लेखक परिचय

प्रदीप श्रीवास्‍तव

प्रदीप श्रीवास्‍तव

मूल रूप से अयोध्या (फैजाबाद) के रहने वाले प्रदीप श्रीवास्तव पिछले 28 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता से जुड़े हैं. वाराणसी से प्रकाशित हिंदी दैनिक “आज” के वाराणसी एवं आगरा संस्‍करण के सम्पादकीय विभाग में काम करने के बाद इन दिनों निज़ामाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक स्वतंत्र वार्ता में स्थानीय सम्पादक हैं.

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sparrowपाठकों आप में से कई लोगों को याद भी नहीं होगा कि आखिरी बार गौरैया कब देखा था, नई पीढी के बच्चों ने तो केवल अपनी पाठ्य पुस्तकों में ही पढ़ा होगा, वह भी गौरैया नहीं, अंगरेजी में स्पयरो शब्द से ही जानते होंगें. जानेंगे भी कैसे, महानगरों की बात छोडें, अब तो छोटे शहरों के साथ-साथ कस्बों में भी बन रही अपार्टमेंटों के अलावा ध्वनि प्रदूषण के चलते नन्हीं सी खुबसूरत जान घबरा कर गायब हो गईं हैं. कंक्रीटों के जंगल के बीच जरुर शहरों के सौंदर्य में चार-चाँद लग गए हों, लेकिन सच्चाई ये है कि कंकरीट के इस जंगल में पेड़ गायब होते जा रहें है, या यूँ कहें कि गायब होते पेडों के चलते इन गौरैयाका बसेरा कम हो गया है. महानगरों की भागम-भाग की जिंदिगी के बीच वाहनों की चकाचौंध एवं ध्वनि प्रदूषण के चलते लोगों में इतना समय नहीं है कि वे इन नन्हीं जान को दाना पानी दें सके.

लगभग दो दशक पीछे चलें तो आप को याद आयेगा कि किस तरह यह घरेलू चिडिया गौरैया की चहचाहट से घर वालों की नींद खुलती थी, दादी हों या नानी वे अपनें हाथों में झाडू लेकर घर के बड़े आँगन को बुहारने लगती थीं. आंगन साफ होते ही गौरय्या का झुंड चीं-चीं करती आंगन में उतर आतीं. जिन्हें देख कर हम छोटे -छोटे बच्चे किलकारी भरते हुवे उन्हें पकड़ने का प्रयास करते, लेकिन वे नन्ही जान फुदक कर दूर जा बैठती. याद करें कि तब सुबह का आभास सूर्योदय से पहले इन गौरैया की चहचाहट या फिर कोवे के कांव- कांव से होता था. जिनकी आवाज सुनकर लोग अपना बिस्तर छोड़ देते थे. अब उन आवाजों व चहचाहट की जगह ले ली है मोबाईल की टोन ने. आखिर क्यों, क्योंकि उनकी चहचाहट को हम-आप ने छीन ली है. क्योंकि कटते पेड, बढते प्रदूषण के चलते यह नन्ही जान गौरय्या हमसे रूठ गई है.अब आपको कहाँ सुनाई देती है इनकी कलरव. इनका रूठ जाना भी जायज है. हम अपनी आधुनिक जीवन शैली में इतने स्वार्थी हो गए हैं कि हमें उनके जीवन की परवाह ही नहीं रही.

याद करें तब मकानों की ऊँची-ऊँची दीवारें होती थी, जिन पर रोशनी व हवा आदि आने के लिए रोशनदान बने होते थे, जिन पर वे तिनका-तिनका जोड़ कर अपना घोंसला बनाती, फिर उसमें अंडा देती, जिसका वे कितना ख्याल रखती. हम छोटे भाई-बहन कभी-कभी उनके घोसलों से अंडे हटा देते. जब वे वापस लौटती तो घोंसले अपने अण्डों को न देख कर कितनी तेज ची-ची करती, जिसे सुनकर माँ, नानी व दादी हम लोगों पर कितना गुस्सा करती. जब हम अंडे वापस रख देते, तो वे उन्हें देख कर कितनी खुश होतीं थी, इस बात का पता आज चलता है, जब हम अपने बच्चों को कुछ समय बड देखते हैं. आज जो घर बन रहे हैं उनमे आदमी के लिए ही जगह नहीं होती, तो वहाँ पर पक्षी अपना घरौंदा कहाँ बना सकते हैं. जो जगह बनाते भी हैं तो वहाँ पर शीशे या फिर लोहे की जाली लगवा देते हैं.

कहने का मतलब आज हम अपने घरौदों को बनवाने के फेर में इन नन्ही जान के घरौदों को छीनते जा रहे हैं. आखिर वे जाएँ तो जाएँ कहाँ? कॉलोनियों में पार्क तो बन रहें हैं, लेकिन वहाँ पर पेडों की जगह लोहे के खेलने के उपकरण लग गएँ हैं. शहर ही नहीं गांवों की हालत भी बुरी हो चली है, खेतों में कीटनाशक डालने से मरे कीट गौरेये के खाने के लायक नहीं रहे पहले घरों के आंगन में बच्चों द्वारा खाना खाते वक्त आधा खाते आधा गिराते थे, अब वह भी नहीं रहा. बच्चे घर की चार-दीवारी के भीतर डायनिंग टेबल पर खाते हैं. तो फिर जूठन कहाँ निकलेगा, जिसे चिडिया चुग सकेगी.

बात केवल गौरैया की ही नहीं है, अब न तो कौवे दिखाई देते हैं न ही गौरैये की सहेली मैना ही दिखती है, न ही कोयल की कूँ- कूँ सुनाई देती है. तोते की बात ही न करें तो बेहतर होगा .

आखिर यह सब क्यों, इसीलिए न कि हम सब प्रकृति से खुलकर खिलवाड़ जो करने लगें हैं इसका फल भी तो हमें आप को ही भुगतना पड़ेगा. यह समस्या केवल भारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की है. इसके लिए हमें और आप को ही पहल करनी होगी. तभी हम अपने पशु पक्षियों को बचा सकेंगें, नहीं तो ये सब भी इतिहास के पन्नों में अंकित हो कर रह जायेंगें.

-प्रदीप श्रीवास्तव

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