लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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AO-Naxalite-Vinod-Chaube_20090712_050516आजादी के 63वें वर्षगांठ के अब महज चंद दिन शेष रह गये हैं। हर साल की तरह इस बार भी धुमधाम से यह पर्व मनाया जायेगा, मनाया जाना भी चाहिए। लेकिन अफसोस, छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में पुलिस का नेतृत्व करने, सलामी लेने और देने विनोद चौबे समेत 29 पुलिसजन उपलब्ध नहीं रहेंगे। सलामत रहे यह आजादी इसीलिए इन प्रात: स्मरणीय जांबाजों ने अपनी जान कुर्बान कर शहादत की गौरवमयी परम्परा को आगे बढ़ाया है। गर्व तो अवश्य है कि इन सपूतों ने गोली पीठ पर नहीं सीने और सिर पर खाई है। गीता का संदर्भ लें तो ”एक बार इस राह पे मरना सौ जनमों के समान है।” इन सभी महानायकों ने तो अपनी शहादत देकर अपने सीने पर गोली खाकर छत्तीसगढ़जनों के सीने को चौड़ा किया है।

सलामत रहे यह आजादी इसलिए पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे ने अपनी जान कुर्बान कर शहादत की गौरवमयी परम्परा को आगे बढ़ाया है। गर्व तो अवश्य है कि इन सपूतों ने गोली पीठ पर नहीं सीने और सिर पर खाई है। गीता का संदर्भ लें तो ”एक बार इस राह पे मरना सौ जनमों के समान है।” इन सभी महानायकों ने तो अपनी शहादत देकर अपने सीने पर गोली खाकर छत्तीसगढ़जनों के सीने को चौड़ा किया है। लेकिन यह घटना प्रदेश के लिए एक चुनौती है। इस शहादत ने हमें यह सबक, यह प्रेरणा और यह चुनौती प्रदान किया है कि हम सभी मिलकर नक्सली कोढ़ से अपनी धरती को आजाद कराने के इस यज्ञ में अपनी आहुति दें।

लेकिन यह घटना प्रदेश के लिए एक चुनौती है। इस शहादत ने हमें यह सबक, यह प्रेरणा और यह चुनौती प्रदान किया है कि हम सभी मिलकर नक्सली कोढ़ से अपनी धरती को आजाद कराने के इस यज्ञ में अपनी आहुति दें। यह स्थापित तथ्य है कि नक्सली समस्या केवल राज्य विशेष की समस्या नहीं है। यह तो किसी भी तरह के बाहरी आतंकवाद से ज्यादा लोकतंत्र के लिए खतरा बनकर सामने आया है। मदनवाड़ा से लेकर देश की संसद तक इन नक्सलियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। दुर्भाग्यवश एक दुर्दांत माओवादी कामेश्वर बैठा तो इस बार चुनाव जीतकर लोकसभा में जा बैठा। अत: अब यह समय है कि बिना देर किये आतंक से इस युद्ध में सभी राजनीतिक दल एवं केंद्र समेत सभी प्रभावित सरकारें बिना किसी भेदभाव के कंधे से कंधा मिलाकर इस कैंसर से लड़ने जी जान से जुट जाएं।

अभी राज्यसभा में गृहमंत्री की यह स्वीकारोक्ति कि केंद्र ने इस समस्या को कम करके आंका, निश्चय ही इस भरोसे को जन्म देती है कि अब शायद केंद्र सरकार भी नक्सल समस्या को ‘ज्यादा’ करके आंकना शुरू कर देगी। साथ ही भाजपा के इस आरोप की पुष्टि भी होती है कि अभी तक कांग्रेस इस मामले पर गंभीर नहीं थी। न केवल अगंभीर बल्कि कांग्रेस इसे भी अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर ही ‘डील’ कर रही थी। पश्चिम बंगाल का लालगढ़ तो इसका नवीनतम उदाहरण है कि अगर वामपंथियों का समर्थन नहीं हो और केंद्र इच्छाशक्ति दिखाये तो बिना किसी यादे खून-खराबे के भी कि, देश के चप्पे-चप्पे को इन निशाचरों से मुक्त करवाया जा सकता है। अभी तक बुध्दिजीवियों द्वारा यह कहा जा रहा था कि, जैसे-जैसे विकास की रोशनी सुदूर क्षेत्रों तक पहुँचती जायेगी। नक्सल समस्या का समाधान होता जायेगा। लेकिन हुआ उसके विपरीत। विकास मतलब सड़क बिजली पूल-पुलिया, बुनियादी ढांचे का निर्माण। यानि विकास मतलब ठेकेदारी और ठेकेदारी मतलब फायदे का सौदा और व्यापारियों द्वारा अपने फायदे के लिए ‘लेवी’ के रूप में भारी भरकम रकम देकर नक्सलियों के लिए प्राण-वायु उपलब्ध करवाना, उन्हें मजबूत करना। अभी मुख्यमंत्री ने भी एक साक्षात्कार में माना है कि इस तरह के वसूली का नक्सलियों का 300 करोड़ का सालाना कारोबार है। एक अलग आकलन के अनुसार यह नक्सल व्यवसाय पूरे 1500 करोड़ का है। ऐसे में केन्द्रीय गृह मंत्री का एक और महत्वपूर्ण बयान भरोसा पैदा करने वाला और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है कि विकास से ‘नक्सल समस्या’ का समाधान नहीं होगा बल्कि ‘नक्सल समस्या’ की समाप्ति के बाद ही विकास संभव हो पायेगा।

जहाँ तक छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों की बात है तो यह कहा जा सकता है कि माओवादियों के यहां फलने-फूलने के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कारण रहे हैं। एकीकृत मध्यप्रदेश की सरकारों द्वारा अंचल की उपेक्षा, व्यापारियों द्वारा शोषण, रोजगार के अवसरों की समाप्ति, अधिकारियों का भ्रष्टाचार आदि ऐसे विषय रहे हैं जिनके कारण इन्हें पनपने का अवसर मिला, लेकिन अब क्या और कैसे हुआ उसके बारे में सोचने का समय नहीं है। कुछ दिनों के लिए विकास के इन कथित आयामों को रोकना भी पड़े तो कोई बात नहीं। लालगढ़ ने यह आत्मविश्वास आम नागरिकों में अवश्य पैदा किया है कि लोकतंत्र से बड़ी इनकी ताकत नहीं है।

नक्सलियों की गोली का जवाब उससे दस गुनी ताकत से देकर उसके समूल विनाश हेतु प्रयास करके ही समस्या से पार पाया जा सकता है। लिट्टे की समाप्ति का नवीनतम् उदाहरण भी हमारे सामने है। उससे भी प्रेरणा लेकर अब बिना किसी बहानेबाजी के चौतरफा कार्रवाई करने का समय है। हर व्यक्ति, समाज एवं सरकार के हर अनुषंग द्वारा अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करके ही इससे पार पाया जा सकता है। यानी राजनीतिक दल लोकतंत्र के द्वारा, पत्रकार अपनी खबरों, बुद्धिजीवी अपने विवेक से, साहित्यकार अपने साहित्य, कवि अपनी कविता और पुलिस अपनी गोली से चौतरफा प्रयास कर समस्या का समाधान निकाले। अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के साथ घालमेल किया जाना भी विसंगति को बढ़ाएगा ही।

श्री चिदंबरम् का साफगोई से दिया उपरोक्त दोनों बयान यदि वास्तव में राजनीति की भेंट नहीं चढे, और वास्तव में केंन्द्र और सभी राय अपने-अपने तमाम राजनीतिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर कारवाई करे तो इस विभीषिका से पार पाना असंभव नहीं। हां इस तमाम प्रक्रिया में ‘सलवा जुड़ूम’ जैसे आंदोलनों का ढंडा पड़ जाना भी कचोटता है। एक खबर के अनुसार नक्सलियों के सर्वोच्च कमिटी ने अपने एक गुप्त प्रस्ताव के जरिये न केवल ‘सलवा जुड़ूम’ समाप्त हो जाने की घोषणा की है बल्कि उसको समाप्त करने में लगे अपने प्रयासों को एक ”मॉडल” कहा है। एक ऐसा मॉडल जिसे आगे भी प्रयोग किया जाएगा। सीधी सी बात है कि यदि वो सफल हुए हों तो वह मॉडल है कुछ पथभ्रष्ट पत्रकारों, कथित मानवाधिकारियों , गैर सरकारी संस्थाओं और कुछ कुबुध्दजीवियों के द्वारा चौतरफा चलाये गये अभियानों,दुष्प्रचारों के द्वारा ही। सही अर्थों में नक्सलियों के खिलाफ चौतरफा कारवाई करते समय हमें उनके इस ”मॉडल” के भी सफाये हेतु समानांतर काम करना होगा।

बहरहाल, यह तय है कि लोकतंत्र को सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आये इन माओवादी के खात्मे तक सही अर्थों में आजादी का जश्न अधूरा है। वर्तमान की यह समस्या हमारी आजादी के लिए एक चुनौती ही है। क्या हम इस चुनौती से पार पाने के लिए बलिदान देने का ”बीड़ा” उठाने तत्पर हैं?

-जयराम दास

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