लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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nehruवीर सावरकर और पंडित नेहरू का इतिहास संबंधी ज्ञान
वीर सावरकर एक उत्कृष्ट कोटि के राष्ट्र प्रचेता लेखक थे। वह लिखते हैं :-‘‘विश्व का इतिहास छान-छानकर हम थक गये। देवासुरों, इंद्र वृत्तासुर, रावण आदि की वैदिक कथाओं से लेकर प्राचीन ईरान, ग्रीस, रोम, अरब, अमेरिका, इंग्लैंड, चीन, जापान, स्पेनिश, मूर, तुर्क, ग्रीस, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, इटली आदि के ताजे से ताजे इतिहास तक सारी राज्यक्रांतियों के और राष्ट्र स्वतंत्रता के इतिहास तक मानवी राजनीति के अधिकतम इतिहास ग्रंथों के पारायण मैंने स्वयं किये हैं, और उस पर सैकड़ों व्याख्यान भी दिये हैं। हिंदुस्थान के कुछ प्राचीन और राजपूत, बुंदेल, सिख, मराठा आदि अर्वाचीन, इतिहास का पन्ना-पन्ना मैंने छान मारा है, और उन सबसे एक ही निष्कर्ष निकलता देखा है कि धर्म के लिए मरना चाहिए किंतु इतना ही कहने से कार्य पूरा नही होता अपितु गुरू रामदास की जो उक्ति है-‘मरते-मरते भी आततायी को मारो’ और मारते-मारते अपना राज्य प्राप्त करो-उसे स्वीकार करना ही स्वतंत्रता की प्राप्ति का साधन है।’’

(सावरकर समग्र पृष्ठ 298)

इस उद्घरण से सावरकरजी के विषय में पता चलता है कि उनका इतिहास संबंधी ज्ञान भारत तक ही सीमित नही था। उन्होंने विश्व इतिहास का मंथन किया था और उसके मंथन से उन्हें आत्मोत्थानी क्रांति की गंूज सुनाई देती थी। वह मानते थे कि जब तक आत्मोत्थानी क्रांति को किसी राष्ट्र की सांसों का स्पंदन नही बनाया जाएगा तब तक वह राष्ट्र स्वतंत्रता का अर्थ भी नही समझ पाएगा। सावरकरजी ने मजहब के नाम पर विश्व में किये गये भारी रक्तपात को क्रांति का नाम न देकर उसे मानवता के विरूद्घ एक पाप माना। उन्होंने मजहब को मानवता का हत्यारा माना। जिसने मानव को उन्मादी बनाकर मानवता का संहार किया। यह सावरकरजी ही थे जिन्होंने भारत के इतिहास के रोम-रोम को जब निचोड़ कर देखा तो उन्हें सर्वत्र क्रांति अमृत ही छलकता दिखाई दिया। वह लिखते हैं :-‘‘जिस प्रकार जो खेत उत्तम उपज देता है वह उत्तम माना जाता है ठीक उसी प्रकार उत्तम स्त्री पुरूष को जन्म देने वाला देश भी श्रेष्ठ होता है। इस दृष्टिकोण से यदि हम भारत की श्रेष्ठता का अवलोकन करें तो हमें क्या दिखेगा? अंगीरस, गर्ग, वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, जनक आदि महान तत्ववेता। कणाद, कपिल, भास्कर, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भरत पाणिनि, बाणभट्ट, चरक आदि कवितादेवी के लाल। गौतमबुद्घ, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, गुरूनानक आदि धर्मसंस्थापक। श्री रामचंद्र, नल, युधिष्ठिर सदृश प्रजारंजक राजा। अर्जुन, कृष्ण, कर्ण इत्यादि अतिरथी महारथी। चंद्रगुप्त, शालिवाहन, अशोक, विक्रमादित्य इत्यादि साम्राज्य संस्थापक, शुक्राचार्य और हरिश्चंद्र सदृश मूर्तिमंद सद्गुणी। गार्गेयी, लोपामुद्रा, अहिल्या, तारा मंदोदरी, सावित्री और सीता इत्यादि नारियां। बताओ दुनिया वालो अपने इस महाभाग्य की गणना हम कैसे करें? यह कार्य बहुत कठिन है।

‘‘इन विभूतियों का नामोच्चार तो केवल एक झांकी मात्र है। यदि भारत का संपूर्ण इतिहास उपलब्ध होता तो क्या होता? जो है वह व्यवस्थित संकलित नही है। अभी तो भारत महोदधि के अथाह जलराशि में से यह टिटहरी केवल चोंच भर पानी ही ला पायी है। यह वर्णन तो हमारे इतिहास का पूर्वाद्र्घ मात्र है। आधुनिक काल के रत्नों की सूची तो अभी अलग है।’’

‘‘चित्तौड़ के महाराणा प्रताप, बुंदेलखण्ड के छत्रसाल, बंगाल के प्रतापादित्य, रायगढ़ के हिंदूपद शाह छत्रपति शिवाजी पूना के शनिवारवाड़ा के मालिकपेशवा ग्वालियर के महादजी, पानीपत का रणमैदान, सिंहगढ़ की खड़ी चट्टान, ज्ञानेश्वर की लेखनी विवोवा के भक्त, समर्थ रामदास के दास कितनों को गिनें-गिनायें और कहां तक वर्णन करें।’’ हिंदुत्व के इतिहास पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी लेखनी चलाई। पर उन्होंने नई-नई भ्रामक कल्पनाओं के उस जाल को भारत के ऊपर बुनकर डालने का कार्य किया जिससे इस देश में आत्मगौरव के स्थान पर आत्महीनता का बोध हो, एकता के स्थान पर विभिन्नताएं दिखाई दें और राष्ट्रीय भावना का सत्यानाश हो। जैसे उनकी मान्यता रही कि भारत के लोग बाहरी लोगों के वंशज हैं, यहां बाहर से काफिले आते गये और हिंदोस्तां बनता गया। ‘हिन्दुस्तान की खोज’ उनकी इसी कल्पना को साकार करती है। स्वतंत्रता के पश्चात इस पुस्तक को भारत की इतिहास पुस्तकों में गीता के समान पवित्र और प्रामाणिक माना गया और कांग्रेसी सरकारों ने इसका बढ़-चढक़र प्रचार-प्रसार किया। फलस्वरूप देश में बड़ी तेजी से यह विचार फैला कि :-

सर जमीने हिंद पर अखलाके आवामे फिराक।

काफिले आते गये और हिन्दोस्तां बनता गया।।

इस मान्यता ने भारत की प्राचीनता और उसके सनातन धर्म की गंभीरता के साथ विश्वासघात किया। लोगों ने बड़ी तेजी से अपना मूल विदेशों में खोजना आरंभ कर दिया। नेहरू जी ने शक, हूण, सातवाहन, कुषाण आदि कथित विदेशी जातियों के भारत आगमन से पूर्व के उस भारत की वास्तविकता को गंभीरता से ना तो समझा और ना समझने का प्रयास या लिखने का प्रयास किया जो इस भारत का ही नही अपितु सारे विश्व का मूल है। इस प्रकार नेहरूजी की अपनी सीमित जानकारी के कारण भारत ही नही संपूर्ण विश्व ही अपने मूल से कट गया। विचारधाराओं का अधकचरापन जब व्यापक रूप से फेेल जाता है तो वह किसी देश की संस्कृति पर भारी कुठाराघात किया करता है। दुर्भाग्य से नेहरूजी की इतिहास संबंधी जानकारी ने भारत के साथ ऐसा ही किया है। पंडित नेहरू भारतीय धर्म संस्कृति के मर्मज्ञ नही थे। जबकि वीर सावरकरजी भारतीय धर्म-संस्कृति के मर्मज्ञ चिंतक थे और उसकी सूक्ष्म से सूक्ष्म तात्विक बातों को भी जानते थे। नेहरूजी जीवन भर धर्म और मजहब का अंतर नही कर पाये, उन्हें धर्म के वैज्ञानिक स्वरूप का और धर्म एवं विज्ञान के समन्वय का ज्ञान नही था। वह नही जानते थे कि धर्मव्यक्ति के ज्ञान-विज्ञान में अंशत: भी बाधक नही है, अपितु धर्मव्यक्ति को अपने इहलौकिक और पारलौकिक संपूर्ण विकास की सुरक्षा प्रदान करता है। धर्म के विषय में वह हिंदुस्तान की कहानी में लिखते हैं :-धर्म शब्द का व्यापक अर्थ लेते हुए हम देखेंगे कि इसका संबंध मनुष्य के अनुभव के उन प्रदेशों से है जिनकी ठीक-ठीक माप नही हुई है, यानि जो विज्ञान की निश्चित जानकारी की हद में नही आया है।……शायद विज्ञान के साधारण तरीके और यह बात कि उसका संबंध दृश्य जगत और उसकी क्रियाओं से है, उसे उन बातों में पूरी तरह कारगर न होने दे जो आत्मिक, कलात्मक, आध्यात्मिक और अदृश्य जगत से संबंध रखने वाली है। जो हम देखते सुनते और अनुभव करते हैं, यानि दिखाई पडऩे वाली और समय और अंतरिक्ष के भीतर परिवर्तनशील दुनिया तक ही जिंदगी महदूद नही है। यह बराबर स्पर्श कर रही है एक अनोखी दुनिया को, जिसमें दूसरे संभवत: ज्यादा टिकने या उतने ही परिवर्तनशील तत्व हैं, और कोई विचारवान आदमी इस अनेदखी दुनिया की अवहेलना नही कर सकता।’’

इसी पुस्तक में नेहरूजी भारत की वर्ण व्यवस्था के विषय में अपने अज्ञान को स्पष्ट करते हैं :-वर्ण या जाति लफ्ज के इस्तेमाल से कुछ गलतफहमी होती है, क्योंकि अलग-अलग लोग इसके अलग-अलग मायने लगाते हैं। साधारण यूरोपियन या उसी के जैसे विचारों वाला हिंदुस्तानी यह समझता है कि यह केवल वर्णों को पत्थर की तरह मजबूत करके अलग-अलग कर देना है, और यह महज इस बात की तरकीब है कि वर्णभेद बना रहे, ऊंचे वर्ण के लोग सदा-सदा के लिए नीचे बने रहें। इस विचार में सच्चाई है….लेकिन सच्चाई का यह महज एक पहलू है ओर इस कैफियत से यह नही पता चलता कि आखिर इस व्यवस्था में इतनी शक्ति और मजबूती क्यों रही कि यह आज तक चली आ रही है। ….जिंदगी के हालात में तब्दीली आ गयी है …….संघर्ष है सामाजिक संगठन के मसले पर दो जुदा-जुदा नजरियों में। एक तरफ है पुराना हिंदू विचार कि वर्ण या गिरोह संगठन की बुनियाई ईकाई है। दूसरी तरफ पश्चिम का विचार है कि जो बहुत ज्यादा व्यक्तिवाद पर जोर देता है जो व्यक्ति को कर्ण से ऊपर रखता है।’’

नेहरूजी पर्दा प्रथा पर भी इस प्रकार लिखते हैं कि जैसे कि यह भारत में सदा से रही है और इसका विरोध कभी किसी ने नही किया है और यदि किया है तो वह उनकी पार्टी कांग्रेस और उनके नेता गांधीजी ने किया है। कुल मिलाकर हमारा कहने का अभिप्राय है कि नेहरूजी की भारतीय धर्म इतिहास संबंधी व्याख्या से भारत के विषय में पाठक का मत यही बनता है कि भारत पूर्णत: अंधकार में रहा है और इसका धर्म अंधकार का उपासक है। हिंदू समाज अंधकार में भटकने वाले कीड़े मकोड़ों का एक समुदाय है। यदि इसे बचाना है तो इस देश को पश्चिम का अनुकरण करन्ना ही होगा। नेहरूजी के इसी विचार को जेएनयू जैसी संस्थाएं फैल रही हैं। जबकि होना यह चाहिए था कि भारत के धर्म को ‘तमसो माज्योतिगर्मय’ की परंपरा को विज्ञान के साथ जोडक़र इसके धर्म और विज्ञान के समन्वय को बताया जाता, इसकी  रूढिय़ों को मिटाकर इसके धर्म की परंपराओं की पुर्नप्रतिष्ठा की जाती। सावरकरजी इसी मत के थे।

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