लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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पंकज कसरादेdigital

विदेश नीति के रंग डिजिटल इंडिया ,मेक इन इंडिया,स्किल इंडिया में हम इतने सराबोर हो चुके है कि हमारे आंतरिकता में स्थित देश की पहचान जो गाँवो से है , किसानो से है ,खेतो से है ,जंगलो से है ,मज़दूरों से है उसे लगभग भूल चुके है। यह पहल सही है की विदेश नीति का उद्देश्य गाँवो को डिजिटल करना है ,लेकिन क्या पहले यह जरुरी नही है की हम गाँवो को डिजिटलाइजेशन के लिए परिपक्व करे?आज भी भारत के गाँव में मौजूद किसान अपना खून पसीना एक कर मेहनत से खेती करता है ,लेकिन उस वक़्त उसकी आस उसकी उम्मीद टूटती सी नज़र आती है जब सुखा पड़ जाता है या वर्षा अधिक हो जाने से उसकी फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी होती है ,और तब जब वो अपनी बर्बाद फसल के लिए सरकार से मुआवजे की गुहार लगाता है तो उसे सरकार से सिर्फ आश्वासन या ऊठ के मुंह में जीरा के अलावा कुछ भी हांसिल नहीं होता और तब वह न चाहते हुए भी आत्महत्या जैसा घिनौना कदम उठाता है. आज हम गांवो के डिजिटलीकरण की बात कर रहे है लेकिन कर्णधारों से मैं पूछना चाहूंगा की पहले गाँवो में घूम कर देखे तो आपको पता चलेगा कि आप विदेशों में डिजिटलीकरण की बात तो कर रहे है लेकिन जिन गाँवो को आप डिजिटल तारों से जोड़ना चाहते है वहां २४ घण्टे की बिजली भी सही तरह से मुहैया नही हो पा रही है. आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से ,किन्ही हालातो से पिछड़ने के कारण कई मज़दूर के बच्चे पढ़ नही पाते है ,लेकिन इनकी सुध लेने वाला यहाँ कोई नही है। जब सिर्फ चुनाव होता है तभी कोई राजनेता गांवो की ओर झांक कर देखता है ,उसके बाद कोई मुड़कर भी नज़र नही दौड़ाता है? गाँवो की हालत सिर्फ बयानबाजी और जुमलेबाजी तक ही सिमट कर रह जाती है। आज भी हमारे देश में कई ऐसे गांव है जहां पर कोई मोबाइल का नेटवर्क नहीं है ,कई ऐसे गांव है जहां पर पक्की सड़के न होने के कारण वे शहर से जुड़ नही पा रहे हैं , कई ऐसे गांव है जहां पर स्कूल नहीं होने के कारण वहां के बच्चे पढ़ नही पा रहे हैं ? तो क्या हमारी सरकार को यह नही सोचना चाहिए की हम पहले गांवो की हालत को सुधारे ,उन्हें डिजिटलीकरण के लिए पूर्णतः परिपक्व करे उसके बाद वहां कुछ डिजिटल करने का सोचे? क्योंकि जंगल में मोर नाचा तो किसने देखा ?

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विदेश नीति के रंग डिजिटल इंडिया ,मेक इन इंडिया,स्किल इंडिया में हम
इतने सराबोर हो चुके है कि हमारे आंतरिकता में स्थित देश की पहचान जो
गाँवो से है , किसानो से है ,खेतो से है ,जंगलो से है ,मज़दूरों से है उसे
लगभग भूल चुके है। यह पहल सही है की विदेश नीति का उद्देश्य गाँवो को
डिजिटल करना है ,लेकिन क्या पहले यह जरुरी नही है की हम गाँवो को
डिजिटलाइजेशन के लिए परिपक्व करे?आज भी भारत के गाँव में मौजूद किसान
अपना खून पसीना एक कर मेहनत से खेती करता है ,लेकिन उस वक़्त उसकी आस उसकी
उम्मीद टूटती सी नज़र आती है जब सुखा पड़ जाता है या वर्षा अधिक हो जाने से
उसकी फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी होती है ,और तब जब वो अपनी बर्बाद फसल
के लिए सरकार से मुआवजे की गुहार लगाता है तो उसे सरकार से सिर्फ
आश्वासन या ऊठ के मुंह में जीरा के अलावा कुछ भी हांसिल नहीं होता और तब
वह न चाहते हुए भी आत्महत्या जैसा घिनौना कदम उठाता है. आज हम गांवो के
डिजिटलीकरण की बात कर रहे है लेकिन कर्णधारों से मैं पूछना चाहूंगा की
पहले गाँवो में घूम कर देखे तो आपको पता चलेगा कि आप विदेशों में
डिजिटलीकरण की बात तो कर रहे है लेकिन जिन गाँवो को आप डिजिटल तारों से
जोड़ना चाहते है वहां २४ घण्टे की बिजली भी सही तरह से मुहैया नही हो पा
रही है. आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से ,किन्ही हालातो से पिछड़ने के
कारण कई मज़दूर के बच्चे पढ़ नही पाते है ,लेकिन इनकी सुध लेने वाला यहाँ
कोई नही है। जब सिर्फ चुनाव होता है तभी कोई राजनेता गांवो की ओर झांक कर
देखता है ,उसके बाद कोई मुड़कर भी नज़र नही दौड़ाता है? गाँवो की हालत सिर्फ
बयानबाजी और जुमलेबाजी तक ही सिमट कर रह जाती है। आज भी हमारे देश में कई
ऐसे गांव है जहां पर कोई मोबाइल का नेटवर्क नहीं है ,कई ऐसे गांव है जहां
पर पक्की सड़के न होने के कारण वे शहर से जुड़ नही पा रहे हैं , कई ऐसे
गांव है जहां पर स्कूल नहीं होने के कारण वहां के बच्चे पढ़ नही पा रहे
हैं ? तो क्या हमारी सरकार को यह नही सोचना चाहिए की हम पहले गांवो की
हालत को सुधारे ,उन्हें डिजिटलीकरण के लिए पूर्णतः परिपक्व करे उसके बाद
वहां कुछ डिजिटल करने का सोचे?
क्योंकि जंगल में मोर नाचा तो किसने देखा ?

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