लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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 डॉ. दीपक आचार्य

हर कहीं है कावरियों की भरमार

इन दिनों देश भर में सावन की मदमस्ती और भोले बाबा की आराधना का दौर पूरे परवान पर है। हर कहीं कावड़ यात्रा का धरम सिर चढ़कर बोलने लगा है। ज्योतिर्लिंगों से लेकर गांव-शहरों के शिवालयों तक कावरियों की भरमार यही बता रही है।

कावड़ और सावन का रिश्ता शाश्वत है। यह श्रद्धा से लेकर श्राद्ध तक और शासन से लेकर प्रशासन के गलियारों तक अमरबेल की तरह छाया हुआ है। ऊपर से लेकर नीचे तक, मंत्राी से लेकर संतरी तक कावड़ किसी न किसी रूप में अपना वजू़द बनाए हुए है। जहाँ कावड़ का जितना ज्यादा जोर, उतनी ही मस्ती और खुशी। शासन-परशासन के भोलेनाथ तो खुश ही होते हैं कावड़ से।

जिधर देखो उधर किसी न किसी भार से या कृत्रिम विनम्रता का लबादा ओढ़े हर आदमी कावड़ की शक्ल में दिखायी देता है। अपने-अपने आकाओं और आलाकमान के आगे नेता और साहब के आगे करमचारी, ये सारे कावड़ का धर्म ही तो निभा रहे हैं सर-सर, मेम-मैडम का मूल मंत्रा जपते हुए।

महाराजा के आगे दरबारी और विभिन्न प्रजातियों के हाकिम कावड़ बने हुए अपना कद बढ़ाने के जतन में भिड़े हुए हैं। कई-कई जमातें तो कावड़ की तर्ज पर झुक कर चापलूसी और जी हुजूरी में इतनी माहिर हो चली हैं कि बस। इनके लिए तो पूरा साल भर सावन होता है मौज-मस्ती भरा। कुछ डिपार्टमेंट तो ऐसे ही हैं जहाँ चपरासी से लेकर बड़े साहब तक दिन-रात कावड़ की शक्ल में ही सर झुकाये नज़र आते हैं। कई तो बरसों से नज़रे और गर्दन झुकाये-झुकाये खुद ही कावड़ों की शक्ल पा चुके हैं।

इस जहाँ में हर आदमी कावड़ बना फिर रहा है। सचिवालय से लेकर ग्राम पंचायतों तक। कोई फाइलों के बोझ से कावड़ बना हुआ है तो कोई अपने आका या आला अफसर को खुश करने की टेंशन से। जितनी भारी कावड़ उतनी ज्यादा मन्नतें पूरी। आजकल दान-दक्षिणा भरी कावड़ों का चलन कुछ ज्यादा ही है। जितना बड़ा सूटकेस उतनी कावरियों की आवभगत। वे लोग जलाभिषेक कर रहे हैं जिनमें पानी नहीं रहा। पानी जब इनमें ही नहीं रहा, तब कावरों में कहाँ से आए। अब तो पानी सर से ऊपर जा रहा है।

अफसरों और कर्मचारियों की कई-कई जमातें तो कावड़ पूजा में माहिर हो चली हैं। ‘सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं’ का उद्घोष लगाते हुए ये ही तो कावड़ यात्राी हैं जो पूरी की पूरी व्यवस्था को अपने मुकाम तक पहुँचाने में दिन-रात लगे हुए हैं।

राजनीति से लेकर सत्ता और शासन की वीथियों में रोजाना कावड़ यात्रा निकलती लगती है। कावरिये भर-भर कर लाते हैं और अपने इन भोलेनाथों को अर्पित कर खुश होते हैं। इसकी एवज में इन्हें जो मिलता है उसे हर कावर यात्राी अच्छी तरह जानता है। इसकी महिमा का बखान शब्दों में भला कौन कर सकता है।

लाल-नीली-पीली बत्तियों वाली गाड़ियों, सरकारी व्हील चेयर्स और एसी रूम्स में धँसे जात-जात के इन कावरियों ने आजादी के बाद से जाने कितने आकाओं को भांति-भांति के द्रव्यों का अभिषेक कर नहलाते हुए धन्य कर दिया है। ये कावरिये ही बताते हैं सावन का पता। दो-एक दशकों से इन कावरियों ने पूरी हुकूमत पर कब्जा कर रखा है। हर कावर भरी रहने लगी है। कोई सूटकेस के भार से तो कोई फाइलों के बोझ से।

कई बजरंगी नेताजी तो खुद कावड़ यात्रा में शामिल होकर बता चुके हैं कावड़ कितना दखल रखती है भक्ति भाव की पूर्णता में। कावड़ों का वजूद देश भर में इन दिनों भक्ति के रंग जमा रहा है।

यों भी आजकल बड़े-बड़े लोगों और आकाओं को यह नहीं सुहाता कि कोई उनके सामने सीधा आए। उन्हें सबसे ज्यादा वे ही लोग पसन्द हैं जो या तो कनक दण्डवत करते हुए आएं अथवा अपनी कावरों में कुछ भरकर झुके हुए, आँखें नीची किए हाजिर हों। आकाओं के सामने आते वक्त तो सामंती परम्पराओं का पालन करना प्रजा तंत्रा में शान समझा जाने लगा है। फिर जितना बड़ा आका, उतनी ज्यादा और भरी हुई कावड़ें।

कुछ लोग तो जिन्दगी भर कावरिये बने रहकर आकाओं को खुश करना ही अपना मुकद्दर मान बैठे हैं। ऐसे कावरिये हर कहीं मिल ही जाते हैं। कभी भीड़ के रूप में तो कभी अकेले। कई गलियारों और राजपथों पर तो दिन-रात कावरियों की दौड़ बनी रहती है। इन कावरियों को कभी चैन नहीं मिलता। असंख्यों लोग ऐसे हैं जिन्हें कावरें थामते-थामते बरसों बीत गए। इन सभी राहों में किसम-किसम के कावरियों की भरमार है जिनका एकमेव मकसद यही है कि अपने इन नाथों को कैसे खुश रखा जाए। ये नाथ खुश हो जाने पर उनकी सारी मुरादें अपने आप पूरी होने लगती हैं।

चकाचौंध भरे गलियारों के सिकंदर बने हुए ये कावरिये ही हैं जो अपनी कावरों में वह हर चीज भरे रखते हैं जिनसे ये भोलेनाथ या कि पार्वती मैया खुश होती है। सब्जी लाने से लेकर गांधी छाप भरने तक में माहिर इन कावरियों की कावरों का ही कमाल है कि आजकल मूल्यों का जमाना गायब हो गया है और उसका स्थान ले लिया है मूल्यवानों ने।

जिसका मूल्य जितना अधिक है या जो ज्यादा मूल्य दे सकता है वही मूल्यवान है जमाने की नज़रों में भी, और अपने आकाओं की निगाह में ही। इस मामले में बड़े से बड़े लोग फेल हैं जिन्हें पुराने जमाने में अपने ज्ञान और अनुभवों की वजह से हर कहीं तरजीह दी जाती थी। आज न मूल्य रहे, न कोई आदर्श।

जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर जिसकी कावर जितनी भारी, उतना उसका कद। कावरों को भर-भर कर लाओ और अपने भोलेनाथों को खुश करो। अब लोगों को यह बताने की जरूरत थोड़े ही है कि इन कावरों में क्या-क्या भर कर लाना है जिसके अभिषेक से ये नाथ प्रसन्न होते हैं।

अपनी आँखें खुली रखें, आपको हर कहीं दिखायी देंगे ये कावरिये। इनसे सीखियें और खुश करिये अपने आकाओं को। क्योंकि जहाँ कावड़ है वहीं सावन है। आप पूरे साल भर पा सकते हैं सावन की मौज मस्ती। फिर आपको हर कहीं लगेगा सावन का हरा-हरा और भरा-भरा।

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