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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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विनायक शर्मा

मतों की गणना के बाद हिसार लोकसभा उपचुनाव का नतीजा वही आया जिसका अनुमान जनता और पूर्वानुमान सर्वेक्षणों में लगाया जा रहा था. हाँ जातीय समीकरणों के कारण जीत और हार में मतों का अन्तर अधिक नहीं है. अपने पिता भजन लाल के निधन पर रिक्त हुई इस संसदीय सीट से भाजपा-हजका उम्मीदवार कुलदीप बिश्नोई ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी अजय चौटाला को हरा कर विजय प्राप्त की. इस विजय के तमाम कारणों में से एक अन्ना की टीम का कांग्रेस को वोट न देने की अपील भी है. अब नतीजे घोषित होने के पश्चात् दंगल में उतरे सभी दल हार-जीत के अलग-अलग कारण बता रहे हैं, परन्तु मतों के पक्ष-विपक्ष में इधर से उधर जाने और कुछ जाति विशेष के मतों के ध्रुवीकरण और केंद्र में कांग्रेस सरकार के जनविरोधी फैसले अवश्य ही हार-जीत का कारण बने हैं. चुनाव परिणाम पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. इतना तो स्पष्ट है कि पिछले लोकसभा चुनाव की ही तरह इसबार भी कांग्रेस तीसरे नंबर पर ही है और इस चुनाव में उसे लगभग 55,000 वोट अवश्य ही कम मिले हैं जिसके पीछे कहीं न कहीं निम्न कारण दिखाई देते हैं :

(1) भ्रष्टाचार, घोटालों और महंगाई के कारण केंद्र सरकार के प्रति जन-आक्रोश

(2) कुलदीप बिश्नोई और अजय चौटाला के लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाना

(3) जातीय मतों का ध्रुवीकरण, और

(4) टीम अन्ना का कांग्रेस को वोट न देने की अपील.

अब नतीजा आने पर टीम अन्ना हजका के उमीदवार की विजय के पीछे अपनी अपील बता रही है. यदि इस पर विश्वास कर भी लिया जाये तो निष्कर्ष यह निकलता है कि ( पिछले और अब के चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में पड़े मतों के अंतर को देखें तो ) अन्ना की अपील कांग्रेस के मात्र 25% वोटरों को ही प्रभावित करने में सफल हुई है. आने वाले हरियाणा विधान सभा के चुनाव के मद्देनजर तो इनेलो या हजका जैसे क्षेत्रीय दलों के लिए यह हार-जीत अवश्य ही बहुत मायने रखती होगी अन्यथा राष्ट्रीय परिपेक्ष में इस हार-जीत से किसी भी दल को कोई फर्क नहीं पड़नेवाला. इस सब के बावजूद हिसार उपचुनाव कुछ अनुतरित्त प्रश्न देश के सामने खड़ा करता है जिन्हें समझना आवश्यक है.

अन्ना और उनकी पूरी टीम देश से भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए जन-लोकपाल अधिनियम बनाए के लिए संसद और सरकार पर दबाव बना रही है जिसके लिए देश भर की आम जनता जनार्धन ने भी दलों और संगठनों की दीवारें तोड़ते हुए भ्रष्टाचार में लिप्त सभी राजनैतिक दलों को तो एक बार झझकोर कर रख दिया था. परन्तु संसद के शीतकालीन सत्र में बिल को पारित करवाने के लिए दबाव बनाते हुए हिसार के उपचुनाव में ही कांग्रेस का ही विरोध क्यों किया ? क्या किसी एक दल विशेष का विरोध, राजनीति नहीं है ? भ्रष्टाचार जैसे एक अहम् और विशेष मुद्दे के उन्मूलन के लिए चलाये जा रहे एक गैर-राजनैतिक आन्दोलन की सफलता के लिए एक दल विशेष का विरोध कहाँ तक उचित है ? भ्रष्टाचार में तो सभी दल लिप्त हैं, कुछ कम तो कुछ ज्यादा. एक दल विशेष का विरोध कर टीम अन्ना तो मात्र बोतलें ही बदल रही है मदिरा तो वही पुरानी है. टीम अन्ना का यह उत्तर कि चूँकि बिल लोकसभा ने पारित करना है इसलिए लोकसभा के उपचुनाव में ही कांग्रेस का विरोद्ध किया था, समझ से परे है. हिसार के उपचुनाव में 40 उम्मीदवार अपना भाग्य अजमा रहे थे. भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए लाये जा रहे बिल पर दबाव बनाए के लिए एक भ्रष्टाचारी का विरोध जिसका परोक्ष लाभ अन्य भ्रष्टाचारियों को मिले यह कहाँ की बुद्धिमता ? हिसार उपचुनाव में खड़े तीन प्रमुख उम्मीदवारों या उनके दलों का पूर्व का इतिहास क्या रहा है यह सभी जानते हैं. जाति-नीति पर चलनेवाली हरियाणा की राजनीति को समझने वालों ने तो इस चुनाव के नतीजों की घोषणा तो परिणाम आने से पूर्व ही कर दी थी तो क्या उसी क्षेत्र के रहने वाले टीम अन्ना के अहम् सदस्य अरविन्द केजरीवाल यह सब नहीं समझते होंगे ?

जिस प्रकार से टीम अन्ना ने हिसार उपचुनाव में कांग्रेस का विरोद्ध किया उसका लाभ निश्चित तौर से उन दलों या उम्मीदवारों को मिला जो उसके हकदार नहीं थे. कांग्रेस के विरुद्ध यह किस प्रकार की दबाव की रणनीति है चलाई जा रही है ? यह दबाव नीति है या भयदोहन ? मुझे तो इन सब के विपरीत एक छलावा ही लगता है जो देश और अन्य राजनैतिक दलों को भरमाने के लिए रचा जा रहा है कि टीम अन्ना एक गैर राजनैतिक मंच है. अभी तो यह एक कमजोर हमला कांग्रेस पर किया गया है जिससे कांग्रेस को कोई क्षति नहीं हुई है, हाँ भाजपा सहित अन्य दल अवश्य ही प्रफुल्लित हो रहे हैं. परन्तु इसके साथ ही प्रश्न उठता है कि आने वाले अगले चुनाव में टीम अन्ना का शिकार कौन होगा ? अगले वर्ष देश के पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होने है उससे पूर्व संसद के शीतकालीन सत्र में यदि लोकपाल अधिनियम पारित हो जाता है तो निश्चित रूप से टीम अन्ना का अगला शिकार अलग-अलग राज्यों में शासन-सत्ता चलाने वाले गैर कांग्रेसी दल हो सकते हैं.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के विरोद्ध में प्रचार करने का पूर्वघोषित दौरा अचानक बीच में छोड़ कर अन्ना का मौन व्रत पर बैठ जाना क्या जनता में संशय पैदा नहीं करता ? और फिर एक समाचार चैनल में दिए गए साक्षात्कार में यह वक्तव्य देना कि यदि कांग्रेस शीतकालीन सत्र में जन लोकपाल बिल पारित कर देती है तो वह कांग्रेस के साथ मिल कर काम करने को तैयार हैं, क्या दर्शाता है ? इसका अर्थ यह हुआ कि कांग्रेस का विरोद्ध या केंद्र सरकार पर दबाव केवल लोकपाल बिल को पारित करवाने के लिए ही है ? बिल पारित हो जाने के पश्चात् क्या कांग्रेस को उसके शासन में हुए तमाम घोटालों, भ्रष्टाचार के आरोपों , विदेशी बैंकों से कालेधन की वापसी, रामदेव के अनुयाइयों पर दिल्ली में हुए अर्ध-रात्री को लाठियां बरसाने आदि के तमाम आरोपों से मुक्त कर दिया जायेगा ?

भ्रष्टाचार के उन्मूलन के मुद्दे पर सारे देश को अनुशासित हो प्रदर्शन करने को विवश कर देने वाले अन्ना हजारे के इस प्रकार के कार्य कलापों से तो भय सा लगने लगता है. विभिन्न राज्यों में शासन चलाने वाले अन्य राजनैतिक दल भी क्या इसी दिशा में सोचते हैं कि हिसार उपचुनाव में कांग्रेस……तो अगले चुनाव में कौन ?

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