लेखक परिचय

विनोद बंसल

विनोद बंसल

लेखक इंद्रप्रस्‍थ विश्‍व हिंदू परिषद् के प्रांत मीडिया प्रमुख हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन।

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muslmanदिल्ली देश की राजधानी है तथा यहां सभी राज्यों के सभी धर्म, मत, पंथ व संप्रदाय के लोग रहते हैं। भारतीय संविधान के अनुसार यहां सभी को अपने-अपने धार्मिक उत्सवों व त्योहारों को मनाने की स्वतंत्रता है। सभी मत पंथ संप्रदाय के लोग त्योहारों पर न सिर्फ़ अपने घरों व धर्म स्थलों (मंदिर/मस्जिद/गिरिजाघर/गुरुद्वारे) में इन्हें धूम धाम से मनाते हैं बल्कि गलियों, सड़कों व बाजारों से होती हुई शोभायात्राओं का आयोजन भी धूम धाम से होता है। सभी आयोजन आम तौर पर शांति पूर्वक आपसी सौहार्द व सम्पूर्ण समाज की सहभागिता के साथ सम्पन्न होते है। नियमानुसार किसी भी सार्वजनिक आयोजन से पूर्व दिल्ली पुलिस व स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेनी होती है। अनुमति देने से पूर्व दिल्ली पुलिस न सिर्फ़ कार्यक्रम का ब्यौरा आयोजकों से लेकर पूरी छानबीन करती है बल्कि सार्वजनिक कार्यक्रमों या शोभायात्राओं पर पूरी सख्ती के साथ नियंत्रण रखती है। किन्तु, यदि यही आयोजन मुस्लिम समुदाय द्वारा किया जाए तो दिल्ली पुलिस अनुमति की बात तो दूर, साथ रहते हुए भी उपद्रवियों के समक्ष नत-मस्तक व असहाय नज़र आती है। यदि कोई पुलिस अधिकारी गलती से भी इन उपद्रवियों को रोकने का प्रयत्न करता है तो पुलिस मुख्यालय, उप-राज्यपाल कार्यालय व केन्द्रीय गृह मंत्रालय से उसे ऐसा न करने की चेतावनी जारी कर दी जाती है। क्या यही है दिल्ली का ‘सैक्यूलर’ चरित्र।

24 ज़ून 2013 की रात्रि को शब-ए-बरात के मौके पर राजधानी की सड़कों (विशेषकर राजपथ व इण्डिया गेट क्षेत्र) में पांच हजार से ऊपर की संख्या में मुस्लिम युवकों द्वारा रात भर जिस तरह का तांडव मचता रहा, वह दिल्ली पुलिस की असहाय छवि ही उजागर करता है। इन हुडदंगी युवकों ने यातायात से भरी मुख्य सडकों पर खतरनाक करतब दिखाकर न सिर्फ अन्य वाहन चालकों में भय पैदा कर दिया बल्कि लोगों से जमकर अभद्रता भी की। महिलाओं से छेड़छाड़ और गाड़ियों के बोनट पर कूदने की घटनाएं भी हुई। लोग रोते रहे, मारे भय के सड़कों पर ही गाड़ियों में कैद होकर रह गए। इस दौरान उन्हें रोकने में पुलिस न सिर्फ असहाय नजर आई, बल्कि जिन पुलिसकर्मियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, वे उन उपद्रवियों से पिटे भी।

प्रश्न आता है कि क्या दिल्ली पुलिस उपद्रवियों से निपटने या उन्हे काबू करने में असमर्थ है? नहीं। कदापि नहीं। जरा देखिए, इसे लेकर दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने क्या कहा? ‘धार्मिक आयोजनों के दौरान सड़क पर नियमों की धज्जियां उड़ा रहे युवकों को मनमानी करने दो तो सब ठीक, जरा सा रोक दो तो मामला झट से राजनैतिक हो जाता है। हुड़दंगियों का मुस्लिम वर्ग से संबंध होने के कारण कार्रवाई नहीं करने का काफी दबाव रहता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ। पुलिसकर्मी हुड़दंगियों से पिटे भी और बाद में सफाई भी देनी पड़ रही है कि उन्होंने कार्रवाई क्यों की?’ घटना के दौरान शहर की सुरक्षा व्यवस्था में तैनात एक इंस्पेक्टर ने बताया कि अधिकारी उनके हाथ बांध देते हैं। निर्देश दिया जाता कि किसी के साथ जोर-जबरदस्ती नहीं करनी है, माहौल को बिगड़ने नहीं देना है। बिगड़े हालात में उन्हें समझ में नहीं आता कि क्या करें।

हद तो तब हो गई जब पुलिस के एक आला अधिकारी ने कहा कि ‘बटला एनकाउंटर में पुलिस ने जांबाज इंस्पेक्टर (मोहनचंद शर्मा) को खोया, लेकिन अपनी कार्रवाई को जायज ठहराने में पुलिस को विभिन्न आयोगों के समक्ष कई साल तक चक्कर लगाने पड़े। सोमवार रात इंडिया गेट पर हुड़दंग मचा रहे बाइकर्स को रोका तो दिल्ली सरकार, उपराज्यपाल कार्यालय से लेकर गृह मंत्रालय तक पुलिस की शिकायत हो गई।

यह सब तो तब हुआ जब मुस्लिम त्योहारों के दिन गत वर्षों में हुए इस प्रकार के कारनामों को भांपते हुए दिल्ली पुलिस ने मुस्लिम बहुल इलाकों में बैठकें की थीं। मुस्लिम समाज के तथा-कथित बुद्धिजीवियों को बुलाकर समझाया गया था कि युवाओं को जागरूक करें कि सड़कों पर हुड़दंग न मचाएं। कानून व्यवस्था का ध्यान रखें और यातायात नियमों का पालन करें। उर्दू में पर्चे छपवाकर लोगों से अपील भी की गई। लेकिन पुलिस विभाग की सारी कोशिशें धरी-की-धरी रह गई।

यह कोई पहला मौका नहीं था जब दिल्ली की सडकों पर खौफ या आतंक का उत्सव मनाया गया हो। पिछले पांच वर्षों के मुस्लिम त्योहारों की खबरों का आंकलन करने से पता चलता है कि चाहे ईद हो या मुहर्रम, शब-ए-बारात हो या कोई अन्य आयोजन, दिल्ली की भोली भाली जनता को तो इसका खामियाजा भुगतना ही पडता है। इतना ही नहीं नांगलोई में उपद्रव हो या पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार के पास उत्तर प्रदेश से सटे खोडा में दंगा, सभी में चन्द दंगाईयों के समक्ष दिल्ली पुलिस असहाय नजर आई। बटला हाउस की आतंकवादी मुठभेड हो या जाकिर नगर में गए दिल्ली पुलिस के अपराध शाखा के जांबाजों की घेर कर पिटाई, ओखला के थाना अध्यक्ष यादव पर जानलेवा हमला हो या जामामस्जिद के गेस्ट हाउस में मिला आतंकी गिरोह का जखीरा, हमेशा ही सरकार ने पुलिस के जाबांज सिपाही व अधिकारियों को ही कटघरे में खडा किया। जबकि बाबा रामदेव के रामलीला मैदान में सोए हजारों देश प्रेमियों को दबाने तथा हिन्दू आयोजनों को रोकने या उन पर अंकुश लगाने में यह सदा उद्यत रही है। पिछले दो वर्षों से दिल्ली में राम लीलाओं तथा दुर्गा पूजा के आयोजकों को कानून व व्यवस्था का हवाला देकर जिस प्रकार से पुलिस प्रताड़ना का शिकार होना पडता है वह किसी से छुपा नहीं है किन्तु फ़िर भी हिन्दू समाज सदा शान्तिपूर्वक कानून का पालन कर पुलिस का सहयोग करता ही नजर आता है।

यक्ष प्रश्न यह है कि क्या त्योहार खुशी व भाई-चारा बढाने के लिए होते हैं या कानून की धज्जियां उडा कर दिल्ली की शान्ति भंग करने के लिए? दूसरा प्रश्न यह भी उठता है कि जब दिल्ली की जांबाज पुलिस के नाम मात्र से बड़े से बड़े आतंकी या देश के दुश्मन भी थर-थर कांपते हैं तो आखिर ये मुट्ठीभर लोग कैसे दिल्ली पुलिस की गिरफ़्त से बाहर हो जाते हैं? और पुलिस मूक दर्शक बन मार खाती रहती है। देश की राजधानी के लोगों का सुख-चैन आखिर कौन छीन रहा है? कौन है जो पुलिस के जवानों के मनोबल को गिरा रहा है? यदि ऐसा ही रहा तो आखिर क्यों पुलिसकर्मी अपना जीवन और नौकरी दोंनों दाव पर लगाकर आपकी रक्षा करेंगे। उत्तर आता है सरकार की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति और वोट बैंक के प्रति राजनेताओं का लालच ही इस गंभीर समस्या की जननी है। क्या यही है दिल्ली व केन्द्र सरकार का असली ‘सैक्यूलर’ चरित्र कि हिन्दुओं को दबाओ और मुस्लिमों को बढाओ? किन्तु क्या दिल्ली की राष्ट्र भक्त व निरपराध जनता इसी प्रकार अपने ऊपर हो रहे निरंतर प्रहारों से तडपती रहेगी और ये राजनेता सत्ता पर चौकड़ी जमाए बैठे रहेंगे?

 

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