लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

हमारे भारत में अनेक लोग हैं जो कम्युनिस्टों की बुराईयों को जानते हैं लेकिन अच्छाईयों को नहीं जानते। वे यह भी नहीं जानते कि कम्युनिस्टों की ताकत का स्रोत क्या है ? कम्युनिस्ट झूठ बोलकर जनता का विश्वास नहीं जीतते,कम्युनिस्ट सत्य से आंख नहीं चुराते। जो कम्युनिस्ट झूठ बोलता है जनता उस पर विश्वास करना बंद कर देती है। मार्क्सवाद और असत्य के बीच गहरा अन्तर्विरोध है।

कार्ल मार्क्स ने सारी दुनिया के लिए एक ही संदेश दिया था वह था शोषण से मुक्ति का। उसने व्यक्ति के द्वारा व्यक्ति के शोषण के खात्मे का आह्वान किया था। सारी दुनिया में कम्युनिस्ट इसी लक्ष्य के लिए समर्पित होकर काम करते हैं। वे किसी एक के नहीं होते। समूची मानवता के हितों की रक्षा के लिए काम करते हैं। उनके काम और विचार में कोई अंतर नहीं होता। इस अर्थ में हमें कम्युनिस्टों को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

मेरे कहने का यह अर्थ नहीं है कि कम्युनिस्टों में कोई दोष नहीं है। जी नहीं, उनमें भी वे सब दोष हैं जो हम सबमें होते हैं। वे इसी समाज से आते हैं। लेकिन वे दोषों से मुक्त होने की कोशिश करते हैं। जो कम्युनिस्ट मानवीय दोषों को कम करते हैं और निरंतर समाज और स्वयं को बेहतर बनाने और लोगों का दिल जीतने,आम जनता की सेवा करने के बारे में प्रयास करते हैं उन्हें जनता भी दिल से प्यार करती है। ऐसे ही महान कम्युनिस्ट क्रांतिकारी हैं फिदेल कास्त्रो।

फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में जो कमाल किया है उसे इस देश में 60 साल के शासन में भी हम नहीं कर पाए हैं। जरा देखें कम्युनिस्टों के क्या है क्यूबा में और फिदेल कैसे काम करते हैं। फिदेल कास्त्रो का मानना है विचार हथियारों से ज्यादा शक्तिशाली होते हैं। इसी के साथ मैं यह कहता हूँ कि शिक्षा ही वह उपकरण है जिसके जरिए मानव कहे जाने वाले इन जीवों का विकास हुआ है, जो सहज बुध्दि या प्राकृतिक नियमों से नियंत्रित होते हैं। डार्विन ने यही दिखाया है और आज इससे कोई इनकार नहीं करता…मैं विकास के सिद्धांत की बात कर रहा हूं। मुझे वह क्षण याद है जब पोप जॉन पॉल द्वितीय ने कहा था कि विकास का सिद्धांत सृजन के सिद्धांत का विरोधी नहीं है। मैं इस तरह के कथनों की बहुत प्रशंसा करता हूं क्योंकि ये वैज्ञानिक सिद्धांत और धार्मिक विश्वास में परस्पर विरोध पर विराम लगाते हैं। इन मानवों को यदि जंगल में छोड़ दिया जाए तो वे जानवरों की तरह ही रहेंगे। वे बुद्धि संपन्न जीव हैं और हम जानते हैं कि मानव खोपड़ी में क्या है। हम यह भी जानते हैं कि केवल मानव ही ऐसे जीव हैं जिनका मस्तिष्क जन्म के ढाई वर्ष बाद तक विकसित होता रहता है। आप विश्वविद्यालय के छात्र हैं और आपने इस बारे में कहीं पढ़ा होगा। प्रतिभा के विकास में इसका बहुत प्रभाव पड़ता है।

यदि बच्चों को ढाई साल की उम्र तक सभी पोषक तत्व नहीं दिए गए तो वे जब छह वर्ष की आयु में स्कूल जाएंगे तो वे पर्याप्त पोषक तत्व पाने वाले बच्चों की तुलना में कम बुद्धि के साथ स्कूल जाएंगे । मैं यह कहना चाहता हूं कि यदि हम बराबरी के अधिकार की पैरवी करना चाहते हैं तो हम छह वर्ष की आयु में बच्चे को जन्मजात मानसिक क्षमता के साथ स्कूल भेजने के अधिकार की बात करें। हम जानते हैं कि जिन बच्चों को इस प्रारंभिक उम्र में पोषक तत्व नहीं मिलते और दुनिया में इस तरह के करोड़ों बच्चे हैं जब वे स्कूल जाते हैं, बशर्ते कि स्कूल हों और उन्हें पढ़ाने के लिए सक्षम अध्यापक हों, तो उनके पढ़ने की बहुत कम संभावनाएं होती हैं। हालांकि ऐसे भी मामले हैं जहां इस अवस्था में पर्याप्त पोषक तत्व तो मिलते हैं लेकिन बाद में उनके लिए कोई स्कूल या अध्यापक नहीं होते ।

लेकिन मूल रूप से तीसरी दुनिया के देशों में बसे दुनिया के अस्सी प्रतिशत मानवों का क्या हश्र होता है। इन्हीं क्षेत्रों में गरीब लोग बसे हैं जो विकसित क्षमता तो दूर जन्मजात क्षमता को भी बचा कर नहीं रख सकते। यहां पर स्कूल भी नहीं है।

दुनिया में 86 करोड़ बालिग निरक्षर हैं। बालिगों की बात करने के साथ-साथ वे यह भी बताते हैं कि इन 86 करोड़ निरक्षर बालिगों में से 90 प्रतिशत तीसरी दुनिया में रहते हैं। लेकिन अत्यधिक विकसित देशों में भी निरक्षरता है। उत्तर में हमारे महान पड़ोसी देश में लाखों निरक्षर हैं (सीटियां और कोलाहल), पूरी तरह से निरक्षर। साथ ही लाखों व्यावहारिक निरक्षर भी हैं और इसे कोई… (डॉक्टर डॉक्टर की आवाजें) वह क्या है, डॉक्टर, डॉक्टर के बारे में क्या बात है? (उन्हें कुछ बताया जाता है)।

मैंने लाखों की बात की, लेकिन वास्तव में इनकी संख्या करोड़ों में है, विकसित देशों में नहीं, तीसरी दुनिया के देशों में।

उन्हें बताया जाता है कि वे श्रोताओं में से किसी के लिए डॉक्टर लाने के वास्ते कह रहे हैं।) यहां डॉक्टर है। किसको चाहिए? उसे जल्दी से बाहर ले जाओ। डॉक्टर उसे अभी देख लेगा।

मेरी बात आशा से लंबी हो रही है। तो मैं आपसे आपस में जुड़े दो महत्वपूर्ण मुद्दों की बात कर रहा था। ये हैं शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा। हम एक अर्जेंटीनियाई डॉक्टर के विषय में बात कर रहे हैं जो डॉक्टर बने रहने के साथ-साथ एक सिपाही भी बन गया। उन्हीं से प्रेरित होकर हमने इस ओर ध्यान देना शुरू किया। मैं कह रहा था कि शिक्षा ही छोटे से पशु को मानव बनाती है। यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए। शिक्षा से ही नैसर्गिक वृत्तियों पर काबू पाया जाता है।

इसके अलावा शिक्षा के द्वारा ही जेलों को खाली किया जा सकता है। इनमें ऐसे ही लोग हैं जिन्हें शिक्षा नहीं मिली और जिनका ठीक से पोषण नहीं हुआ। हमारे अपने देश में हमें काफी समय बाद यह बात समझ में आई कि चाहे कितने भी कानून बना दिए जाएं, कितने ही स्कूल खोल दिए जाएं, कितने ही अध्यापक प्रशिक्षित कर दिए जाएं, मानवों की शिक्षा के मामले में फिर भी बहुत कुछ करना शेष रह जाएगा। हमारे समाज में लाखों विश्वविद्यालय प्रशिक्षित पेशेवर और बुद्धिजीवी हैं।

परिवार नामक इकाई का प्रभाव निर्णायक होता है।यदि आप जेलों में जाएं और बंदी बनाए गए 20 से 30 वर्ष की आयु के युवाओं से बात करें तो आपको पता चलेगा कि वे आबादी के बहुत गरीब तबके से हैं । वे उन तबकों से होते हैं जिन्हें हम सीमांत तबके कहते हैं। इसके विपरीत यदि आप अत्यधिक प्रतिस्पर्धी स्कूलों, जिनमें कार्य-निष्पादन और ग्रेडों के आधार पर दाखिले होते हैं, के सामाजिक ताने-बाने को देखें तो आपको पता चलेगा कि वहां अधिकांश बच्चे बुद्धिजीवियों या कलाकर्मियों के हैं।

इस बात पर ध्यान दिया जाए कि मैं आर्थिक दृष्टि से वर्ग विभेद की बात नहीं कर रहा हूं। नए समाज का निर्माण जितना हम सोचते हैं उससे कहीं अधिक मुश्किल होता है क्योंकि इस दिशा में काम करते हुए आपको बहुत सी नई बातें मालूम होती है। यदि आप 30 प्रतिशत निरक्षरता या पूर्ण तथा व्यावहारिक निरक्षरता दोनों को मिलाकर 90 प्रतिशत निरक्षरता दर के खिलाफ संघर्ष शुरू करें तो आपका ध्यान इसी पर रहता है। इसके बाद कुछ वर्ष बीत जाने के बाद जब आप समाज का गहराई से अध्ययन शुरू करते हैं तब आपको शिक्षा के प्रभाव का पता चलता है।

मैं आपको बताना चाहता हूं कि निर्धन और सीमांत तबकों में परिवार की इकाई जल्दी टूटती है। इसका शिक्षा पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आप देख सकते हैं कि इनमें से 70 प्रतिशत टूटे हुए परिवारों से हैं और 19 प्रतिशत न तो मां और न पिता, बल्कि उन्हें पालने के लिए जिम्मेदार किसी रिश्तेदार के पास रहते हैं। लेकिन जब बुद्धिजीवियों के परिवार में ऐसा होता है तो परिवार के टूटने का बच्चों पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता है। सामान्यत: वे पिता या मां के पास रहते हैं। परंपरा से वे मां के साथ रहते हैं और क्यूबा के कुल प्रशिक्षित कार्मिक बल में 65 प्रतिशत स्त्रियां हैं। वे 65 प्रतिशत से कुछ ज्यादा ही हैं। यह सब शिक्षा का असर नहीं तो और क्या है? दूसरे शब्दों में क्रांति के बाद भी मां और पिता का शैक्षिक स्तर बच्चों के भविष्य को बहुत प्रभावित करता है।

कुछ परिस्थितियों, जिनमें साधारण तबकों के बच्चे न्यूनतम ज्ञान के साथ रहते हैं, मैं यहां घर की आर्थिक स्थिति की नहीं बल्कि शैक्षिक स्थिति की बात कर रहा हूं जो पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसी ही बनी रहती है, ऐसी परिस्थितियों में वही कहा जा सकता है जो कि हम कभी-कभी कहते हैं : ‘अमुक काम करने वाले या अमुक सेवाएं देने वालों के बच्चे किसी कंपनी के प्रेसीडेंट, या प्रबंधक नहीं बनेंगे या वरिष्ठ स्थानों पर नहीं जाएंगे, वे ज्यादातर कैदखानों में ही जाएंगे।’

हमने इसका तथा कुछ अन्य बातों का अध्ययन किया है लेकिन उस सब में जाने का यह समय नहीं है। मैं यह सब बताने के लिए कह रहा हूं कि शैक्षिक क्रांति, वास्तव में ही गंभीर शैक्षिक क्रांति के बगैर अन्याय और असमानता बनी रहेगी भले ही देश के सभी नागरिकों की भौतिक जरूरतें पूरी हो जाएं।

हमने अपने देश में सात साल की उम्र तक प्रत्येक बच्चे के लिए प्रतिदिन एक लीटर दूध की गारंटी दी हुई है। इससे बड़े बच्चों को, सीमित संसाधनों के कारण, हम अन्य डेयरी उत्पादों की सप्लाई की गारंटी देते हैं। सौभाग्य से हम ऐसा कर पाते हैं।

प्रत्येक बच्चे को इतना दूध अमरीकी डॉलर के एक सेंट की कीमत पर दिया जाता है । उत्तर में बैठा कोई व्यक्ति क्यूबा में अपने किसी मित्र को एक डालर भेजकर 104 दिन के लिए दूध मंगा सकता है ।

हमारे देश की नाकाबंदी ने हमें राशन प्रणाली अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है। इस नाकाबंदी को चलते हुए 44 साल हो गए हैं । लेकिन हमारे देश में एक भी बच्चा बगैर स्कूल के नहीं मिलेगा, एक भी बच्चा ।

हमारे देश में किसी प्रकार की मानसिक अपंगता के साथ जो बच्चे पैदा होते हैं उनके बारे में हम गहराई से अध्ययन कर रहे हैं। मामूली, कम, ज्यादा या गंभीर रूप से मंदबुद्धि होने, जिनकी अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, के कारणों का हम पता लगा रहे हैं। सौभाग्य से मामूली या कम मंदबुद्धि होने के मामले ही अधिक हैं। हर मामले को दर्ज किया जाता है। केवल बच्चे ही नहीं बल्कि 140,000 से थोड़े अधिक मंद बुद्धि लोग हैं। ऐसे सभी बच्चों का पंजीकरण किया जाता है जो किसी भी रूप में भौतिक या मानसिक रूप से अपंग हैं या नेत्रहीन या गूंगे और बहरे हैं या एक साथ नेत्रहीन, गूंगे और बहरे हैं।

और भी कई तरह की मानव त्रासदियां हैं जिनका अध्ययन और जिन पर अनुसंधान किया जाना चाहिए। शुरू में हमें इनके बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं था। वर्षों तक शिक्षा के लिए संघर्ष और व्यवहार के बाद हमें धीरे-धीरे उनके बारे में पता चला।

इनके लिए विशेष स्कूल हैं। इन विशेष शिक्षा स्कूलों में 55000 बच्चे दाखिल हैं।

हमने बता दिया है कि इन विशेष स्कूलों में बच्चे का छठी से नौवीं कक्षा तक दाखिला रहना ही काफी नहीं है। जो बच्चे सीनियर हाई स्कूल में 12 कक्षा तक या व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए तकनीकी स्कूलों में नहीं जा सकते उन्हें नौवीं कक्षा पूरी कराई जानी चाहिए भले ही उनको एक या दो साल अधिक लग जाएं। वे जो काम कर सकते हैं उसके लिए उन्हें तैयार किया जाना चाहिए तथा उन्हें कोई काम दिया जाना चाहिए ।

हमें इस तरह की समस्याओं से ग्रस्त बच्चों को कम करके नहीं आंकना चाहिए। उनमें बहुत से काम करने की योग्यता होती है। हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते। इस तरह की अपंगता वाले बच्चों को जो पढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन केवल पढ़ाकर हम अपना काम खत्म नहीं समझ सकते।

चाहे जैसी अपंगता हो, उनका ध्यान रखा जाता है। हमें इस बात पर संतोष है कि 44 सालों की नाकाबंदी के बावजूद क्यूबा में एक भी बच्चा ऐसा नहीं है जिसे विशेष स्कूल की जरूरत हो और जिसे इस तरह का स्कूल उपलब्ध नहीं हो ।

मैं एक बात कहना चाहता हूं कि इसे हमारा घमंड नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि जब भी मैं शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा की बात करता हूं तो मुझे नई संभावनाओं के विषय में जानकर शर्म आती है कि हमें इनके बारे में पहले पता क्यों नहीं चला। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि क्यूबा अपनी सफलताओं की डींग मारता है। कुछ ऐसी बातें हैं जिनकी हमें भी जानकारी नहीं थी।

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5 Comments on "कम्युनिस्टों को ताकत कहां से मिलती है ?"

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श्रीराम तिवारी
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आदरणीय सहगल जी आपका प्रश्न बाजिब है ,हालांकि यह आपने अपने ज्ञानकोष की बृद्धि के उद्देश्य से नहीं पूंछा बल्कि आपकी इस मानवीय विचारधारा के प्रति जुगुप्सा के कारण ही यह सवाल दागा है ….आप अच्छी तरह जानते हैं की त्रिपुरा भी भारत का ही एक समृद्ध प्रांत है …मुख्यधारा का मीडिया भी जान बूझकर या अपनी अज्ञानता के कारण त्रिपुरा की या वहां की मार्क्सवादी सरकार की चर्चा भी नहीं करता …आपने भी त्रिपुरा को ऐसे ही छोड़ दिया क्या संघ की नजर में त्रिपुरा का कोई महत्व इसीलिए नहीं की वहां कम से कम झगडे या दंगे होते… Read more »
श्रीराम तिवारी
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bahut achchha aalekh hai ….desh ke damit vargon ki ekjuta ke liye aapka paigam avshy taakat dega .kisi bhi vichaardhara ko uski sarvsamaaveshita se taakat miltee hai .

डॉ. मधुसूदन
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कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता समस्याओं को हाथमें लेते तो हैं, किंतु उनका उद्देश समस्याका सुलझाव नहीं, पर असंतोष और संघर्ष का फैलाव ही रहता है। उनके आंदोलन के परिणाम स्वरूप जनताको राहत तो मिलती नहीं, हां, उनके मनमें अधिक कडवाहट और विफलता की भावना भर जाती है। मेरे पिता स्वातंत्र्योत्तर कालमें बंगाल के कम्युनिस्ट शासनसे बडी अपेक्षाएं रखा करते थे। कहते थे देखना, यह बुद्धिमान (सबसे ज्यादा बुद्धिमान वे बंगाल और महाराष्ट्र को मानते थे।) बंगाल, साम्यवादी शासनसे, दशकके अंदरही, कहीं से कहीं आगे निकल जाएगा। उन्हें भी, फिर निराशा ही हाथ लगी। चुटकी में तो गुजरात आगे निकला, चतुर्वेदी… Read more »
जगदीश्वर चतुर्वेदी
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जगदीश्वर चतुर्वेदी
मधुसूदन जी, आप जानते हैं कि लाइसेंस राज खत्म होने के पहले तक पश्चिम बंगाल को केन्द्र सरकार की नाकेबंदी से गुजरना पड़ा है,केन्द्र से किसी भी बड़े प्रकल्प की अनुमति के लिए राज्य सरकार को अनेक बाधाओं से गुजरना पड़ा है। गुजरात को यह सब नहीं झेलना पड़ा है। वहां भाजपा को जमी-जमायी दुकान मिली है। आप जरा गौर करें गुजरात में भूमिहीन किसानों के लिए एक एकड़ जमीन भी बाजपा सरकार आज तक नहीं दे पायी है ,ऐसा क्यों हुआ जबकि पश्चिम बंगाल में २५ लाख परिवारों के बीच में लाखों एकड़ जमीन दी गयी है। धान उत्पादन… Read more »
Anil Sehgal
Guest

कम्युनिस्टों को ताकत कहां से मिलती है ? -by- -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

हम यह नहीं जानते कि भारत में कम्युनिस्ट पश्चिम बंगाल एवं केरल में ही ताकत में क्यों आते हैं ?

इस विषय पर प्रकाश डालें.

-अनिल सहगल –

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