लेखक परिचय

दीपक शर्मा 'आज़ाद'

दीपक शर्मा 'आज़ाद'

स्वतंत्र पत्रकार, जयपुर

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मेरे घर के रसोईघर में बर्तनों की भरमार है, होती है सबके घर में होती है| थाली, कटोरी, गिलास, चम्मच और अंत में कप ये न होतो खाना खाने की कल्पना अधूरी सी ही लगती है क्यों सही कहा न| पर इन सबमे भी देखें तो चम्मच सर्वश्रेष्ठ है, वो हर घर में अन्य बर्तनों से भी ज्यादा पाई जाती है| एक गरीब के घर में भी आसानी से एक थाली के हिसाब से कम से कम चार चम्मच तो मिल ही जाएंगी|
वैसे भी आजकल चमचों का बहुत बोलबाला चल रहा है बाज़ार में, सामान्यतः हर तरफ चमचे ही चमचे दिख रहें हैं| वैसे एक बात कहूँ तो आम जीवन में चमचे रखना केवल विलासिता का ही प्रतिक माना जाएगा क्योंकि हम जब चूरमा खाते है तो चम्मच का उपयोग करते है पर वो हम बिना चम्मच भी खा सकते है, खीर पीते है तब भी हम उसे बिना चम्मच के पी सकते है पर हम वहां चम्मच का उपयोग करने लगे है और धीरे-धीरे आनंद लेकर खीर का मजा लूटने लगे हैं| ऐसे में चमचे हमें विलासी स्वभाव का बना रही हैं|
अब ठीक ऐसे ही आजकल राजनीति में हमारे नेता लोगों को चमचा पालने का जो चाव चढ़ा है वो उन्हें धीरे-धीरे विलासी बना रहा है और चमचे पालने का नया शौक उनके कमजोर मन में धीरे-धीरे घर करने लगा है| जिस नेता का कोई चमचा नहीं होगा वो स्वयं किसी न किसी का चमचा होगा और जो खुद बड़ा नेता होगा उसके घर के बाहर तो चमचों की फौज खड़ी होती है, जो दिन रात बस उसी कि रामधुनी में लगी रहती हैं| जब हमारे नेता ऐसे विलासी हो जाते है तब उन्हें काम करने में आलस आने लगता है और वे निखट्टू, कामचोर, निर्लज्ज और भोंपू किस्म के बन जाते हैं, जो दिन रात अपनी कैसेट चमचों के सहारे दुनिया में बजवाते फिरते हैं|
देश कि पूर्व सत्ताधारी पार्टी को भी इसी प्रकार के चमचों की बुरी लत लगी हुई थी, इसी के कारण ही तो वो अनाप-शनाप बयानबाजी कर, अपने चमचों की बातों में आकर जनता के कोप का शिकार हुई| बेशक उन्होेन काम भी किया ही होगा, पर उन्होंने ज्यादा चमचागिरी की अपने मालिकों की| कभी उस पार्टी के वरिष्ठ नेता आतंकवादियों की जी हुजूरी करने लगे उनकों आदरणीय बताकर हमारे देश के शहीदों का अपमान करने लगे, तब ही तो हमारे देश की देशभक्त जनता ने उन्हें आइना दिखाकर सत्ता से बाहर कर दिया| उस दल की खास बात ये और है कि वहां चमचा सर्वोपरि होता हैं, वहां चमचों की लाइन लगी हुई होती हैं सबसे छोटा चमचा निचले स्तर का बड़ा नेता हुआ करता है फिर वो जिसका चमचा है वो और बड़ा नेता होता है फिर वो भी किसी बड़ी राज्य स्तर या राष्ट्रीय स्तर के शक्ल-ओ-सूरत के नेता का चमचा होता है जिसकी कृपा निर्मल बाबा की तरह निरंतर बरसती रहती हैं| पर इन सबका केंद्र एक ही हुआ करता है वो केंद्र आज भी है चाहे केंद्र सरकार ही क्यों न बदल गयी हो|
ऐसा ही कुछ कुछ हमारी वर्तमान सरकार का भी चमचागिरी वाला रवैया रहा है और आज भी है| जब प्रधानमंत्री ने शपथ ली और संसद पहुंचे तो सबसे पहले कहा था की पैर सम्मान के लिए छूना चाहिए विवशता में आकर नहीं| वरिष्ठ नेताओं के पैर छूने वाली परिपाटी को बंद करने के लिए आवश्यक कदम उठाने वाले नरेंद्र मोदी ही लगते हैं सबसे पहले नेता| पर चमचागिरी यूँ ही बंद हो जाती तो भाई काहें की चमचागिरी| आजकल शुभ चिंतक का नाम बदल दिया गया है वो भी चमचागिरी का ही दूसरा पार्ट है, किसी की आपने यदि अच्छी आदत का बखान कर दिया तो आप उस अमुक व्यक्ति के चमचे कहलाने लगोगे| ऑफिस में चमचा बॉस का पीए, घर पर भी चमचे होने लगे मम्मी-पापा के चमचे, स्कूल और कॉलेज में भी चमचे होते है|
इसलिए भैईया जी चमचों की इस कदर बढ़ती बेमांगी डिमांड को पूरा करने के लिए कहीं न कहीं से न्यूटन सामने गिरे सेब की भांति चमचे भी अपने आप टपक पड़ते हैं और अपनी बेमांगी राय से नेताओं को उलझने लगते हैं| सही मायनों में नेताओं को चमचा बनाने की नहीं बनने की जरुरत हैं, नेताओं को जनता का चमचा बनने की जरुरत हैं| यदि आप जनसेवक बनेंगे तभी तो जनता आपकी पिछवाड़े पर पद-प्रहार नहीं करेगी| फिर भी यदि आप कहीं भी रहते हो, कैसी भी आपकी लाइफस्टाइल हो, कैसी भी आपकी भाषा हो या फिर आपका चल-चलन कैसा भी हो आपको आपके योग्य चमचा ईश्वर एक बार तो जरूर देता हैं उसका उपयोग करो या दुरूपयोग ये आप पर निर्भर हैं, बस एक बार आँखें उठाकर दुनिया को देखने की देर हैं|
दीपक शर्मा ‘आज़ाद

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