लेखक परिचय

सुधा सिंह

सुधा सिंह

विजिटिंग प्रोफेसर, ओरिएंटल लैंग्वेज डिपार्टमेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड लैंग्वेज, तुर्कमेनिस्तान.

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सुधा सिंह

भारतीय मीडिया खासकर हिन्दी मीडिया में शर्म, अपमान, पराजय, हार, असफलता और रोष की भाषा कब बोली जाती है कभी सोचा है आपने ? केवल खेल की खबरों की रिपोर्टिंग करते समय। जनता के मुद्दे पर नहीं। सरकार की नीतियों की आलोचना करते समय नहीं। विपक्ष की भूमिका और दायित्वों की बात करते समय नहीं। या किसी बड़े सार्वजनिक नुकसान पर नहीं। वहां एक गहरी तटस्थता दिखाई जाती है। मैं आपको आज (11जुलाई2011) प्रसारित होनेवाले टी वी ख़बरों से एक उदाहरण दूं। ये ख़बरें एक ही चैनल की हैं, दो अलग चैनलों की नहीं। ताकि चैनल की नीति, समाचार चयन और भाषा की एक मामूली झलक आपको मिल सके। कल की दो बड़ी ख़बरों में से एक खेल जगत की थी और एक कालका मेल के दुर्घटनाग्रस्त होने की।

स्टार न्यूज पर वेस्टइंडीज और भारत के बीच चल रहे टेस्ट मैच सीरिज पर ख़बर थी। ख़बर का सार था कि धोनी की विश्व रैंकिंग में नम्बर वन टीम ने ये सीरिज जीत ली है और कल का टेस्ट ड्रा रहा है। प्रस्तुति की भाषा थी कि धोनी की नम्बर वन टीम ने सातवें रैंक की वेस्टइंडीज की टीम से मैच ड्रा कर लिया। इसकी प्रस्तुति इस प्रकार थी कि भारत में उन लाखों दर्शकों को कितनी शर्म आई होगी जिन्होंने कल

ऑफिस लेट पहुंचने की क़ीमत पर रातभर जागकर ये मैच देखा है। ब्ला….ब्ला…। और दूसरी ख़बर 5 मिनट बाद ही उसी चैनल पर कालका मेल के कल रविवार को दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर थी। इसमें रोती बिलखती एक किशोरी सुहाना की तस्वीर थी जो इस दुर्घटना में मां को खो चुकी थी, पिता गंभीर रूप से घायल थे और जिस भाई को वह कल रात भर खोजती रही वो आज मरा दिखाई दिया। टी वी रिपोर्ट में कहा जा रहा था कि ‘सुहाना

कि ये तस्वीरें भावुक कर देनेवाली हैं!’ घटना की एकदम तमाशे की तरह प्रस्तुति, वैसी ही भाषा! न किसी को शर्म करने के लिए कहा जा रहा था, न किसी की शर्मिंदगी के बारे में सोचा जा रहा था! रेलवे की लापरवाही, सिग्नल की ग़लती, ड्राइवर की ग़लती के अलावा न किसी की असफलता का बयान था, न कोई रोष या क्रोध की भाषा थी।

एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल जो तमाशों में इस्तेमाल होती है। जिसमें दर्शक की तमाशा देखने में रुचि पैदा होती है, असंभव और दहला देनेवाली घटनाओं पर वो अचंभित होता है, सहमता है जब लाल कपड़े के नीचे लेटी हुई बच्ची के मुंह से खून निकलने लगता है, सूखे मुंहवाली सूखी सी बच्ची बड़ा सा डंडा लेकर दम साधे जब रस्सी पर चलती है तो डर और भय से आंखें फाड़े उसके सकुशल दूसरी छोर पर पहुंचने की कामना

करता है, पर नट इसी चरम पर खेल रोक कर पैसे इकट्ठे करने लगता है। इस तमाशे में शामिल दर्शक की सारी भावनाएं किसी क्रियात्मकता में नहीं बदलतीं। ये तमाशबीन की भावनाएं हैं।

आज एनडीटीवी.कॉम से लेकर इंडिया टुडे ग्रुप के आजतक और हेडलाइन्स टुडे सभी में प्रकाशित और प्रसारित रिपोर्टों पर ग़ौर करें तो साफ होगा कि इन दोनों खबरों को लेकर एकदम भिन्न क़िस्म की प्रस्तुति और भाषा का इस्तेमाल किया गया है। खेल की ख़बर की प्रस्तुति में जहां अत्यधिक उत्तेजना, गौरव बोध, इतिहास रचने की बात, जूझारूपन, संघर्ष, बेशक़ीमती, बहुमूल्य, जश्न, विजयश्री, खिताब, सम्मान

जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। (ये वही भाषा है जिससे प्रभावित होकर दर्शक मैच हारकर आए खिलाड़ियों पर अंडे-टमाटर फेंकते हैं। उनके घरों को नुकसान पहुंचाते हैं।) जबकि एक ही दिन में कालका मेल और गुवाहाटी-पुरी एक्सप्रेस रेल दुर्घटनाओं से जुड़ी ख़बरों में आंकड़ों की प्रस्तुतियां हैं। जब हम इंसान की जगह जीवित और मृत आंकड़ों की बातें करते हैं; मृत, गंभीर रूप से घायल और

मामूली घायलों के लिए घोषित मुआवजों की रक़मों की बातें करते हैं तो घटना और प्रतिघटना दोनों ही आंकडे बनकर निकलते हैं। इसमें आदमी की जिंदगी की क़ीमत, मानव मूल्य और मानावाधिकार जैसी कोई चीज नहीं दिखाई देती। घायल लोगों में जीने के लिए संघर्ष, लोगों का बहूमूल्य जीवन, इतिहास की दर्दनाक घटना की बातें ध्यान नहीं आती। इतने बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए इसमें शर्म की बात नज़र नहीं

आती कि रेल राज्य मंत्री अपने बयान में जिम्मेदारी की बात करने के बजाए कह रहा हो कि वो रेल मंत्री नहीं है बल्कि अन्य कई मंत्रियों में से एक एमओएस स्तर का मंत्री है! यानि आप उससे जवाबदेही की उम्मीद कैसे कर सकते हैं! रेल मंत्रालय तो प्रधानमंत्री के पास है! ग़ौरतलब है कि कल मंत्रीमंडल का पुनर्गठन होनेवाला है। उदाहरण के लिए इन दो ख़बरों के कुछ कैप्शन देखिए-

हावड़ा मेल दुर्घटना में मृतकों की संख्या 68 पहुंची.

गुवाहाटी-पुरी पटरी से उतरी 50 घायल.

चेन्नईः रेल पटरी पर धमाका बच गए मुसाफिर.

कालका हादसाः दुर्घटनास्थल पर मची चीख-पुकार.

India Today-

Under the PM Rlys log freak accident. Kalka mail Death toll reaches 66 (Headlines Today,T.V. Report –Tragedy on Tracks,11july2011)

PM mourns loss of life in accident.

Assam another train derails.

और खेल की ख़बर की रिपोर्ट देखिए-

तीसरा टेस्ट ड्रा लेकिन सीरिज में मिली विजयश्री.

कैसे किया धोनी की सेना ने खिताब पर क़ब्जा.

जीते तो जश्न हारे तो भी जश्न. जीत का जश्न और सम्मान.

तीसरा टेस्ट ड्रा लेकिन भारत ने रचा इतिहास.

(http://headlinestoday.intoday.in 11 july2011)

P.M asks to Mukul Roy to visit Guwahati train accident site.

कालका मेल हादसाः69 लोगों के मरने की पुष्टि हुई.

डोमीनिका टेस्ट ड्रा पर भारत ने रचा इतिहास.

(http://Khabar.ndtv.com11 july 2011)

जाहिर है ये दो अलग तरह की ख़बरों की दो अलग शैलियों की भाषा है। पर ख़बर का जो सरोकार है वह किसी भी ख़बर से ग़ायब नहीं होना चाहिए और ख़बर का सरोकार है आदमी और उसकी जिंदगी। अगर ख़बर से उसके सरोकार ग़ायब होंगे तो इसी तरह की खबर बनेगी कि ‘प्रशंसक रात भर ऑफिस लेट होने की क़ीमत पर जागे और धोनी सोचें कि उनके ड्रॉ के फैसले से इन प्रशंसकों को कितनी शर्म महसूस हुई होगी!’ एक तरफ तो यह कि

खेल के खेल को खेलनेवाला खुद निर्णय कैसे ले रहा है; उसे प्रशंसकों की सोचनी चाहिए और दूसरी तरफ सियासी खेल को खेलनेवालों की कोई जवाबदेही कहीं बनती नहीं। प्रधानमंत्री जिसे अपना प्रतिनिधि बनाकर भेज रहे हैं वो मंत्री कह रहा है कि मैं तो रेलमंत्री नहीं हूं जी! भारत के प्रिंट मीडिया का लंबा इतिहास है और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने भी इलैक्ट्रॉनिक गति से ही तरक्की की है। इस कारण

परिपक्वता की बात करना उचित नहीं लेकिन मीडिया को इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए कि एक दिन में घटी इन दो क़िस्म की घटना और दुर्घटना में कौन सी चीज इतिहास में जाने लायक है, किससे ज़ायादा बेशक़ीमती जिंदगियां जुड़ी हैं, संघर्ष की असल बानगी कहां है और किस घटना पर देशवासियों को शर्मसार होने की जरूरत है!

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