लेखक परिचय

राकेश उपाध्याय

राकेश उपाध्याय

लेखक युवा पत्रकार हैं. विगत ८ वर्षों से पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए हैं.

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-राकेश उपाध्‍याय

महंगाई डायन खाय जात है, गीत उनके लिए तो ठीक है जो सचमुच कुछ अच्छा कमाते हैं। उनकी बीवियां तो अपनी पड़ोसन को कह सकती हैं कि उनके श्रीमान जी अच्छा कमाते हैं, खूब कमाते हैं लेकिन विकराल और कमर तोड़ महंगाई घर में कुछ बचने नहीं देती। लेकिन उन महिलाओं के मुंह से क्या निकलता होगा जिनके पति हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद अपने जीवन में खुशियों के कुछ अधेले इकट्ठा कर पाने में नाकामयाब रहते हैं।

आज पानी को लेकर लंबी कतारे हैं, राशन की दुकान पर, ट्रेन में सवारी के लिए नगरीय स्टेशनों पर साधारण दर्जे का टिकट लेते समय और सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवा लेते समय भी लंबी कतारे हैं। शहरों में गरीब और निम्न मध्यम वर्ग का जीवन कतारों का जीवन है, कहना कुछ गलत नही है। और इन लंबी कतारों में जो खड़े होते हैं, उनसे पूछा जाना ही चाहिए कि आखिर कतार में खड़े रहने की उनकी विवशता क्यों है। क्या वे जिंदगी भर कतारों में ही खड़े रहने के लिए पैदा हुए हैं। उनके जीवन का कीमती समय कहां जाया हो रहा है और क्यों जाया हो रहा है। उनकी इस दुर्दशा के वास्तविक अपराधी कौन हैं।

पूर्व उप राष्ट्रपति स्व. भैरोसिंह शेखावत और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अक्सर कहा करते थे कि गरीबी व्यवस्था की देन है। गरीबी के पीछे व्यक्ति का दोष कम, व्यवस्था का दोष ही ज्यादा है। यदि व्यवस्था गरीबी बढ़ाने वाली और इंसान को काहिल, पलायनवादी बनाने वाली है तो फिर अच्छाई की उम्मीद करना व्यर्थ है। अच्छा-भला इंसान भी व्यवस्था के मकड़जाल में उलझकर बेइमान, भ्रष्ट, गैर जिम्मेदार, कामचोर, काहिल, और आलसी बनने को मजबूर कर दिया जाता है।

व्यवस्था के लिहाज से देखें तो सच्चाई आईने की तरह साफ है। देश का सत्ता प्रतिष्ठान आज दलालों के हिसाब से चल रहा है। क्या केंद्र और क्या राज्य। मुनाफाखोर, रिश्वतखोर लोग इस देश के नीतिनियंता बन गए हैं। भ्रष्ट कार्य संस्कृति को फलने-फूलने का मौका भी इस व्यवस्था ने ही दिया है। आज लोगों का इस व्यवस्था से विश्वास लगभग उठ चुका है। हर स्तर पर और हर जगह लोग उस व्यक्ति की खोज में लगे रहते हैं जो उनका काम करा सके और इसके लिए उन्हें कीमत कितनी ही क्यों न देनी पड़े।

इस धंधे ने बाजार में पीआर (जनसंपर्क),लाइजनिंग, मैनेज करने जैसे कई शब्द और काम दिए हैं और इनसे श्रमहीन किंतु धन के अवैध लेन-देन जैसे चातुर्यपूर्ण रोजगार को जबर्दस्त उछाल मिली है। इसके विपरीत यदि गांव का आदमी गांव में रहकर रोजगार करने का इच्छुक है तो उसकी प्रतिभा के अनुकूल रोजगार सुलभ करा पाने में हमारी व्यवस्था नाकाम हो चुकी है।

जाहिर है कि यह व्यवस्था उन्हें ही संरक्षण और विकास के अवसर दे रही है जिनके पास पैसा और पहुंच है। प्रतिभा यहां दम तोड़ने को मजबूर है। इस अराजकता के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में अनूठी प्रतिभाएं चमकती दिखायी देती हैं। उनकी प्रतिभा को सलाम करते हुए यह कहना कतई गलत नहीं है कि ये चमकती-दमकती प्रतिभाएं हिंदुस्तान की वास्तविक प्रतिभाओं का सतही तौर पर दिग्दर्शन है। असल प्रतिभाओं को तो यह व्यवस्था लील जा रही है। यह व्यवस्था यदि आज बदले तो जो सितारे चमक रहे हैं, उनकी रंगत तुरंत फीकी पड़ने लगे और गंवई हिंदुस्तानी प्रतिभा का बेजोड़ रूप देखकर संसार अचंभित रह जाएगा।

मसलन, कला के ही क्षेत्र को लें। भारत में प्रादेशिक या आंचलिक स्तर पर विविध लोक कलाओं की इतनी भरमार है कि यदि फिल्म निर्माता थोड़ा विकेंद्रित होकर उन पर केंद्रित हो जाएं तो कथित मुंबइया मार्का सुपरस्टारों को लेने के देने पड़ गए होते। उनका दर्शक वर्ग भी अपने आप सिमटकर कुछेक शहरों तक सीमित गया होता। गुल्ली डंडा जैसे खेल, छल कबड्डी आल-ताल, कुश्ती आदि को आंचलिक स्तर पर पर ही प्रतिष्ठा, पैसा और प्रसारण की व्यवस्था मिल जाए तो किसे फुर्सत है कि वह क्रिकेट के कलंकित बल्ले और गेंद को देखने में अपना अमूल्य समय टीवी पर बर्बाद करे।

देश में आंचलिक प्रतिभाएं आज भी घुटते रहने को मजबूर हैं। ‘पीपली लाइव’ फिल्म के जारी होने के बाद समाचार पत्रों में एक खबर छपी थी, वह लोकजीवन और उसकी अनमोल कला के कथित शोषण से पर्दा उठाती है। इस फिल्म के एक लोकप्रिय गीत की रचना से लेकर उसके गायन तक में जिन लोक कलाकारों का इस्तेमाल किया गया, उन्हें टका भर रकम देकर फुर्सत पा ली फिल्मी दुनिया के स्वनामधन्य लोगों ने। तिस पर राष्ट्रमण्डल खेलों की धुन रचने वाले रहमान को जब साढ़े पांच करोड़ रूपये के भुगतान की खबर आई तो जैसे कलेजा फट गया।

एक से एक गुदड़ी के लाल हमारे लोकजीवन में आज भी हैं जो मौका मिले तो पूरी दुनियां में छा जाएं। ऐसी कुछ प्रतिभाओं को हमने उठते हुए बीते दशक में देखा है जैसे पद्मश्री तीजनबाई आदि। छत्तीसगढ़ की पंडवानी लोकगीत एवं नाट्य कलाकार तीजनबाई ने अपनी ठोस आवाज़, अभिनय, नृत्य और संवाद के दम पर लोककला को जोर-शोर से प्रचारित किया। ऐसी कितनी ही कलाएं हिंदुस्तान में सर्वत्र पसरी पड़ी है। पूर्वी उत्तरप्रदेश के जिस अंचल से गंगा गुजरती हैं, वहां प्रयाग से आगे बढ़ने पर मीरजापुर, वाराणसी, सोनभद्र, गाजीपुर में कजरी, कौव्वाली समेत अनगिनत नाट्य और गायन विधाएं मिलती हैं, जिनमें लोकजीवन आज भी पूरे उमंग से रस लेता है। अखिल भारत के हर कोने में इस प्रकार की विशेष कला शैली देखने को मिलती है जो वास्तव में देश की पहचान है। किंतु इन आंचलिक कलाओं और उसके वैविध्यपूर्ण जीवनदृष्टि को जो प्रतिष्ठा हिंदुस्तान में मिलनी चाहिए वह आज तक नहीं मिल सकी है। इसके विपरीत बदलते आधुनिक परिवेश और शहरी संस्कार के चक्कर में इस आंचलिकता का सारा मजा ही जैसे कहीं गायब होता दिख रहा है। सूचना प्रौद्यागिकी के इस युग में आंचलिकता को, अपने देसी रहन-सहन, देसी रोजगार और जीवन शैली को नये सिरे से संवारने की जरूरत है।

डा. राममनोहर लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आजाद भारत में जिस विकेंद्रीकरण की बात की थी उसमें यह सब बातें समाहित थीं। लोकजीवन के वैविध्यपूर्ण स्वरूप को बनाए रखने, रोजी-रोजगार की व्यवस्था गांव और घर के स्तर पर करने के लिए ही गांधी ने आजादी के पूर्व हिंद स्वराज का मंत्र दिया। कालांतर में उसी को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद के रूप में सांस्कृतिक स्तर पर कुछ अलग ढंग से व्याख्यायित किया। किंतु आजाद भारत ने इन सभी विचारकों की घोर उपेक्षा की। परिणामत: सारा देश आज त्राहि माम कर रहा है। इस देश की रग पर कहीं भी हाथ रखिए, भीषण दर्द और कराह उठने लगती है।

कश्मीर में पत्थरबाजी हो रही है, तो क्या बाकी देश में स्थिति कोई बहुत अच्छी है। किसानों, भूमिहीनों, जंगल और गांव वासियों पर गोलियां चलती हैं तो क्यों चलती हैं। जनता को उनकी जगह-जमीन से खदेड़ने का मानो देश में अभियान चल रहा है। नवकुबेर समूचे देश को पैसे के बल पर और सत्ता प्रतिष्ठान की मदद से बंधक बनाकर अपने ख्वाबों को मनमाने ढंग से पूरा करने में जुट गए हैं। एक जमाना था कि कूबेरों और सत्ता प्रतिष्ठान की मनमानी को कुचलने के लिए भारत का राजनीतिक नेतृत्व स्वयं पहल करता था। केरल में अपनी पार्टी की सरकार की पुलिस द्वारा निहत्थों पर चलायी गई गोली के खिलाफ ड़ॉ. राममनोहर लोहिया मैदान में खुद ही खम ठोककर खड़े हो गए थे। उत्पीड़ित जनता के बीच जाने में उन्हें कोई डर नहीं रहता था। वह जनता के दुख-दर्द को छाती से चिपकाए घूमने वाले महापुरूष थे। जेपी का जीवन भी ऐसा ही था। राजसत्ता के माया-मोह से निर्लिप्त लोकतंत्र की रक्षा के लिए उन्होंने जनता के बीच जाने का निर्णय लिया। शासन की हिटलरशाही के सामने उन्होंने तब घुटने टेकने से इंकार कर दिया। उनकी प्रेरणा से चंबल के बीहड़ों के कुख्यात डकैतों की जिंदगियों में नया सवेरा रोशन हुआ था। देश में हजारों की संख्या में युवा नेता उनकी प्रेरणा से खड़े हुए। लेकिन काल की महिमा अजीब है, जेपी और संपूर्ण क्रांति की माला जपते हुए अपनी राजनीति चमकाने वालों में एक भी नेता आज देश का दिल पूरे तौर पर अपने साथ रखने में कामयाब नहीं है। दुर्भाग्य कि आज देश के पास जेपी और लोहिया की कद-काठी, हिम्मत और ताकत का कोई नेता नहीं है। आज कोई नहीं है जो देश में किसानों पर चलती गोली को अपने सीने पर झेले, कोई नहीं है जो कश्मीर के पत्थरबाजों के बीच जाकर उन्हें शांत रहने के लिए ललकारे और पुचकारे, कोई नहीं है जो दण्डकारण्य में भड़की विद्रोह की लपटों को शांत करने का जिम्मा ले सके। आज तो राजनीतिक नेतृत्व ही धनकूबेरों के भरोसे अपनी राजनीति चमकाने और संवारने में लगा है। लोकतंत्र और जनता केवल राजनीतिक कथा बांचने और बेचने के औजार मात्र रह गए हैं जिनका उपयोग केवल काम पूरा होने तक ही रहता है।

हमारे संपूर्ण राजनीतिक नेतृत्व का इससे ज्यादा नैतिक पतन और क्या हो सकता है कि लोकतांत्रिक प्रणाली में वे केवल प्रशासन और कूटनीति के भरोसे ही देश की समस्याओं को सुलझाने के पक्षधर बन गए हैं। देश इसी के दुष्परिणाम झेल रहा है। जब देश और लोकतांत्रिक प्रणाली समग्र राष्ट्रीय सोच से अनुप्राणित ईमानदार नेताओं की बजाए प्रशासन, पुलिस, छल-प्रपंच और कूटनीति के आधार पर चलने लगती है, यकीं जानिए, तब देश टूटने लगता है।

एक बात तो हमारे हुक्मरां को समझ लेनी चाहिए कि सारा देश दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और मुंबई नहीं बन सकता। बनाया भी नहीं जाना चाहिए। गांवों का कायाकल्प अर्थात ग्राम परिधि के आस-पास ही व्यापक अवस्थापना सुविधाएं, रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा के अवसर उपलब्ध कराकर देश को हमें नये युग में ले जाने की सोचना चाहिए। तरीका है सत्ता का विकेंद्रीकरण। लोकराज की स्थापना। इस लोकराज में किसी राजमार्ग, बांध, खदान और खनन के लिए केवल नई दिल्ली, लखनऊ, रायपुर, बंगलुरू, देहरादून, रांची या भुवनेश्वर से ही संस्तुति नहीं लेनी पड़ेगी, इस लोकराज में वह लोग भी निर्णय प्रक्रिया में शामिल किए जाएंगे जो सदियों से उस भू-भाग पर रहते आए हैं जहां पर कि ये काम होने हैं। अब केवल हानि ही उनके भाग्य में नहीं आएगी वरन् लाभ में उनकी भी हिस्सेदारी होगी। फिलहाल तो लाभ में उनकी कोई हिस्सेदारी नहीं है, हां, बांध और खनन से हो रहा नुकसान उनके भाग्य में जरूर हमेशा के लिए लिख दिया जाता है। हमारे नीति नियंताओं को शीघ्र इस व्यवस्था को बदलने की सोचना चाहिए। किसी महिला को यह कहने की आवश्यकता ही नहीं पड़नी चाहिए कि उसके पति कमाते तो पर्याप्त है और महंगाई सब कुछ निगल जाती है। हमें तो उस दिन के लिए तैयारी करनी चाहिए कि जब हमारी महिलाएं यह कहने लगें कि सइयां कमाएं ना कमाएं, हमारे घर में ईश्वर का दिया ग्रहण करने योग्य सब कुछ उपलब्ध है। किसी को हम अपने घर और गांव से भूखा नहीं जाने देंगे और ना ही किसी परिवार के सामने निराशा, हताशा में आत्महत्या करने की नौबत आने देंगे।

और यह कोई दुःस्वप्न नहीं है। संकल्प और पराक्रम द्वारा अगर हम आज यह व्यवस्था बदल दें तो कल ही दिन बदलने लगेगा। अब प्रश्न उठता है कि क्या बदलें और क्या लाएं। तो उत्तर स्पष्ट है। गांधी के हिंद स्वराज का सृजन हुए सदी बीत गई। आधुनिक जीवन की आवश्यकता से तालमेल बिठाकर वास्तव में यदि गांधी का पुनर्पाठ किया जाए तो हमें रास्ता जरूर मिल सकता है।

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2 Comments on "सखी सइयां कहां कमात हैं!"

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Anil Sehgal
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सखी सइयां कहां कमात हैं! – by – राकेश उपाध्‍याय राकेश जी की चिंता है कि, देश की व्यवस्था के कारण, हमारे लोक जीवन में जो एक-से-एक गुदडी के लाल पड़े हैं, उनको मौका नहीं मिल रहा पा रहा कि वह दुनिया में समा जायें तथा कश्मीर की पत्थर बाज़ी, किसानों, भूमिहीनों, जंगल और गाँववासियों पर गोलियां चलना कैसे रुकेंगी. इस व्यवस्था के कारण से कैसे मुक्ति मिले ? क्या बदलें और क्या लाएं ? और इसे खोजने के लिए राकेश जी महात्मा गांधी का पुनर्पाठ करना सुझाते हैं. मैं कहूँगा कि जन साधारण स्वयं, यदि स्थानीय स्तर पर घर-घर… Read more »
श्रीराम तिवारी
Guest

sakhi mahapurush bade -bade is desh men ;
ifraat se hot jaat hain .fir bhi shoshan ki vyvastha dayan khaye jaat hai .

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