लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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national_youth_day12 जनवरी – राष्ट्रीय युवा दिवस पर विशेष

यौवन तन नहीं, मन की अवस्था है। हां! तन की भिन्न अवस्थाये,ं मन की इस अवस्था को प्रभावित जरूर करती हैं। युवा मन बंद खिडकी-दरवाजे वाला मकान नहीं होता। लेकिन जो एक बार ठान लिया; वह करके ही दम लिया। जिसे एक बार मान ंिलया; उस पर अपना सर्वस्व लुटा दिया। युवा, न करने का बहाना नहीं खोजता। लेकिन उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध करने के लिए मजबूर भी नहीं किया जा सकता। युवा, ढूंढ-ढूंढकर चुनौतियों से टकराता है। वह पराक्रम दिखाने के मौके तलाशता रहता है। वह अपने लिए खुद चुनौतियां निर्मित कर सुख पाता है।

युवा, भूत नहीं होता। युवा, भविष्य और वर्तमान के बीच में झुला भी नहीं झूलता। वर्तमान के लिए भविष्य लुटता हो, तो लुटे। दुनिया उसे अव्यावहारिक, पागल, दीवाना या दुनियादारी से परे कहती हो, तो कहे। युवा, बंधनों और बने-बनाये रास्तों पर चलने की बाघ्यता भी नहीं मानता। वह नये रास्ते बनाता है। इन नये रास्तों को ही बदलाव कहते हैं। इसीलिए युवा को बदलाव का वाहक कहा गया है। बदलाव, अवश्यसंभावी है। आप इन्हें स्वीकारें, न स्वीकारें.. ये तो होंगे ही। बदलाव के बगैर ना ही प्रकृति चल सकती है और ना ही समाज।

सामाजिक बदलाव, लीक से अलग होते हैं। लीक, समाज की पुरातन मान्यताओं की बिना पर बनी होती है। बदलाव, लीक पर सवाल खडे करते हैं। कृष्ण, एकलव्य, प्रह्लाद, अष्ट्रावक्र, आदि शंकराचार्य से लेकर परशुराम, सावित्री, मीरा, गौतम बुद्ध, गुरुनानक, स्वामी दयानंद, कबीर, रैदास, राजा राममोहन राय आदि कितने ही नाम हैं, जिन्होने अलग- अलग वय का होते हुए भी अपने – अपने समय में समाज की लीक पर सवाल उठाये।

समाज ने अपनी बनाई लीक पर खडे किए सवालों को तत्काल कभी भी स्वीकार नहीं करता ? अतः उसकी निगाह में युवा विद्रोही हो जाता है। समाज की बनाई लीक का टूटना हमेशा नकरात्मक नहीं होता। सकरात्मक बदलाव कालांतर में उसी समाज द्वारा सराहे जाते हैं। जीसस, मोहम्मद, सुकरात, अरस्तू, प्लेटो, टालस्टाय, सिकंदर, नेपोलियन, लेनिन, चाणक्य, गांधी से लेकर जे पी तक….सभी ने अपने समय के युवाओं के सामने चुनौतियां रखीं, पराक्रम कर दुख झेले… जहर पिया, लेकिन दूसरों को जीवंतता दी।

आज भी बनी-बनाई लीकें टूट रही है। आज भी सवाल खडे. ही किए जा रहे हैं। एकमात्र भिन्न बात आज यह है कि ये लीकें हमारी की जगह मैं और मेरा के लिए टूट रही हैं। हालाकि सोशल साइट्स पर जो शेयर किया जा रहा है, उससे लगता है कि जल्द ही निजता से ज्यादा, निजता से छुटकारा पाने की व्याकुलता वाला दौर आने वाला है। दुआ कीजिए। फिलहाल तो अभिभावकों की निगाह में प्राथमिकता पर आई संतानों की इस निजता और उससे छुटकारा पाने के नये तौर-तरीकों के साइड इफेक्ट इतने ज्यादा हैं कि समाजशास्त्रियों के चश्में में और कोई नंबर फिट बैठ ही नहीं रहा। बदलावों की सकरात्मकता दिखाई ही नहीं दे रही।

वे कह रहे हैं कि ’येनकेन प्रकारेण’, आज का आदर्श सिद्धंात है। ’मुझे क्या मतलब’, आज का आदर्श वाक्य है। निडरता है, लेकिन उसमें अनुशासन नहीं है। जिन्हे ’सामाजिक मूल्य’ कहा जाता है, नया जमाना उन्हे अपने पर बोझ मान रहा है। ’इजी मनी’ को ’सर्वश्रेष्ठ धन’ की संज्ञा दी जा रही है और ’इजी वेे’ को ’परमपथ’ की। एक उम्र नशा, नंगापन, मुक्त संबंध, कैरियर और पैकेज को ही स्टेटस सिंबल मानने लगी है। समाजशास्त्री कह रहे हैं कि इस उम्र में निडरता है, लेकिन उससे पैदा होने वाला अनुशासन गायब है। एक उम्र के लोग विवाह पूर्व यौन संबंध गलत मानने से इंकार कर रहे हैं। वे अपना जीवन साथी तय करने में अपने अभिभावकों की सहमति जरूरी नहीं समझ रहे। दिल्ली पुलिस ने पिछले साल हुए ज्यादातर अपराधों का कारण प्रेम व अवैध संबंध बताया। समाजशास्त्री, इसे समाज का आइना बता रहे हैं। अफसोस है कि मीडिया भी समय-समय पर इसे ही भारत की कुलजमा तसवीर के रूप पेश करता ही रहा है।

भारतीय संदर्भ में बात करें, तो हम इन्हे नकरात्मक सामाजिक बदलाव कह सकते हैं। हालांकि ये सब उसकी देन नहीं है, जिसे उम्र की सीमा में बांधकर युवा कहते हैं। संतान की शारीरिक सुंदरता, कैरियर और पैकेज की तारीफ में कसीदे पढने वाले अभिवादकों की उम्र क्या है ? भारत में भ्रष्ट आचार के मशहूर आरोपियों की सूची बनाइए। ’’देश और देश की जनता के हितों से मुझे क्या मतलब’’ कहने वाले सांसद कम उम्रदराज नहीं। जूनियर अपराधियों को शामिल करने वाले राजनैतिक दलों में मुिखया तो लगभग सभी सीनियर सिटीजनशिप के आसपास ही हैं। सामाजिक बदलाव को दिशा देने का दायित्व धर्मगुरुओं के अलावा विश्वविद्यालय-मीडिया जैसी संस्थानों की है। इनके अगुवा किस उम्र के हैं ? क्या वे अपने दायित्वों पर खरे हैं ?

यदि आप सामूहिक… सामुदायिक की जगह व्यक्तिगत का बोलबाला है; आर्थिक व निजी लक्ष्यों के आगे समग्र व सामुदायिक उत्थान के लक्ष्य का आकर्षण फीका पड गया है; तो इसका बडा कारण फंड लोलुप ’एन जी ओ कल्चर’ है, जिसने सामाजिक स्वयंसेवक निर्माण की आवश्यक प्रक्रिया को रोक कर नौकर और मालिक पैदा करने चालू कर दिए हंै। प्रेरित करने वाले ही अपनी की शुचिता से चूक गये हैं। चुनौती खडे कर सकने लायक वर्तमान समय के पात्रों में भी प्रतिबद्धता दिखाई नहीं दे रही। तो फिर नकरात्मक बदलावों के लिए हम सिर्फ 15 से 45 की उम्र को दोषी कैसे ठहरा सकते हैं। यह न सिर्फ नाजायज है, बल्कि अन्याय भी है। ऐसा कर हम उनमें सकरात्मकता का आगाज करने के रास्ते और संकीर्ण करेंगे।

बावजूद इसके मुआफ कीजिए! भारत में वर्तमान सामाजिक बदलावों की कुलजमा तसवीर यह नहीं है। खलनायकों के पोस्टर वाली इस फिल्म में नायकों को छापा ही नहीं गया। यदि कुलजमा तसवीर यही होती, तो हमने दिल्ली के रामलीला मैदान में 8 से 80 वर्ष की वय के जिन युवाओं को अन्ना अनशन के पीछे हामी भरते देखा…. वह न होता। झारखण्ड की बंजर-टांड धरती पर सामूहिक बागवानी की जो मंजिल दिखाईं दे रही हैं, वह कभी होती ही नहीं। होते। उत्तरांचल में मंदाकिनी की धारा के लिए जान-जोखिम में डालकर पहाडी – पहाडी हुंकार भरने वाली सुशीला भंडारी का कोई नामलेवा न होता। पटना के सुपर- 30 जैसे गारंटीपू्रफ प्रयास कोई करता ही नहीं। पता कीजिए! मनरेगा, सूचना का अधिकार, जनलोकपाल… सामाजिक बदलाव का सबब बने ये तमाम कदम युवा मनों की ही उपज पायेंगे। ये वाक्ये.. ऐसे कदम सामाजिक बदलाव की भारतीय फिल्म के नायक है।

आज भारत के मानव संसाधन की दुनिया में साख है। आज सिर्फ पांच घंटे सोकर काम करने वाले शहरी नौजवानों की खेप की खेप है। जनसंख्या दर और दहेज हत्या में कमी के आंकडे हैं। देश के शिक्षा बोर्डों मे ज्यादा प्रतिशत पाने वालों में लडकांे से ज्यादा संख्या लडकियांे की दिखाई दे रही हैं। उडीसा के सुदूर गांव की आदिवासी लडकी भी महानगर में अकेले रहकर पढने का हौसला जुटा रही है। दिल्ली की झोपडपट्टी में रहकर बमुश्किल रोटी का इंतजाम कर सकने वाली नन्ही बुआ के बेटे के मात्र 25 साल की उम्र जापान की कंपनी का महाप्रबधक बनने को अब कोई अजूबा नहीं कहता। निर्णय अब सिर्फ उंची कही जाने वाली जातियों के हाथ में नहीं है। कम से कम शहर व कस्बों में अब कोई अछूत नहीं है। जिसकी हैसियत है, उसकी जाति नजरअदाज की जाती है। रिश्ते अब तीन-तेरह की श्रेणी या परिवार की हैसियत से ज्यादा, लडका-लडकी की शि़क्षा और संभावनाओं पर तय होते हैं। खेतिहर मजदूर आज खेत मालिक की शर्तों पर काम करने को मजबूर नहीं है। बंधुआ मजदूरी का दाग मिट रहा है। ये सकरात्मक बदलाव हैं, जिन्हे युवा मन ही अंजाम दे रहे हैं।

हमारे जैसे कार्यकर्ताओं को भी उम्मीद की किरण यदि कहीं नजर आती है, तो वे युवा ही है, जो अपना समय-श्रम-कौशल… बहुत कुछ देने को तैयार रहते हैं और बदले में चाहते हैं, तो सिर्फ थोडी सी थपथपाहट, थोडी सी ईमानदारी, थोडा सा प्रोत्साहन, थोडी सी साफगोई।
काश! हम उन्हे ये दे पाते।

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