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नरेश शांडिल्य

‘चार रईसजादों ने चलती कार में एक लड़की से रात भर किया बलात्कार’, ‘पॉश कालोनी की तीन लड़कियां वेश्यावृत्ति का धंधा करती गिरफ्तार’, ‘नशे में धुत्त अमीरजादों ने पटरी पर सो रहे चार लोगों पर अपनी कार चढ़ाई’, ‘नेताजी के बिगड़ैल शहजादे ने पुलिस वाले को पीटा’, …ऐसी खबरें अक्सर हम अखबारों में पढ़ते रहते हैं। हम महसूस कर सकते हैं कि ऐसी खबरों की तादाद दिन-प्रति-दिन बढ़ रही है।

अभिजात्य वर्ग के युवक-युवतियों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति आज सामाजिक चिन्ता का कारण बनी हुई है। अभावों से ग्रस्त गरीब तबकों में तो आपराधिक प्रवृत्ति की अनेक वजहें हो सकती हैं और समझी भी जा सकती हैं लेकिन वैभवपूर्ण जीवन शैली में जीवन-यापन करने वाले कुलीन वर्ग में भी ऐसी प्रवृत्तियों का बढ़ना, वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में चल रहे संक्रमण काल का सबसे चिंताजनक पहलू है।

सम्पन्नता और उच्च शिक्षा उन्हें ‘रचनात्मकता’ की ओर क्यों नहीं मोड़ रही, उन्हें ‘उद्दंड’, ‘उच्छृंखल’ और ‘विध्वंसक’ क्यों बना रही है? क्या उन्हें लगता है कि पैसे के बल पर वे कुछ भी कर सकते हैं …यहां तक कि अपराध भी? और पैसे के बल पर वे किसी भी सजा से बच भी जाएंगे? …इन सब प्रश्नों और इन प्रश्नों के कारणों पर आज गहन विचार करने की आवश्यकता है।

वास्तव में आज की भौतिकवादी बाजारू सोच, आज की मूल्य व संस्कारविहीन शिक्षा पद्धति, मां-बाप की जगह आयाओं और नौकरों द्वारा बच्चों की परवरिश तथा नई पीढ़ी में बढ़ती जा रही ‘व्यक्तिवादी-मानसिकता’ के साथ-साथ घटता सामाजिक-चरित्र तथा गलत-सलत तरीकों से कमाया-जुटाया गया अपार धन ही अमीरजादों में बढ़ती आपराधिक-प्रवृत्ति के मूल कारण हैं।

आखिर कहां जा रहे हैं हम? तरक्की के नाम पर ये किन रास्तों से गुजर रहे हैं हम? इतनी धान-सम्पत्ति, इतना मान-सम्मान पाकर भी अगर हमारे कालीनों के नीचे गन्द-ही-गन्द है, तो हमें सोचना ही चाहिए कि आखिरकार यह माजरा है क्या?

हमारी संस्कृति में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। हमारी संस्कृति चारों को ही प्राप्त करने पर बल देती है। वह अर्थ और काम को निष्कृष्ट नहीं समझती, उनसे परहेज नहीं करती। लेकिन वह ‘अर्थ’ और ‘काम’ में ‘धर्म’ और ‘मोक्ष’ का ध्यान रखने की सलाह देती है। मनुष्य के आचरण और जानवर के आचरण में जो भेद होना चाहिए, उसके प्रति हमें चेताती है, सचेत करती है, सावधान करती है।

हमारी संस्कृति मानती है कि विषय-वासना में फंसना और फंसे रहना मानव-मन का स्वभाव है। लेकिन विषय-वासना के कीचड़ से किस प्रकार निकला जाए इसका रास्ता भी सुझाती है।

पिछले दिनों मैं महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताओं का अनुवाद पढ़ रहा था। उनकी एक कविता में ऐसा भाव आता है कि क्योंकि मनुष्य तन चौरासी लाख योनियों के बाद प्राप्त होता है, अत: ईश्वर भी मनुष्य से कुछ अलग अपेक्षाएं रखता है। कविता के सार-बिन्दु कुछ इस प्रकार हैं, ”ईश्वर कोयल से ‘कुहू-कुहू’ की अपेक्षा रखता है, पेड़ से छाया और फल देने की अपेक्षा रखता है। फूल से रंग और सुगंध की अपेक्षा रखता है लेकिन मनुष्य की ईश्वर पूरी तरह से परीक्षा लेना चाहता है।

उसने मनुष्य को दुख दिया है और वह अपेक्षा करता है कि वह उस दुख में ही सुख ढूंढे। उसने मनुष्य को अंधकार दिया है और चाहता है कि वह अंधकार से ही प्रकाश पैदा करे। उसने मनुष्य को मृत्य बनाया है लेकिन वह चाहता है कि मनुष्य इसी ‘मृत्य’ से ‘अमृत्व’ को प्राप्त करे। और ईश्वर को पूरा विश्वास भी है कि मेरा लाडला मनुष्य यह सब-कुछ कर लेगा। क्योंकि वह सारी सृष्टि का मुकुट-मणि है। इसलिए वह मेरी आशा को व्यर्थ नहीं जाने देगा।”

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की यह कविता हमारे सामने एक चुनौती की तरह है। यह कविता ‘भारतीय संस्कृति की मनुष्य से अपेक्षा’ के रूप में भी उद्धृत की जा सकती है। बल्कि कहें कि यह एक सार्वभौमिक अपेक्षा है। एक चुनौतीभरी अपेक्षा है।

लेकिन आज के माहौल में सब कुछ इसके उलट होता दिखाई देता है। आज चारों ओर हाय-हाय और चीत्कार मची है। मनुष्य पशु से भी नीचे गिर चुका है। जिसके पास कुछ नहीं है, जो अभावग्रस्त है उसकी छोड़ो, जिसके पास सब कुछ है, जो सर्वसम्पन्न है, उसके पास भी मन की शांति नहीं है, सब्र नहीं है, संयम नहीं है। ‘देवत्व’ प्राप्ति की बात छोड़ो वह तो ‘पशुत्व’ को भी लजाने वाले ‘पशुत्व’ के रास्ते पर चल रहा है। ऊपर से तुर्रा यह कि सौ-सौ चूहे खाकर भी वह ‘हाजी’ कहलाना चाह रहा है।

तथाकथित ‘छोटे लोगों’ की कल्चर में मानवीय-पतन की इतनी भरमार नहीं जितनी तथाकथित ‘बड़े लोगों’ की कल्चर में देखने को मिल रही है। ‘बड़े लोगों’ के यहां मानवीय-पतन के शर्मनाक-अफसाने रोंगटे खड़े कर देने वाले होते हैं किन्तु हमें उनके बारे में पता नहीं होता।

दरअसल ‘बड़े लोग’ अपनी गन्द को कालीनों से ढंकना अच्छी तरह जानते हैं। यदा-कदा ही उनके कालीनों के नीचे छिपी गंद का पर्दाफाश हो पाता है … लेकिन जब होता है तो रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता भी शर्म से पानी-पानी हो जाती है।(भारतीय पक्ष)

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