लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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याद है, जब छोटे थे, तब स्कूल जाने के लिए अलह सुबह उठाया जाता था, यह कहकर देखो चिडिया आई, देखो कौआ आया, वो देखो मोर आया। घर की मुंडेर पर छोटी सी चिडिया चहकती रहती, और उठकर स्कूल के लिए तैयार होने लगते। गरमी में कोयल की कूक मन को अलग ही सुकून देती थी। आज आधुनिकता के इस दौर में जब बच्चों को उठाया जाता है तो उन्हें चिडिया, कौआ के स्थान पर टीवी पर ”डोरीमाल” ”नोमिता” जैसे कार्टून केरेक्टर्स को दिखाकर उठाया जाता है। यह सच है, परिवर्तन बहुत ही तेजी से हुआ है, हमारी पीढी इस द्रुत गति से होने वाले परिवर्तन की साक्षात गवाह है। यह परिवर्तन सतत् प्रक्रिया है, पर अस्सी के दशक के उपरांत परिवर्तन की गति को पंख लग चुके हैं। कल तक मुंडेर पर बैठे कौए और अन्य पक्षियों के कलरव पर गाने भी बना करते थे, शकुन अपशकुन के मामले में भी अनेकानेक धारणाएं हुआ करती थीं।

विडम्बना यही है कि हमने भाग दौड में आधुनिक दुनिया की कल्पना तो कर ली पर प्रकृति के साथ जो हमने छेडछाड या सीधे शब्दों में कहें बलात्कार किया है, वह अक्ष्म्य ही है। इसका भोगमान कोई ओर नहीं वरन हमारी आने वाली पीढी को ही भोगना है। ईश्वर ने इस कायनात की रचना की है। इस सृष्टि में जितने भी जीव जंतु प्रभु ने बनाए हैं, सबकी अपनी अलग अलग भूमिका और महत्व है। स्वच्छंद विचरित होने वाले पक्षियों पर अघोषित तौर पर मानव का हस्ताक्षेप भारी पडा है। अपने सुख सुविधा और स्वाद के चक्कर में पक्षियों को प्रश्रय देने के स्थान पर मौत के घाट उतारा गया, जिससे इनकी संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज की गई, रही सही कसर पर्यावरण प्रदूषण ने पूरी कर दी।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज पक्षियों की सैकडों प्रजातियां विलुप्तप्राय हैं। गिध्द, सारस, कोयल, गोरैया, कौवा आदि अब बमुश्किल ही दिख पाते हैं। गुजरे जमाने में राजा महराजाओं से लेकर नवाबों की थाली की शान होने वाली शीली, बटेर, दिघोची, तीतर, लालशर जैसी चिडिया अब देखने को नहीं मिलती। अनेक निरामिष भोजनालयों में अब भुने हुए तीतर या बटेर के स्थान पर गोरैया को ही परोसा जा रहा है। गाय, भैंस का दूध बढाने की गरज से दी जाने वाली दवाओं का प्रतिकूल असर भी देखने को मिला है। इनके मृत शरीर का भक्षण कर पर्यावरण का एक सशक्त पहेरूआ ”गिद्ध” अब देखे से नहीं दिखता है। पक्षियों की संख्या में कमी से पर्यावरण विशेषज्ञों की पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई पडने लगी हैं।

पर्यावरण विदों की मानें तो पक्षियों का होना मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक है। ये मानव जीवों के लिए खतरनाक कीट पतंगों को अपना निवाला बनाकर मनुष्यों की रक्षा करते हैं। ये पक्षी ही हैं जो कीट पतंगों के अलावा मृत जानवरों के अवशिष्ट को भी धरती से समाप्त करते हैं। विलुप्त होते पक्षियों को लेकर सरकारी और गैर सरकारी संगठन चिंता जाहिर कर रस्म अदायगी से बाज नहीं आते हैं। ”मन राखन लाल” की भूमिका निभाने वाले इन संगठनों ने कभी भी पक्षियों को बचाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की है। यहां तक कि भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा भी ग्रामीणों को जागरूक बनाने की दिशा में डाक्यूमेंटरी या विज्ञापनों का निर्माण तक नहीं करवाया है। परिणाम यह है कि दीगर पक्षियों के अलावा हर घर में चहकने वाली गोरैया भी अब दुर्लभ पक्षी की श्रेणी में आ चुकी है।

कुछ माह पूर्व दिल्ली की निजाम श्रीमति शीला दीक्षित ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि अब गोरैया भी दुर्लभ हो गई है। यह सच है कि देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में कबूतरों के अलावा और दूसरे पक्षी दिखाई ही नहीं पडते हैं। कबूतर भी इसलिए कि यहां के लोगों को कबूतर पालने का शौक है। वैसे जंगली कबूतरों की भी दिल्ली में भरमार ही है। नासिक के एक व्यक्ति ने गोरैया के घोसले बनाकर बेचना भी आरंभ किया है।

एक समय था जब घरों में महिलाओं द्वारा गेंहूं या चावल बीनते समय कुछ दाने इन चिडियों के लिए जानबूझकर गिरा दिए जाते थे। इन दानों के चक्कर में घरों के आसपास चिडिया चहकती रहती थीं। अब माल और डिब्बा बंद प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के बढे प्रचलन ने इन पक्षियों के मुंह से निवाला छीन लिया है। इसके अलावा शहरों में सीना ताने खडे मोबाईल टावर की चुम्बकीय तरंगों, वाहनों के द्वारा छोडे जाने वाले धुंए ने भी पक्षियों के लिए प्रतिकूल माहौल तैयार किया है।

एक अनुमान के अनुसार पक्षियों के कम होने के पीछे कामोत्तेजक दवाओं का तेजी से प्रचलन में आना है। असंयमित खानपान और रहन सहन के चलते कामोत्तेजक दवाओं का बाजार तेजी से गर्माया है। गोरैया के अण्डों का इस्तेमाल कामोत्तेजक दवाओं में किया जाता है। चीन के माफिया सरगनाओं ने गैंडे के सींग से सेक्स बढाने की दवाएं इजाद की। कल तक गैंडों से आच्छादित भारत के जंगलों में अब इनकी तादाद महज 200 ही रह गई है।

अब समय आ चुका है कि पक्षियों को बचाने की दिशा में हम जागरूक हो जाएं। हमें हर हाल में पक्षियों के जीने के लिए अनुकूल माहौल प्रशस्त करना ही होगा। पक्षियों की तादाद अगर दिनों दिन कम होती गई तो पर्यावरण का जो असंतुलन पैदा होगा उसका भोगमान किसी और को नहीं हमारी आने वाली पीढी को ही भोगना होगा, जिसके उज्जवल भविष्य के लिए आज हम धन दौलत एकत्र कर छोडे जाने वाले हैं। हम अपने वंशजों को धन दौलत, संपन्नता, सुविधाएं तो देकर इस दुनिया से रूखसत हो जाएंगे, किन्तु जब पर्यावरण असंतुलन होगा तब हमारी आने वाली पीढी जिस कठिनाई में जीवन व्यतीत करेगी उसका अंदाजा आज लगाना असंभव ही है। सरकार को चाहिए कि वह गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर पक्षियों को बचाने की दिशा में तत्काल ही कोई मुहिम की ठोस कार्ययोजना बनाए ताकि पक्षियों के कलरव को आने वाली पीढी सुन सके और महसूस कर सके।

-लिमटी खरे

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1 Comment on "कहां गई गौरैया की चहचहाहट"

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कृष्ण कुमार मिश्र
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सुन्दर लेख, आप ने आँगन की गौरैया के विषय में चिन्ता जाहिर की इसके लिए धन्यवाद

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