लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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mahatmaगांधी जी अपने स्वभाव से ही हिंदू विरोधी थे। इसे आप ऐसे भी कह सकते हैं कि बापू देश का विभाजन कराने के लिए आतुर शक्तियों या व्यक्तियों के सामने इतने झुक गये थे कि वह ‘हिंदू विरोधी’ हो गये थे। इन्दुलाल याज्ञिक ने अपनी पुस्तक ‘गांधीजी’ (पृष्ठ 195) पर लिखा है-‘‘हम पुराने जेल खाने में ही थे कि ईद का दिन आया। चाहे प्रत्यक्ष आश्चर्य जनक मालूम होता है, पर यह हकीकत है कि गांधीजी ने एक कट्टर हिंदू होने के बावजूद मिस्टर अली और दूसरे हमसाया मुसलमान कैदियों के साथ ईद मनाने में अच्छा खासा साथ दिया। वह सारे दिन उन मुसलमान कैदियों से जो कांटेदार जंगले से गुजरते हुए नजर आते थे, ईद की मुबारकबाद लेने में व्यस्त रहे। मिस्टर अली को मुबारकबादें और दुआएं देने में वह और भी उदारता से काम लेते रहे। इतने में शाम हो गयी। नया चांद कुछ क्षणों के लिए पेड़ों के ऊपर फिजा में झूलता और जेल की कठोर दीवारों को तकता हुआ नजर आता रहा। मि. अली से ज्यादा गांधीजी उसे देखने के लिए उत्सुक जान पड़ते थे। बहरहाल जिस समय चांद की झलक दिखायी दी गांधीजी के खुशी की कोई हद नही मालूम होती थी। वह इतने में उल्लास में भर गये कि चांद का पूर्ण दृश्य देखने के उत्साह में भर गये कि चांद का पूर्ण दृश्य देखने के उत्साह में जंगले से बाहर हो गये और आहलादवर्धक स्वर में मिस्टर अली को पुकारने लगे। वह भी पहुंच गये, और तुरंत हम सब लोग खुले अहाते में नये चांद का धुंधला सा सौंदर्य देखने के लिए एकत्रित हो गये।’’

गांधीजी के ऐसे कार्यों को उनकी अहिंसावादी नीति और प्रेम व बंधुत्व को बढ़ाने वाली उनकी प्रवृत्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। परंतु इतिहास की घटनाएं बताती हैं कि गांधीजी जिन लोगों का हृदय परिवर्तन कराना चाहते थे उनका हृदय परिवर्तन तो क्या होना था? हां, उनका राष्ट्रपरिवर्तन अवश्य हो गया था। जिससे उस समय के सभी राष्ट्रवादियों के हृदय को गहरी ठेस लगी थी। किसी भी इतिहासकार ने यह खोजने या सोचने की आवश्यकता नही समझी कि गांधीजी अपने ‘उद्देश्य’ में असफल क्यों रहे, और कैसे उनकी ये तुष्टिकरण की नीतियां देश के विभाजन का कारण बन गयीं? तनिक सुशीला की डायरी के ये शब्द भी ध्यान से पढ़े जाएं:-

‘‘शाम को घूमते समय बापू बताते रहे कि कैसे वे एक बार कुतुबमीनार देखने गये थे। दिखाने वाला इतिहास का बड़ा विद्वान था। वह बता रहा था कि कुतुब के बाहर के दरवाजे की सीढ़ी से लेकर एक-एक पत्थर मूत्र्ति का पत्थर है। मुझसे यह सहन (क्योंकि बताने वाला हिंदू इतिहास के गौरवमयी पक्ष को क्यों बताने लगा था? उसे तो गांधीजी के अनुसार यही बोलना चाहिए था कि यह इमारत अमुक मुस्लिम सुल्तान ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अमुक समय में तैयार करायी थी) नही हुआ। मैं आगे बढ़ ही नही सका और मुझे वापस ले चलने को उन्हें कहा और मैं वापस आ गया। पीछे इस्लाम के विषय में बातें होती रहीं। बापू जानते थे कि मुसलमानों ने (हिंदुओं पर) कितने अत्याचार किये हैं। फिर भी मुसलमानों के प्रति वह इतनी उदारता और इतना प्रेम बरतते हैं? मुसलमान उन्हें गाली देते हैं तो भी उनकी खातिर वह हिंदुओं से लड़ते हैं? यह चकित करने वाली चीज है। उनकी अहिंसा की कसौटी है।’’ (पृष्ठ 126)

गांधीजी ने राम-रहीम सब बराबर करके देख लिये, ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ को जन्म देकर भी देख लिया, ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ भी गाकर देख लिया-पर वह देश का विभाजन नही रोक पाये। कारण कि उनका ‘सत्य के साथ प्रयोग’ सत्य के साथ न होकर मिथ्या और भ्रामक बातों के साथ हो रहा था। जिसे ना तो तार्किक ही कहा जा सकता था और ना ही उचित कहा जा सकता था। गांधीजी के इस आचरण से अंग्रेजों को, मुस्लिम लीग के मुस्लिम नेताओं को और कांग्रेस के हिंदू नेताओं को अपने हाथों में खिलाने का अवसर मिल गया।

गांधीजी अपने जीवन में यह नही समझ पाये कि जब कोई व्यक्ति हिंदू से मुसलमान या ईसाई बनता है तो वह न केवल एक विधर्मी बन जाता है, अपितु भारत के बहुसंख्यक समाज का और स्वयं भारत का एक शत्रु भी बन जाता है। इसलिए सावरकरजी ने इतिहास को बड़ी सूक्ष्मता से समझा और उसके मर्म को हृदयंगम करके यह निष्कर्ष निकाला कि धर्मांतरण से व्यक्ति का पहले तो मर्मांतरण होता है, और फिर वह राष्ट्रांतरण में जाकर समाप्त होता है। सावरकरजी को इतिहास बोध था। उन्होंने इस तथ्य को समझा था कि भारत के ईरान, अफगानिस्तान आदि के रूप में टुकड़े केवल इसलिए हुए थे कि वहां धर्मांतरण की प्रक्रिया बड़ी तेजी से चली थी। गांधीजी और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी नेहरूजी इतिहास के इस सच से आंखें फेरने की डगर पर बढ़ते गये। वह इसे अतीत का दुखद अध्याय मानते रहे और इस कल्पना में डूबे रहे कि अब ऐसा नही होने वाला। अब तो देश का बंटवारा (गांधीजी के शब्दों में) मेरी लाश पर ही होगा। अब सावरकरजी के व्यावहारिक दृष्टिकोण को भी समझने की आवश्यकता है। उन्होंने धर्मांतरण पर कहा था-‘‘धर्मपरिवर्तन के इस षडय़ंत्र की ओर पैनी दृष्टि से देखते रहो। केवल परमार्थ की चर्चा, और अद्वैत की चर्चा का विवाद अथवा चेतन-अचेतन वस्तुओं पर अनुसंधान का अर्थ धर्म नही है। धर्म का अर्थ है व्यवहार। धर्म अर्थात इतिहास, धर्म अर्थात राष्ट्र। यदि इंग्लैंड का राजा प्रोटैस्टैंट न हो तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है। अमेरिका के प्रेसीडेंट को प्रोटेस्टेंट बाइबिल की शपथ ग्रहण करनी पड़ती है। मध्य पूर्व का प्रत्येक छोटे से छोटा राष्ट्र भी धर्म प्रधान है। झूठी धर्मनिरपेक्षता की डींगें हांकने से क्या लाभ? मनुष्य धर्मरहित रह ही नही सकता। धर्म एक प्रचण्ड सामथ्र्य है। धर्महीन स्टॉलिन को भी यह स्वीकार करना पड़ा था।…न्याय के प्रति सहिष्णुता और अन्याय के प्रति असहिष्णुता यह हिंदू धर्म का पाठ है। अन्याय के प्रति सहिष्णुता कायरता है।….समय रहते सावधान रहने से धर्मांतरान्तर्गत राष्ट्रांतरण का संकट टल सकता है।’’

सावरकरजी का यह चिंतन आज भी उतना ही नवीन है, जितना उनके लिखते समय नवीन था। आज भी भारत को धर्मनिरपेक्ष रहने के लिए वही देश-प्रेरित करते हैं, जो स्वयं ईसाई देश या मुस्लिम देश कहलाने में गौरव अनुभव करते हैं। उन्हें पता है कि भारत में उनका ‘मिशन’ तभी सफल हो सकता है, जब यह देश धर्मनिरपेक्ष रहे। यदि सावरकरजी और गांधीजी व नेहरूजी को एक वैद्य मान लिया जाए और देश को एक रोगी मान लिया जाए, तो गांधी-नेहरू जिस प्रकार से अपने रोगी का उपचार करना चाहते थे उससे रोगी का रोग समूल नष्ट होने वाला नही था। उसके उपचार से रोग बढ़ता ही जा रहा था और रोगी निरंतर ‘कोमा’ की ओर जा रहा था। जबकि सावरकर आयुर्वेदाचार्य थे, वह रोग को समूल नष्ट करने के लिए उपचार कर रहे थे। वह मूल पर प्रहार कर रहे थे और धर्मांतरण को रोग बढ़ाने में सबसे अधिक प्रबल कारण सिद्घ कर रहे थे, इसलिए उसे रोकने के लिए कह रहे थे। उनका मानना था कि मुसलमानों को संवैधानिक रूप से सारे मौलिक अधिकार तो प्रदान किये जाएं, किंंतु मजहबी आरक्षण की व्यवस्था को न रखा जाए। वह जातिगत आरक्षण के भी विरोधी थे-इसके स्थान पर वह आर्थिक आधार पर आरक्षण के समर्थक थे, कहने का अभिप्राय है कि सावरकरजी ‘लोकोत्तर दृष्टा’ थे। वह आरक्षण को जाति या साम्प्रदायिक झगड़ों का मूल कारण मानते थे। आज की परिस्थितियां बता रही हैं कि गांधी-नेहरू ने जिस प्रकार भारत रूपी रोगी का उपचार किया उससे रोगी का रोग और गहरा गया है। आज प्रत्येक प्रकार का आरक्षण देश के गले की हड्डी बन गया है। चारों ओर अशांति है। यह अशांति गांधी-नेहरू की नीतियों का परिणाम है।

जहां तक अब कांग्रेस द्वारा सावरकरजी जैसे दूरदृष्टा को ‘गद्दार’ कहे जाने की बात है तो यह रोग भी कांग्रेसियों में पुराना रहा है। नेहरूजी ने प्रधानमंत्री रहते सशक्त क्रांतिकारियों को एक बार ‘विकृत मानसिकता वाला’ कह दिया था। जिनमें भगतसिंह भी सम्मिलित थे-आज की कांग्रेस ने सरदार भगतसिंह को क्रांतिकारी मानकर अपने नेता नेहरू को ‘आधा झूठा’ तो स्वयं ही सिद्घ कर दिया है। तब सावरकर जी ने नेहरूजी को उत्तर दिया था-‘‘नेहरूजी के मुख से खुदीराम बोस प्रभूति सशस्त्र क्रांतिकारियों को ‘विकृत मनोवृत्ति’ का बताया जाना घोर शर्मनाक और आपत्तिजनक है। क्रांतिकारी राष्ट्रभक्तों की मनोवृत्ति विकृत नही थी, अपितु उनकी घोर उपेक्षा करने वाले ही विकृति के शिकार हैं।’’ नेहरूजी के पास सावरकर जी की इस बात का कोई उत्तर नही था।

राहुल गांधी को सावरकरजी को ‘गद्दार’ कहने से पहले अपने पूर्वजों का ही इतिहास पढऩा चाहिए था। क्योंकि जिस समय 26 फरवरी 1966 को सावरकरजी का देहांत हुआ था उस समय देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी थीं। उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में 1980 में सावरकर जन्म शताब्दी के लिए अपनी ओर से ग्यारह हजार रूपये का चैक दिया था और सावरकरजी को देश के एक महान सपूत के रूप में स्मरण किया था। इस प्रकार श्रीमती गांधी ने नेहरूजी द्वारा क्रांतिकारियों को ‘विकृत मानसिकता’ वाला कहने के शेष आधे झूठ की क्षतिपूत्र्ति कर दी थी। श्रीमती गांधी ने वीर सावरकर पर एक डाक टिकट भी जारी किया था जो इस बात का प्रमाण था कि कांग्रेस सरकार वीर सावरकर को एक ‘राष्ट्रवादी योद्घा’ के रूप में मान्यता देती है।

अब राहुल गांधी पूर्व में ही पूर्णत: स्थापित एक सत्य को यदि झुठला रहे हैं तो वह अपने पूर्वजों को ही अपमानित कर रहे हैं।

अब एक और तथ्य की ओर आते हैं। जैसे नेहरू जी ने सशस्त्र क्रांतिकारियों को विकृत मानसिकता वाला कहा था  वैसे ही गांधीजी ने 9 अप्रैल 1925  को ‘यंग इंडिया’ में शिवाजी महाराज को ‘कुमंत्रित देशभक्त’ लिख दिया था। उन्हें अपने कहे को सुधारने में 8 वर्ष का समय लगा। तब उन्होंने 20 नवंबर 1933 को एक अन्य पत्र में अपनी भूल सुधार की। गांधीजी ने क्रांतिकारियों के विषय में अपने कथन को 8 वर्ष पश्चात सुधार लिया था और नेहरू की बात को इंदिरा गांधी ने सुधार लिया था, अब राहुल की कांग्रेस की मूर्खता को कौन और कितने समय में सुधारेगा? लगता तो यह है कि कांग्रेस की बार-बार की मूर्खता को अब कोई और नही, जनता ही सुधारेगी? क्रांतिकारियों के अपमान का यह क्रम अब टूटना ही चाहिए। समय अब एक पूर्ण उत्तर की प्रतीक्षा में है।

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