लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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 पी.बी. लोमियो

इस प्रश्न का आम तौर पर जो उत्तर दिया जाएगा वह यही होगा कि आतंकवादियों के सिवाए और कौन हो सकता है। प्रिंट मीडिया हो या इलैक्ट्रोनिक चैनल्स हों सभी यही कयास लगा रहे हैं कि देश की शान्ति भंग करने के इरादे से ये धमाके किये जा रहे हैं। देश में अव्यवस्था फैलाने की नीयत से कट्टरपंथी लोग, जिनका कोई मजहब नहीं होता, यह सब उन्हीं का काम है। इसमें सच्चाई भी यही है कि यह कार्य आतंवादियों का ही है। लेकिन इन आतंकवादियों का इस्तेमाल कौन कर रहा है? फिर आम लोग वही गिने-गिनाए आतंकी संगठनों, देशी या विदेशी, घरेलू या पड़ोसी देशों पर दोषारोपण कर के अपना गुस्सा जाहिर करते नज़र आते हैं। इस तरह के कयास पिछले 15 या 20 वर्ष से ही लगाये जाने लगे हैं। पहले जब कभी ऐसी घटनाएं होती थीं तो हमारे नेतागण तुरन्त कह देते थे कि यह काम विदेशी ताकतों का है। हमारे कॉमरेड तो गला फाड़-फाड़कर कहते थे: ’’यह काम अमेरिका की खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. का ही होगा क्योंकि अमेरिका हमारे देश का विकास नहीं देख सकता।’’ – उनका यह मानना ठीक भी था, लेकिन अब तो पूरे देश की कोई भी पार्टी सी.आई.ए. का भूल कर भी नाम नहीं लेती। आखिर ऐसा क्यों है? अब क्या अमेरिका ने सी.आई.ए. के दफ्तर बंद कर दिए हैं और उनमें पोल्ट्री फॉर्म खोल दिए हैं? इसमें कोई शक नहीं कि विध्वंसकारी घटनाओं को तालिबान, और उसके अन्य घटकों के नुमाइंदों के द्वारा अंजाम दिया जाता है या जैसा कि कहा जा रहा है कि, प्रतिक्रियात्मक रूप से कुछ देशी अतिवादी भी ऐसी घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं, लेकिन इन लोगों को इतने महंगे उपकरण, विस्फोटक सामग्री, और अंजाम दिये जाने का आवश्यक खर्चा कौन उठा रहा है? इस कंगोलों के पास न ओढ़ने को है न बिछाने को।

फिर प्रश्न नही उठता हे, कि आखिर हमारे राजनैतिक लोग सी.आई.ए. को क्यों भूल गये हैं? रूस्तम गलिउल्लिन की माने तो उन्होने स्पष्ट किया हैः सी.आई.ए. अपनी नीतियों के अनुसार – ’’पहले सरकारी कार्यकलाप से सम्बन्धित संवेदनशील सूचनाओं तक पहुँच पाने के लिए आरंभिक सम्पर्क कायम किये जाते हैं, फिर इन ’’सम्पर्को’’ को ’’ठोस वित्तीय आधार’’ प्रदान किया जाता है (भारी घूस दी जाती है) और अंत में इन मुखबिरों को ’’ब्लेकमेल’’ किया जाता है। अगर वे हत्याओ और सत्ता परिवर्तन में मदद नहीं करते तो सी.आई.ए. से उनके सम्बन्धों को उद्घाटित कर दिया जाता है।’’ – (रूस्तम गलीउल्लिन – सी.आई.ए. बनाम एशिया, पृष्ठ सं. 150) – रूस्तम गलीउल्लिन के अनुसार एशिया भर में जो कुछ अप्रिय घटा है, उसके पीछे अमेरिका का ही हाथ रहा है और इन घटनाओं का ताना-बाना सी.आई.ए. द्वारा ही बुना जाता है।

भारत के उत्तर पूर्व के राज्यों में जो कुछ हुआ वह सब सी.आई.ए. के एजेंटों की करतूत है। भारी तादाद में ’’ईश्वर सेवकों-मिशनरियों’’ के रूप में बड़े से बड़ा उलटफेर करने में महारत हासिल किये हुए होते हैं। सी.आई.ए. का नेटवर्क देशी महात्माओं और बाबाओं तक भी विद्यमान है। इन बाबाओं और सिद्ध पुरूषों की पहुँच दिल्ली की राजगद्दी तक होती है। हाल ही में पुट्टुपर्थी के सांई की मृत्यु पर हमारे राष्ट्र के शीर्षस्थ लोगों ने उनके पार्थिव शरीर का नमन किया और यहाँ तक कि उनके किसी राष्ट्रीय पद पर पदासीन न होने पर भी राष्ट्र ध्वज से राजकीय सम्मान दिया गया। उनके अकूत खजाने पर आजकल काफी गरमागरमी मची है यह तो आम आदमी को मालूम है। क्या हमारे देश की सरकार के शीर्ष लोग भी सी.आई.ए. के मकड़जाल में कैद हो चुके हैं?

हमारी राजनैतिक पार्टियों में सी.आई.ए. की अच्छी पैठ जान पड़ती है। इसका सबूत है सैकड़ों राजनैतिक पार्टियाँ – इमरजैंसी के बाद भारत में मात्र तीन पार्टियाँ रह गई थी – कांग्रेस, जनता पार्टी और कम्युनिष्ठ में लाल झंडे वाली कई पार्टियाँ। वर्तमान समय में तीन कांग्रेस पार्टियाँ है जिनकी मुखिया सोनिया गांधी, ममता बनर्जी और शरद पवार है, जनता पार्टी में कई टुकड़े हुए भाजपा, जनता, आर.जे.डी., लोकशक्ति, जे.डी.यू., जनता दल सेक्यूलर इत्यादि इत्यादि यानि अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग। इन पार्टियों में भी और विभाजन की सम्भावनाऐं हैं। कई क्षेत्रीय पाटियाँ भी है।

सी.आई.ए. के माध्यम से अमेरिका भारत को कई टुकड़ों में बाँटना चाहता है। अतः वह यहाँ के राजनेताओं के चरित्र और स्वभाव की अच्छी परख रखता है – अमुक पार्टी में अमुक नेता अति महत्वकांक्षी है – वह हमारे काम आ सकता हैं – उसे लालच देकर खरीदा जा सकता है वह अपनी मूल पार्टी छोड़कर अलग पार्टी बना लेता है। कुछ छुटभइयों की सहायता से वह चुनाव में कुछ सीटें जीत जाता है यह सी.आई.ए. का पॉकेटी प्यादा भावी सरकार बनाने व गिराने तक में काम आता है। केन्द्र सरकार या राज्य सरकारें बनाने और गिरानें में जो नाटक बाजी या खरीद फरोख्त होती है उससे सभी परिचित है।

रूस्तम गलीउल्लिन ने अपनी उक्त पुस्तक में ऐसी ही घटना का वर्णन किया है: लारकिंस भाइयों (भारत के वायुसेना के अफसर जो जासूसी में पकड़े गये थे) पर मुकदमा अभी चल ही रहा था कि भारतीय सेना के जनरल स्टाफ के एक भूतपूर्व उप प्रमुख, रिटायर्ड लेफिटनेंट जनरल एस.के. सिन्हा ने पश्चिमी बंगाल में केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (सी.बी.आई.) के कार्यालय मे जाकर एक वक्तव्य दिया। उसमें उन्होने स्वीकार किया कि अपने को कलकत्ता (अब कोलकाता) में यू.एस.ए. का व्यापारिक प्रतिनिधि बताने वाले जॉर्ज शैर्मन नामक एक अमेरिकी राजनयिक ने उन्हें ’’एक क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी गठित करने और अलग कार्यक्रम के साथ जनवरी 1985 के आम चुनावों में भाग लेने के लिए वित्तीय मदद देने का प्रस्ताव दिया था। अमेरिकी कांसुलेट के संरक्षण में पश्चिमी बंगाल में काम करने वाली उस नई पार्टी को सभी वामपंथी पार्टियों और कांग्रेस पार्टी का मुकाबला करने वाली पार्टी बनाना था। अमेरिकी राजनयिक ने जनरल को कहा था कि वे (अमेरिका) नई पार्टी का सारा खर्चा उठाने के लिए तेयार है। सी.आई.ए. की इस नई हरकत की सूचना देते हुए ’’हिंदुस्तान टाइम्स’’ ने इसे व्हाइट हाऊस के उपरोक्त प्रपत्र पर राजनीतिक तरीको से अमल करने की कोशिश कहा था।’’(रू.ग. – पृ.सं. 139)

पार्टी बदल, दल बदल आदि की घटनाऐं हमारे राजनेताओं द्वारा बहुतायत से होती हैं। क्या कारण है कि चाहे केन्द्र में या कुछ राज्यों में भी सोनिया कांग्रेस, ममता कांग्रेंस और पावर कांग्रेस तीनों मिल कर सत्ता पर काबिज हैं? यदि इन्हें यही करना था, तो अलग-अलग चूल्हा जलाने की क्या जरूरत है? इन्हें अपनी-अपनी महत्वकांक्षाओं के आगे देश और जनता से क्या लेना देना – देश जाये भाड़ में और जनता तो जब तक दुधारू है दुहे जाओ।

पिछले दिनों भाजपा की एक फायर ब्रांड महिला नेता ने तुनक मिजाजी दिखा कर पार्टी छोड़ दी थी – नई पार्टी बनाई लेकिन इसकी जड़े नही जमी (अमर बेल की जड़े नही होती – वह परजीवी पौधा जो हैं) तो फिर बैक डोर से वापस पार्टी में हाजिर हो गई। इस घटना से सभी भाजपाई खुश नहीं हैं क्योंकि इस पार्टी में मुख्य रूप से दो विचारधाराओं वाले लोग शामिल हैं – एक वे हैं जो साम्प्रदायिकता में विश्वास रखते हैं और दूसरे वे हैं जो ’’राष्ट्रवादी विचारधारा’’ के पोषक है। यही कारण है कि भा.ज.पा. में राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं को भी तरजीह दी जाती है, और उनके विचारों को आम जनता भी महत्व देती है। – पाठकों को याद होगा – सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनाये जाने वाले मामले में इस नेत्री ने भी आमरण अनशन और आत्मदाह की घोषणा की थी। किन्तु पार्टी में वापसी के तुरंत बाद यह ’’गंगा बचाओ’’ की गुहार लगाने सोनिया की कदमपोशी करने पहुँच गई थी। बाबा रामदेव के आन्दोलन को केन्द्र सरकार ने किस तरह कुचला है यह तो सभी जानते हैं – अन्ना हजारे की आवाज को भी किस तरह दबाया जा रहा है यह भी सब देख रहे हैं – ये दोनों ही आंदोलन शुद्ध भारतीय जनहित के लोकतांत्रिक कार्यक्रम हैं।

मुम्बई बम धमाकों के बाद तुरन्त अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी संवेदनात्मक प्रतिक्रिया दिखाई और अभी-अभी मैडम क्लिन्टन आई थी। भारत-पाकिस्तान पर अपने देश की दोगली नीतियों का बखान करके हिन्दुस्तानियों को बेवकूफ बनाना इन्हें खूब आता है। 26/11 का हमला हो या हाल ही के ध्माके – इन पर अमेरिकी टिप्पणियों पर गौर किया जाना जरूरी है – 26/11 के हमले में अमेरिकी नागरिक हेडली ही मुख्य है। वह अमेरिकी सरकार के संरक्षण में आनंदित है। आप भले ही सोचें कि वह वहाँ जेल में है और उस पर मुकदमा चल रहा है।

मैडम हिलेरी क्लिन्टन फरमाती हैं ’’भारत एशिया में लीडर की भूमिका लिभाए’’ – स्पष्ट रूप से अमेरिका का यह चीन को चिढ़ाने का बहाना है। हाल ही में हमारे प्रधानमंत्री चीन की यात्रा पर गये थे। कुछ दिन पहले भाजपा के नेता भी चीन में मेहमानी कर आये हैं। हम भारतीय भले ही इन घटनाओं को नगण्य मानते हों किन्तु ’’अमेरिकी चील’’ (CIA)की नज़र बहुत ऊपर से और बहुत दूर तक देखती है। रही बात भारत द्वारा एशिया के नेतृत्व की तो मैडम को यह आदेशात्मक कथन कहने की जरूरत नहीं है। भारत को बहुत पहले से यह नेतृत्व प्राप्त रहा है जो NATO जैसे मित्र देशों को अखरता रहा है जिनमें मैडम का देश सबसे ऊपर है। ’’गुट निर्पेक्ष’’ देशों का भारत नेहरू जी के जमाने से ही मुखिया रहा है। भरत के दो प्रधानमंत्रियों श्रीमती इंदिरा गांधी और उनके पुत्र प्रधानमंत्री राजीव गांधी की निर्मम हत्याओं के पीछे भी यही कारण रहा है क्योंकि सार्क देशों की समस्याओं के सुलझाने में उनका नेतृत्व अमेरिका को खल रहा था। श्रीमती इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के पीछे CIAका ही हाथ था इस सच्चाई का ब्यौरा भी रूस्तम गलीउल्लिन की उक्त पुस्तक में मौजूद है।

यदि दक्षिण एशिया के देशों को ब्प्। (अमेरिका) से मुक्ति मिल जाये तो ये देश (भारत, पाकिस्तान, बंगला देश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका आदि) अपनी आपसी समस्याऐं बातचीत और सौहार्दपूर्ण व्यवहारों से सुलझा सकते है। इनको विदेशी सहायताओं की कोई आवश्यकता नहीं है। इनकी जनता के पास जल, जंगल और जमीनी सम्पदा इतनी समृद्धशाली है जो कि इनकी डेढ़ अरब आबादी के लिए काफी है। इन सार्क देशों का इतिहास एक हैः – धर्मों और संस्कृतियों मे भी एक अटूट रिश्ता है। इन्हे ’’गोरो’’ की जरूरत कतई नहीं है। ये स्वयं सर्वगुण सम्पन्न सभ्यता की पहचान है।

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