गोरखा जन मुक्ति मोर्चा ने हस्ताक्षर किये ,इसके तहत दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में एक पचास सदस्यीय इकाई होगी ,जिसके पैंतालीस सदस्य निर्वाचित होंगे एवं पांच सदस्यों को मनोनीत किया जायेगा |

भारत निर्माण के बाद से गोरखाओं को यह गलत फहमी रही है कि उनके साथ असामनता का व्यवहार होता है |अस्सी के दशक से इस अन्दोलन ने गति पकड़ी और फिर धीरे -धीरे इस तिल ने ताड़ का रूप ले लिया | यह बात अलग है कि आज इस क्षेत्र में घिसिंग का दल अप्रासंगिक हो चुका है ,इसीलिए तीन-चार साल पुराने गोरखा जन मुक्ति मोर्चा को इस समझौते में शामिल किया गया जिन्होंने हाल ही में कई बार सम्पूर्ण दार्जिलिंग क्षेत्र को बंद कर दिया था|

दार्जिलिंग और उससे सटा सिक्किम देश भर के सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है ,चाय बागान के साथ ही पर्यटन इस भाग का एक मुख्या उद्योग है | गोरखा आंदोलनों के चलते कई बार पर्यटन की गाडी पटरी से उतरती रही है और लागतार कई दिनों इन क्षेत्रों में प्रशासनिक व्यवस्थाए शून्य प्रतीत हुई है |इस समझौते ने बंगाल विभाजन की आशंकाओं को जन्म दिया और सिलीगुड़ी और आसपास के भागों में बंगाल और बांग्लाभाषा बचने के लिए बनी समितियों ने विरोध भी जताया |

दार्जिलिंग सहित देश का यह उत्तर पूर्वी भाग चीन ,नेपाल ,भूटान ,बंग्लादेश आदि से घिरा है| खतरों की बात करें तो भूटान से उतनी दिक्कत नहीं है | चीन की नीचता और नेपाल का ढुलमुल रवैया एक बड़ी समस्या है | आजादी के बाद से देश का यह भू भाग उतना सहज और सामान्य नहीं रहा सका है जितना देश के अन्य राज्य | इसी कारण से यह प्रगति की दौड़ में भी थोडा पीछे है | जबकि इनके पास पर्याप्त मात्रा में खनिज एवं वन सम्पदा है |हलाँकि सरकारी प्रयास पूरी ईमानदारी और शक्ती के साथ है फिर भी इस क्षेत्र में विकास के परिणाम अपेक्षा अनुरूप नहीं है |

असम में बोडो और उलफा से तनातनी आज भी जारी है ,गुवाहटी तक में अन्य हिंदुस्तानियों और हिंदी का विरोध आज भी है ,कभी सार्वजानिक तो कभी चुपके-चुपके | नागा लैंड में राजीव गाँधी के समय में तब के विद्रोही नेता लालडेंगा से हुए समझौते के बाद बनी शांति आज तक स्थाई नही हो सकी है |अब नागा रिकंसिलिएशन फोरम और नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नागलिम जैसे संगठन नागा लैंड में सरकार से जूझ रहें है लेकिन उचित समय पर सरकार से संवाद के लिए तैयार भी है अर्थात यह की चीजें सामान्य तो नहीं है | मिजोरम में सरकार और हमर पीपुल्स कन्वेंशन के मध्य संवाद-विवाद जारी है |यह समूह मिजोरम और मणिपुर दोनों राज्यों में सक्रिय है और एक पृथक हमर स्वायत्त काउन्सिल की मांग को लेकर जनता के बीच है | अरुणाचल प्रदेश में चीन दुःख दे रहा है |त्रिपुरा में नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा व्यवस्था विरोधी है ,मेघालय में गारो समुदाय का आतंकी संगठन है|

उत्तर पूर्व के इन सात राज्यों में स्तिथियाँ लगभग एक जैसी ही है ,इन राज्यों में बहुतायत आदिवासी समुदाय की है साथ ही इन राज्यों में और इनके आसपास के राज्यों जैसे बंगाल या सिक्किम में गोरखा भी एक बड़ी मात्रा में है| गोरखाओं के संगठन तो भारतीय गोरखा परिषद के सामंजस्य में काम करते है जबकि बाकि राज्यों में अलग-अलग संगठन है जिनकी अपनी ढपली और अपना ही राग है |

यह राज्य भौगोलिक रूप से तो देश के अन्य राज्यों से दूर है ही ,लेकिन अब पारिस्थित वश यह देश के अन्य राज्यों के मन और मष्तिष्क से भी दूर होते जा रहें है |दुखद यह है की इन राज्यों के भारतियों को यह बताना पड़ता है कि वे भी भारत वासी है ,कोई विदेशी नागरिक नहीं| चीन ने धीरे –धीरे अरुणाचल पर अपने दांत गडाना शुरू कर दिया है |तवांग का मुद्दा भी भविष्य में कश्मीर समस्या सा रूप ले सकता है ,ऐसा चीन का प्रयास है |इसके साथ नागा लैंड पर भी चीन लालच भरी निगाहों से देख रहा है, वैसे भी नागा लैंड में चीन का भ्रामक प्रचार यह है कि नागा-लैंड के लोग मूलतः चीन के है |

ऐसे में पहल यह होनी चाहिए की दार्जिलिंग जैसी शुरुआत इन सातों राज्यों में भी हो | अब तक के सरकारी प्रयास सुखद दिखते जरूर है,पर यथार्थ में सुखद एवं सशक्त नहीं है ,अभी इन राज्यों में आंदोलनकारियों और आम जनता की बीच दूरी है लेकिन कब यह दूरी मिट जायेगी नहीं कहा जा सकता है |अभी यह संगठन उतने हिंसक भी नहीं हुए है जितने कश्मीर के संगठन है| शायद धन अभाव के चलते ऐसा हो पर चीन की चली तो धन अभाव की सम्पति और अहिंसा से हिंसा का परिवर्तन ,दोनों ही संभव है |

अब तो शीघ्र ही इन सब की जन भावनाओं को समझ कर उन्हें यह बतलाया जाये की सूरत भिन्न हो सकती है लेकिन सोच और संस्कृति का मूल भारत और भारतीयता ही है क्योकि दक्षिण पंथी पहले से ही इस पूरे क्षेत्र में ईसाई विरुद्ध अन्य का वातावरण बनये हुए है | उस पर चीन की चालाकियां कही देश पर भविष्य में भारी न पड़ें |

लेखक –एन .डी.सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष है

 

 

 

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