लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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सावरकर

सावरकर

जब शास्त्रीजी ने सावरकरजी को देना आरंभ किया था मानधन

हमने पूर्व के आलेखों में स्पष्ट किया था कि वीर सावरकर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आदर्श वीर शिवाजी थे। यही कारण था कि उनके लिए राष्ट्र सर्वप्रथम था। उन दिनों लुई फिशर भारत की यात्रा पर आये थे। देश के विभाजन की संभावनाएं बड़ी तेजी से बनती जा रही थीं। लुई को यह बता दिया गया था कि विभाजन पर कांग्रेस लगभग सहमत हो चुकी है, परंतु सावरकर और उनका दल अभी भी बड़ी कठोरता से विभाजन का विरोध कर रहा है। तब फिशर जिन्नाह से भेंट करने के पश्चात सावरकर से मिलने पहुंचे। उन्होंने सावरकर जी से पहला प्रश्न ही यह किया-‘‘आपको मुसलमानों को अलग देश देने में क्या आपत्ति है?’’

सावरकरजी अपने अतिथि के मनोभावों को पूर्व से ही समझ चुके थे। इसलिए अतिथि के प्रश्न का उत्तर भी पूर्व से ही बनाये बैठे थे। उन्होंने लुई से प्रतिप्रश्न किया-‘‘आप लोग नीग्रो लोगों की भारी मांग के उपरांत भी उन्हें अलग ‘नीग्रोस्तान’ क्यों नही दे रहे हैं?’’

इस प्रश्न के उत्तर में लुई फिशर हमारे इस आधुनिक शिवाजी के जाल में घिर गया। उसने बिना सोचे समझे कह दिया-‘‘देश का विभाजन राष्ट्रीय अपराध होगा, इसलिए नही करते।’’मानो सावरकर जी की बात को लुई फिशर ने अपने मुंह से कह दिया। सावरकरजी बोले-‘‘आपका उत्तर राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत व तथ्यपूर्ण है। हर राष्ट्रभक्त अपने देश को खंडित होना या टुकड़े-टुकड़े होने देना सहन नही कर सकता। देश का विभाजन चाहने वाले देशभक्त कदापि नही कहे जा सकते। इसीलिए हम भारत विभाजन की योजना को राष्ट्र विरोधी बताकर उसका विरोध कर रहे हैं, जबकि मुस्लिम लीगी, जो इस देश को ही नापाक मानते हैं, इसके टुकड़े करने पर तुले हैं।’’

वीर सावरकर का उत्तर सुनकर लुई फिशर के पास कोई शब्द नही थे। बाद में उन्होंने एक लेख में लिखा था-‘‘मैंने सावरकरजी के हृदय में राष्ट्रभक्ति की असीमित भावना देखी, वहीं जिन्नाह के हृदय में भारत व भारतीय संस्कृति के प्रति घोर घृणा के भाव दिखाई दिये।’’

….और इसी जिन्नाह को गांधीजी ‘कायदे आजम’ कहते रहे। क्या चमत्कार है हमारे गांधीजी का कि उनकी दृष्टि में देशघातक जिन्ना तो महान नेता हैं, और सावरकरजी सुभाष या शिवाजी घृणा के पात्र हैं। कांग्रेस के राष्ट्रवाद को बड़ी गहराई से समझने की आवश्यकता है।

देश के विभाजन के लिए जब कांग्रेस लगभग सहमति दे चुकी थी या देती जा रही थी। तब 1945-46 ई. में केन्द्रीय असेम्बली के चुनावों में कांग्रेस के विषय में सावरकरजी ने अस्वस्थ होते हुए भी हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं को आादेश दिया कि वे केवल पूर्ण स्वाधीनता और अखण्ड भारत के सिद्घांतों को सामने रखकर चुनाव लड़ें। सावरकरजी का मत था कि इस चुनाव में कांग्रेस को वोट करना पाकिस्तान को वोट करने के समान होगा।’’ सावरकरजी की इस घोषणा से हिंदू समाज में धु्रवीकरण की प्रक्रिया आरंभ हो गयी थी। जिसे देखकर कांग्रेस के ‘वीर जवाहरलाल’ के पांवों के तले की धरती खिसक गयी थी, फलस्वरूप उन्होंने कलकत्ता में एक चुनावी भाषण में कहा-‘‘कांग्रेस का सदा विरोध करने वाली मुस्लिमलीग एक साम्प्रदायिक पार्टी है। हम उससे कदापि समझौता नही करेंगे, और न भारत के टुकड़े होने देंगे।’’

सावरकरजी ने पुन: कहा-‘‘ये (जवाहरलाल) कांग्रेसी नेता हिंदू मतदाता को अपने चंगुल में फंसाने के लिए ही मुस्लिम लीग को साम्प्रदायिक बता रहे हैं। यह इनका ढोंग है।’’ इस चुनाव में हिंदू महासभा भी कांग्रेस के झूठों के जाल में फंस गयी। उसने कांग्रेस के आश्वासन पर विश्वास कर लिया कि वह देश का विभाजन कभी स्वीकार नही करेगी। फलस्वरूप हिंदू महासभा ने हिंदू मतदाताओं के मतों का विभाजन रोकने के लिए अपने आपको चुनाव से लगभग दूर ही कर लिया। कुछ क्षेत्रों में ही उसने चुनाव लड़ा। पर चुनावों के उपरांत कांग्रेस अपनी बात से मुकर गयी। मुस्लिम लीग के साथ जाकर देश विभाजन को स्वीकार कर लिया। 3 जून 1947 को देश के विभाजन का विश्वासघात करते हुए कांग्रेस ने पाकिस्तान के निर्माण को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। कांग्रेस और मुस्लिम लीग उस दिन दोनों ही प्रसन्न थे। क्योंकि पाकिस्तान की मांग को दोनों की मान्यता मिल जाने से एक को भारत पर तो दूसरी को पाकिस्तान पर शासन करने की संभावनाएं स्पष्ट दिखाई देने लगी थीं। सावरकर जी एक बार पुन: सही सिद्घ हो चुके थे। उन्होंने कांग्रेस के विषय में पूर्व में ही कह दिया था कि यह विश्वासघात करेगी और सत्ता में आते ही पाकिस्तान निर्माण को अपनी स्वीकृति प्रदान करेगी। कांग्रेस ने वही कर दिया।

कांग्रेस की इसी विश्वासघाती नीति पर सावरकरजी ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा था-‘‘राष्ट्र का विभाजन कांग्रेस की कायर व तुष्टिकरण की आत्मघाती नीति का ही दुष्परिणाम है। यदि हिंदू कांग्रेस के अहिंसा व हिंदू मुस्लिम भाई-भाई के भ्रामक नारों में न फंसते तो भारत अखण्ड रूप में स्वाधीन हो जाता। मातृभूमि के खण्ड-खण्ड करने की मांग रखने वालों के षडय़ंत्र को ही खण्ड-खण्ड कर दिया जाता।’’

तीन जून 1947 को भारत विभाजन को स्वीकार करने के उपरंात नेहरूजी ने कहा था-‘‘भारत में विद्यमान हिंदू और मुस्लिम समस्या (जबकि भारत में हिंदू और मुस्लिम नाम की कोई समस्या कभी नही रही, इसके स्थान पर ‘मुस्लिम साम्प्रदायिकता’ नाम की समस्या रही है-पर उसे कांग्रेस ने कभी नही कहा-इसके राष्ट्रवाद और विश्वासघात का यह भी एक उदाहरण है) का सदैव के लिए समाधान करने हेतु ही हम भारत का विभाजन स्वीकार कर रहे हैं।’’

नेहरूजी की इस टिप्पणी का उत्तर देते हुए सावरकरजी ने कहा था-‘‘हिंदू मुस्लिम समस्या के समाधान के रूप में देश को खण्ड-खण्ड करने वालों को मैं चेतावनी देता हूं कि देश के बंटवारे से यह समस्या सुलझने के स्थान पर और भी अधिक उलझ जाएगी। पाकिस्तान की स्थापना होते ही, यह समस्या और भी अधिक उग्र रूप धारण कर लेगी।’’ आज हम देख रहे हैं कि-‘‘भारत तेरे टुकड़े होंगे-इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह’’ कहने वाले उसी नेहरू के नाम से स्थापित जवाहरलाल विश्वविद्यालय नई दिल्ली में जन्म ले चुके हैं, जो हमें बता रहे थे कि हमने भविष्य में भारत के और टुकड़े न होने देने के उद्देश्य से पाकिस्तान बन जाने पर अपनी सहमति दी है। देशभक्ति की मर्यादाएं तो उस समय टूट गयीं जब ‘नेहरू-गांधी’परिवार का उत्तराधिकारी इस अलगाववादी मनोवृत्ति को समर्थन देने जेएनयू पहुंच गया। कहने का अभिप्राय है कि कांग्रेस अपने परंपरागत संस्कारों को छोडऩे को आज भी तैयार नही है।

जब 27 मई 1964 को नेहरूजी का देहांत हो गया तो देश के शासन की बागडोर देश की मिट्टी से बने लालबहादुर शास्त्री को मिली। शास्त्रीजी ने 9 जून 1964 को देश की बागडोर संभाली। यह व्यक्ति मनसा वाचा कर्मणा भारतीय था। कांग्रेस के मंच पर उपस्थित रहने वाली उन कुछ महान प्रतिभाओं में से एक जिनकी राष्ट्रभक्ति और भारतीयता पर सारे देशवासियों को गर्व है। यदि कांग्रेस में शास्त्रीजी जैसे लोगों को प्रारंभ से ही सम्मान मिलता तो कांग्रेस सचमुच महान नेताओं की एक महान पार्टी कही जाती। तब इसका वह‘विश्वासघाती’ चेहरा लोगों के सामने ही नही आता, जिसके अनुसार इसने देशभक्तों को या तो जीते जी अपने मंच से भगा दिया था या मरने के उपरांत उनकी स्मृतियों को विस्मृति के गहरे गड्ढे में डाल दिया था। शास्त्रीजी और सरदार पटेल उन लोगों में से हैं जिनकी स्मृतियों के साथ भी कांग्रेस ने विश्वासघात (गद्दारी) की है। इन्हीं शास्त्रीजी ने वीर सावरकर को अपने कार्यकाल में सम्मान देकर उनकी अतुल्य देशभक्ति को नमन किया था।

मुंबई के ‘आलमगीर’ साप्ताहिक ने समाचार प्रकाशित किया था, उसने 28 मई 1963 को सावरकर की 80वीं जयंती के अवसर पर लिखा था कि-‘‘राष्ट्रपति के निवृत्ति वेतन में भी बढ़ोत्तरी की गयी है। परंतु जिनके त्याग के कारण हमारे राष्ट्रपति उस पद पर आरूढ़ हो सके, उन त्यागवीर सावरकरजी के प्रति अत्यंत उपेक्षा का व्यवहार भारत में हो रहा है।’’

‘आलमगीर’ की यह पीड़ा उस समय के सभी राष्ट्रभक्त देशवासियों की पीड़ा थी। जिस पर अक्टूबर 1964 में लालबहादुर शास्त्री जी ने ध्यान दिया। जिन्होंने शासक की नीतियों में सुधार करते हुए सावरकरजी की देशभक्ति को सम्मानित करने का विचार किया, उन्होंने सावरकर जी को कुछ मासिक मानधन देने का निर्णय लिया। इस पर सावरकरजी ने कहा-‘‘यदि मेरी देशसेवा के ही उपलक्ष्य में यह मानधन दिया जा रहा है तो ही मैं स्वीकार करूंगा।’’ शास्त्रीजी ने इसे सहर्ष स्वीकार किया। फलस्वरूप सावरकरजी को 300 रूपये मानधन दिया जाने लगा। इस प्रकार शास्त्रीजी की कांग्रेस ने सावरकरजी के बारे में अपनी भूल सुधार करते हुए उस पर प्रायश्चित कर लिया था। जिसे इंदिरा गांधी ने भी न्यूनाधिक यथावत स्वीकृति प्रदान की, शास्त्रीजी के काल से ही सावकरजी द्वारा रचित ‘‘जयोअस्तुते श्री मन्मंगले’’ जैसा स्वतंत्रता स्तोत्र आकाशवाणी से गाया जाने लगा। यह तो थी सम्मान की बात।

उधर देश के दूसरे राष्ट्रपति राधाकृष्णन भी थे, जिन्होंने श्री कृष्ण भाटिया को उनकी सिंधी पत्रिका ‘अमर ज्योति’ के जून 1965 ‘सावरकर विशेषांक’ के लिए अपना शुभकामना संदेश देना भी उचित नही माना था। इतना ही नही बड़ौदा के प्राध्यापक श्री इ.ऋ देसाई जी ने सावरकरजी के ‘मरणोमुख शरयेवर’ इस अनुपम काव्य का अंग्रेजी पद्यानुवाद किया था। उन्होंने भी राधाकृष्णन जी से इसकी भूमिका लिखने का अनुरोध किया था, उसे भी राष्ट्रपति ने बड़ी चतुराई से ठुकरा दिया। इसे ‘असहिष्णुता’ का कांग्रेसी संस्करण कहा जाना ही उचित होगा।

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