लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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nehruबात दिसंबर 1929 की है। यही वह वर्ष और महीना था जब कांग्रेस भारत की स्वतंत्रता के लिए अपनी पुरानी मांग ‘अधिशासी अधिराज्य’ अर्थात डोमिनियन स्टेटस-को छोडक़र पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाली थी, और इसी माह के अंत में कांग्रेस ने लाहौर में अपनी बैठक में पूर्ण स्वाधीनता का संकल्प प्रस्ताव पारित कर दिया। कहने का अभिप्राय है कि 44 वर्ष पुरानी कांग्रेस अभी तक देश के लिए नही लड़ रही थी, अभी तक तो वह पूर्णत: अंग्रेजों की ‘सेफ्टी वॉल्व’ के रूप में कार्य कर रही थी। वह चाहती थी कि उसके ‘अधिनायक’ देश में युग-युगों तक शासन करते रहें। इसीलिए 1857 की क्रांति को भारत का प्रथम स्वातंत्र्य समर घोषित करने की आवश्यकता कांग्रेस को कभी नही पड़ी।

23 दिसंबर 1929 को वॉयसराय लार्ड इर्विन जब दिल्ली आ रहा था तो निजामुद्दीन के निकट उसकी टे्रन पर क्रांतिकारियों ने बम से हमला कर दिया। इस बमकाण्ड की गांधीजी ने तीव्र आलोचना की थी। उनका यह लेख ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित किया गया था। क्रांतिकारियों के विरूद्घ लिखे गये इस लेख में गांधीजी ने जी भरकर विषवमन किया था, साथ ही जनता से अपील की थी कि वह इन क्रांतिकारियों का साथ न दे। गांधीजी के इस आलेख पर क्रांतिकारी दल ने अपना घोषणा पत्र जारी किया। जिसका शीर्षक था-‘फिलॉसफी आफ द बम’। इस लेख को उस दिन देशभर में चुपचाप वितरित किया गया, जिस दिन कांग्रेस ने (26 जनवरी 1930 को)  पूर्ण स्वाधीनता दिवस मनाया था। इसमें लिखा था-‘‘हाल ही की घटनाओं से जिनसे वायसराय की टे्रन को बम से उड़ाने की कोशिश पर कांग्रेस का प्रस्ताव और बाद में ‘यंग इंडिया’ में गांधीजी का लेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जाहिर है कि इंडियन नेशनल कांग्रेस ने गांधीजी के साथ मिलकर क्रांतिकारियों के विरूद्घ युद्घ शुरू कर दिया है। इसके अतिरिक्त प्रेस और प्लेटफॉर्म से भी उनकी कड़ी आलोचना की गयी है। अफसोस की बात है कि उन्हें या तो जानबूझकर या अज्ञान का कारण हमेशा गलत ढंग से पेश किया जाता है, और उन्हें समझने की कोशिश नही की जाती। क्रांतिकारी अपने आदर्शों और अपने कामों पर जनता की आलोचना से परेशान नही होते, बल्कि वे उसका स्वागत करते हैं क्योंकि उससे इन्हें ऐसे लोगों को जो दिल से उन्हें समझना चाहते हैं, क्रांतिकारी आंदोलन के मूल सिद्घांत और आदर्श समझाने का अवसर मिलता है। जिनसे यह आंदोलन प्रेरणा और शक्ति ग्रहण करता है। अतएव घोषणा पत्र इस आशा के साथ प्रकाशित किया जा रहा है कि इससे जनसाधारण को क्रांतिकारियों को समझने का अवसर मिलेगा और वे विरोधी प्रचार से गुमराह न होंगे।’’

हमारे क्रांतिकारियों ने जो कुछ इस घोषणा पत्र में लिखा था वही उस समय के भारत का सच था। क्रांतिकारियों का लक्ष्य स्पष्ट था। वह पहले दिन से ही पूर्ण स्वाधीनता की मांग करते हुए चले थे। पर जब कांग्रेस को अपनी भूल का अनुभव हुआ और उसने भी पूर्ण स्वाधीनता का संकल्प व्यक्त किया तो उसने तब भी अपना संघर्ष अंग्रेजों के विरूद्घ न चलाकर अपने क्रांतिकारियों के विरूद्घ ही चलाया था। जब कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता की मांग का संकल्प व्यक्त करने के लिए लाहौर अधिवेशन का शुभारंभ किया तो हर कांग्रेसी को इस बात का घोर कष्ट हो रहा था कि क्रांतिकारियों ने अंग्रेज वायसराय की हत्या के उद्देश्य से उसकी गाड़ी के नीचे बम रख दिया है। इसलिए गांधीजी ने पहले दिन ही प्रस्ताव रखा कि यह कांग्रेस इस बमकाण्ड की तीव्र निंदा करती है। अच्छा होता कि कांग्रेस पूर्ण स्वाधीनता की मंाग के अपने संकल्प के साथ अपने क्रांतिकारियों का साथ देने का भी संकल्प प्रस्ताव पारित करती। किसी भी कांग्रेसी का यह कह देना कि कांग्रेस का हिंसा में विश्वास नही था-उचित नही है। विशेषत: तब जबकि उन्होंने मुस्लिम लीग की हिंसा और अंग्रेजों की हिंसा की कहीं आलोचना या तो की ही नही, या करने में जानबूझकर प्रमाद का प्रदर्शन किया। अपने घोषणा पत्र में क्रांतिकारियों ने आगे लिखा था-‘‘क्रांतिकारियों का विश्वास है कि देश की मुक्ति का एकमात्र मार्ग क्रांति है। वे जिस क्रांति के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं, उसका परिणाम विदेशी सरकार और उसके पिट्ठुओं (कांग्रेसियों) तथा जनता के सशस्त्र संघर्ष के रूप में ही प्रकट नही होगा, अपितु वह देश में एक नया समाज स्थापित करने का कारण बनेगा। ऐसी क्रांति पूंजीवादी व्यवस्था, विषमता तथा विशेषाधिकारों को सदा के लिए दफना देगी। यह आपके लिए प्रसन्नता और उन करोड़ों इंसानों के लिए जो विदेशी साम्राज्यवादियों और भारतीय पूंजीवादियों की लूटखसोट का शिकार बने हैं, समृद्घि का संदेश लाएगी। इससे देश का वास्तविक रूप संसार के सामने आएगा, और वह एक नये राज्य और एक नये समाज को जन्म देगा।…..जनता का खून चूसने वाले वर्गों को सदा के लिए राजनीतिक सत्ता से वंचित कर देगा। क्रांतिकारियों को नौजवानों के असंतोष में इस आगामी क्रांति के चिन्ह दिखाई दे रहे हैं। …..गुलामी के अहसास और आजादी की तड़प से आखिर वे जोश में आकर जालिमों को मौत के घाट उतारने के लिए मैदान में निकल आएंगे। ….आज तक संसार में जितनी भी क्रांतियां हुई हैं, उनसे हमारे इस दृष्टिकोण का समर्थन होता है।’’

यह घोषणा पत्र बहुत लंबा था। इसमें देश की पूर्ण स्वाधीनता का वास्तविक संकल्प छिपा था। अब प्रश्न ये है कि यदि कांग्रेस भी वास्तव में  ही अब पूर्ण स्वाधीनता की बातें करने लगी थी, और उसे प्राप्त करने को ही अपना लक्ष्य घोषित कर चुकी थी तो उसे अपने क्रांतिकारियों की इस घोषणा को अपनाने में क्या आपत्ति थी? वास्तव में कांग्रेस पूर्ण स्वाधीनता के साथ-साथ अंग्रेजों के प्रति ‘पूर्ण सहृदयता’ को भी अब बनाये रखना चाहती थी। ….और यही वह बेमेल खिचड़ी थी जिसने कांग्रेस को अपने लोगों के साथ लगकर आंदोलन चलाने से रोका।

घोषणा पत्र में आगे कहा गया था-‘‘आओ, अब यह देखें कि कांग्रेस क्या कर रही है? उसने अपना ध्येय औपनिवेशिक दर्जे से बदलकर पूर्ण स्वाधीनता कर लिया है, इसके परिणामस्वरूप उससे आशा की जा सकती है कि वह ब्रिटिश सरकार के विरूद्घ युद्घ की घोषणा करेगी, पर इसके विपरीत उसने क्रांतिकारियों के विरूद्घ युद्घ की घोषणा कर दी है। उनका यह प्रस्ताव जिसके द्वारा ‘वायसराय -ए-हिंद’ लॉर्ड इर्विन की गाड़ी को बम से उड़ाने की निंदा की गयी है, इस सिलसिले की पहली कड़ी है। इस प्रस्ताव का प्रारूप गांधीजी ने तैयार किया था और उन्होंने पास कराने के लिए एडी से लेकर चोटी तक का जोर लगा दिया। इसके उपरांत यह प्रस्ताव 1713 के सदन में 81 वोटों के बहुमत से ही पारित हो सका। क्या यह मामूली बहुमत सच्ची राजनीतिक आस्था का परिणाम था? इस सिलसिले में सरलादेवी चौधरी का हवाला देना उचित होगा। वह आजीवन कांग्रेस की पक्की भगत रही हैं। उनका कहना है कि गांधीजी के बहुत से अनुयायियों से बात करने पर पता चला कि उन्होंने महज गांधीजी से वफादारी प्रकट करने के प्रस्ताव का समर्थन किया, वरना वे प्रस्ताव के पक्ष में नही थे…..इस प्रस्ताव का एक दुखद पहलू भी है और उसकी उपेक्षा नही की जा सकती। वह पहलू यह है कि इस बात के बावजूद भी कि कांग्रेस अहिंसा की नीति पर चल रही है और वह पिछले दस साल से उसका प्रचार कर रही है, और इसके बावजूद प्रस्ताव के समर्थकों ने क्रांतिकारियों को कायर और उनके कृत्य को बर्बर घोषित किया, इसके अलावा गांधीजी के एक चेले ने धमकी भरे लहजे में यहां तक कहा कि अगर वे गांधीजी का नेतृत्व चाहते हैं तो उन्हें एक मत से प्रस्ताव पारित करना चाहिए। यह प्रस्ताव बहुत मामूली बहुमत से पारित हुआ। इससे निस्संदेह यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देश क्रांतिकारियों के साथ है। अत: हम गांधीजी के आभारी हैं कि उन्होंने इस मामले को बहस का विषय बनाकर संसार को यह जानने का अवसर दिया कि अहिंसा के गढ़ कांग्रेस में भी यदि अधिक नही तो उतने ही लोग क्रांतिकारियों के साथ हैं, जितने गांधीजी के साथ हैं। गांधीजी ने इस प्रस्ताव को पास कराने के बाद क्रांतिकारियों पर आक्रमण के लिए कलम उठाई और ‘दि कल्ट ऑफ दि बम’ के नाम से एक लेख लिखा उनकी यह सफलता (प्रस्ताव पास कराना) उतनी उनकी विजय नही, जितनी हार है….।’’

इससे पूर्व गांधीजी देशभक्त क्रांतिकारियों को चार जनवरी 1928 को अपने द्वारा जवाहरलाल नेहरू को  लिखे गये एक पत्र में ‘शरारती और हुल्लड़बाज’ कह चुके थे। उस समय उनका यह संकेत चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव आदि की ओर था। जिसे देखकर सिद्घ होता है कि राहुल गांधी यदि आज भी जे.एन.यू. प्रकरण में देशविरोधी नारे लगाने वालों के साथ खड़े दिखाई दे सकते हैं, तो इसमें उनका कोई दोष नही है। यह अवगुण या कुसंस्कार उन्हें विरासत में मिला है। उसी अवगुण या कुसंस्कार के कारण आज वह वीर सावरकर जैसे देशभक्तों को ‘गद्दार’ कह रहे हैं। जिन्होंने ‘गद्दारी’ को देशभक्ति माना हो, उनके हाथ से देशभक्तों को देशभक्ति का प्रमाण पत्र मिलने की अपेक्षा भी नही की जा सकती।

कांग्रेस ने सिरों की गिनती के खेल वाले लोकतंत्र का प्रारंभ से ही दुरूपयोग किया है। पहले तो कांग्रेस में उन्हें भरो जो गांधी-नेहरू की जय बोलें-फिर उनपर यह अनिवार्य शर्त लगाओ कि हम जो कहें वही तुम्हें कहना है, और उसके उपरांत बाहर आकर कह दो कि सब कुछ लोकतांत्रिक प्रक्रिया से किया गया है। इसके उपरांत भी 1713 में से लगभग आधे से अधिक सदस्य गांधीजी के प्रस्ताव के विरोध में आ जाएं-तो यह बड़ी बात थी, जो यह सिद्घ करती थी कि कांग्रेसी भी अपने क्रांतिकारियों के साथ थे। यह अलग बात है कि इन आधे से अधिक विद्रोही कांग्रेसियों में से कुछ को गांधीजी ने अपने व्यक्तिगत प्रभाव से तोडक़र क्रांतिकारियों के विरोध में खड़ा करके दिखा दिया। कांग्रेस की ऐसी परिस्थितियों को आप लोकतंत्र नही कह सकते। यह लोकतंत्र की हत्या थी-अथवा जलती हुई एक चिता थी-जिसमें उठा-उठाकर हमारे क्रांतिकारियों  को गांधीजी जैसे कांग्रेसी अपने हाथों से डाल रहे थे। देशभक्तों के साथ ऐसा अशोभनीय व्यवहार क्या माना जाए-देशभक्ति या देश के साथ ‘गद्दारी’? निर्णय पाठक स्वयं करें।

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1 Comment on "देश का वास्तविक गद्दार कौन? भाग-5"

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Paul
Guest

Rakeshji

You ought to be complemented for bringing out this series on “Desh ka….kaun”. West Punjab was the hub of Hindu renaissance. It also was the granary of Bharat, entirely because of the labors of the hardy Sikhs. The duo of Gandhi-Nehru should not have accepted Radcliffe’s scheme till the safety of the Hindu and Sikhs had been assured. As it happened the division happened pell-mell with untold suffering to Hindus and Sikhs. All the while Gandhi was relaxing in the safety of Delhi and singing his silly bhajans.

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