लेखक परिचय

अनूप आकाश वर्मा

अनूप आकाश वर्मा

लेखक स्व तंत्र टिप्प णीकार व ब्लॉगर हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


adwaniज़ाहिर है, भारतीय राजनीति की दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भाजपा इन दिनों आगामी लोकसभा चुनावों के लिए मुद्दे और नेता की तलाश में जुटी हुयी है। अरसे बाद कांग्रेस के उपाध्यक्ष पद पर पड़ी धूल को हटाते हुए उस पर राहुल गांधी की ताजपोशी की गयी। मौके की नज़ाकत को समझते हुए कुंभ में गंगत्तव से लबालब विश्व हिन्दू परिषद् और आरएसएस भी नरेन्द्र मोदी की हुंकार भर रहा है। खुद नरेन्द्र मोदी गुजरात के विकास मॉडल को समूचे देश का विकास मॉडल साबित करने का दंभ भर चुके हैं। हिंदुत्तव का मुद्दा फिर भाजपा को जकड़े रखना चाहता है। भाजपा के नवनियुक्त अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने फिर दोहराया है कि करोड़ों हिन्दुओं की अस्मिता का ख्याल रखते हुए राम मंदिर राम जन्मभूमि पर ही बनना चाहिए। मगर गौर कीजिये, ‘राम मंदिर’ और ‘विकास’ के बीच खड़े भाजपा के लौह योद्धा ने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से अभी हार कहाँ मानी है? भूलिए मत कि भाजपा के अबतक के इतिहास का यह लाल कृष्ण आडवाणी अध्याय अभी पूर्ण नहीं हुआ है। नब्बे के दशक में हिंदुत्तव की हुंकार भर करोड़ों हिन्दुओं में नई चेतना का सूत्रपात कर भाजपा को सत्ता का स्वाद चखाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी आज अपनी ही मौलिकता को सवालों के कठघरे में खडा देख कर भी हार मानने को तैयार नहीं हैं। हार माननी भी नहीं चाहिए अगर युद्ध जीत लेने का दम योद्धा रखता हो। कभी पार्टी के कर्णधार कहे जाने वाले आडवाणी हार मानने वालों में से हैं भी नहीं। मगर इतना तो उन्हें भी तय हो गया है कि आगामी लोकसभा चुनाव की पथरीली राहों में पार्टी उन्हें अपना चेहरा बनाने के लिए कदापि तैयार नहीं है। संघ पहले ही इस मसले पर आँखें तरेर चुका है। घटक दलों को छोड़ दें तो भाजपा के सभी बड़े नेता गाहे-बगाहे नरेन्द्र मोदी को ही राष्ट्रीय स्तर पर लाने की बात कर चुके हैं। तारीफ़ तो लाल कृष्ण आडवाणी भी नरेन्द्र मोदी की करते हैं मगर एक व्यवहारिक सत्य है कि नेतृत्व की बागडोर जबतक आगे हस्तांतरित ही नहीं होगी तब तक कुछ हो ही नहीं सकता। इसलिए भी भाजपा अपने अन्दर खानों से उठ रहे मोदिज्म को एकमत हो कर स्वीकारने की हिम्मत नहीं कर पा रही है। मगर वो कहते हैं न कि यदि व्यक्ति अपना इतिहास खुद ही लिखने लगे तो वह कभी पूर्ण ही नहीं हो सकता। यही दशा इस वक्त भाजपा के इस लौह पुरुष की है। इसलिए इसमें ज़रा भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि यदि वो आगामी लोकसभा चुनाव लड़ते हैं तो तय मानिए कि प्रधानमंत्री पद पर उनकी दावेदारी अभी समाप्त नहीं हुयी है। भाजपा के इतिहास का जो ‘लाल कृष्ण आडवाणी’ अध्याय वो लिख रहे हैं अभी उसमें कुछ पन्ने और लिखे जाने बाकी हैं। दूसरी ओर, हकीकत ये भी है कि भाजपा आडवाणी की चुप्पी को चुपचाप देखकर नरेन्द्र मोदी के उदघोष के साथ आगे बढना चाहती है। हो सकता है कि लाल कृष्ण आडवाणी को लेकर भाजपा का एक धड़ा राम मंदिर मुद्दे के बहाने नब्बे का इतिहास दोहराने का स्वप्न बुन रहा हो, मगर भाजपा का एक मजबूत धड़ा 2009 के इतिहास से सबक लेना चाहता है। यही से शुरू होती है भाजपा के राम मंदिर मुद्दे से लेकर विकास के मुद्दे तक पहुँचने की राजनीतिक यात्रा। जिसे अंदरूनी कलह के चलते भाजपा फिर हिंदुत्तव में समेत देने पर अमादा है। यदि ऐसा कर पाने में भाजपा सफल हो जाती है तो फिर यकीन मानिए दिल्ली के श्रीराम कालेज ऑफ़ कॉमर्स में दिया गया नरेन्द्र मोदी का भाषण ज़हन से वैसे ही हवा हो जाएगा जैसे जयपुर के चिंतन शिविर में दिए राहुल गांधी के भाषण को गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के बेमतलब बयान ने हवा कर दिया था।

Leave a Reply

2 Comments on "लौह पुरुष ने अभी हार कहाँ मानी है ?"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
श्रीराम तिवारी
Guest

मैं आपसे सहमत हूँ.

अनूप आकाश वर्मा
Guest

जी..बहुत-बहुत शुक्रिया…

wpDiscuz