लेखक परिचय

रमेश पांडेय

रमेश पांडेय

रमेश पाण्डेय, जन्म स्थान ग्राम खाखापुर, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश। पत्रकारिता और स्वतंत्र लेखन में शौक। सामयिक समस्याओं और विषमताओं पर लेख का माध्यम ही समाजसेवा को मूल माध्यम है।

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-रमेश पाण्डेय- india
आज भारत रो रहा है। इस देश पर हुकूमत करने का सपना पाले लोगों में से कोई भी भारत को विश्व गुरू बनाने की बात नहीं कर रहा है। कोई कांग्रेस मुक्त भारत की बात कर रहा है तो कोई मोदी मुक्त भारत बनाने के नाम पर वोट मांग रहा है। अरे भारतवासियों उस दिन को याद करो, जब दुनिया में हम चीख-चीख कर कहा करते थे, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, आपस में हैं भाई-भाई। वह नारा कहां गया। 16वीं लोकसभा के चुनाव में कोई देश में मुसलमान के नाम पर वोट मांग रहा है तो कोई हिन्दू के नाम पर वोट मांग रहा है। कितना दुखद है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत बेटियों की अस्मत बचाने में, पर्यटकों की इज्जत बचाने में, देश को भ्रष्टाचार से बचाने में नाकाम रहा है और इस देश को दुनिया में अपमान सहन करना पड़ा। आज भी देश में किसान रो रहा है। शिक्षित नौजवार रोजगार पाने के लिए दर-दर की ठोकर खा रहा है। महिलाए देह व्यापार करने के लिए मजबूर हो रही हैं। आदिवासी इलाकों में उनके जीवन के साथ क्रूर मजाक किया जा रहा है। वोट की खातिर दंगे कराए जा रहे हैं। इसके उलट देश में पूंजीपतियों ने भारतीय संस्कृति को अपनी मुट्ठी में ले लिया है। जिस देश में लोग पैदल चलकर वोट मांगा करते थे, आज वहां हैलीकॉप्टर से प्रचार करने का ग्लैमर दिखाया जा रहा है। वोट को शराब और नोटों से खरीदा जा रहा है। लोगों को लालच दी जा रही है। हैरत है कि किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में (जो अब तक आ चुके हैं) भारत को विश्व गुरू का दर्जा दिलाने के दिशा में काम करने की बात नहीं की गयी है। किसी ने बेराजगार युवकों के हाथ में रोजगार उपलब्ध कराने की बात नहीं की है। किसी ने कृषि को रोजगार का दर्जा दिलाए जाने की बात नहीं की है। किसी ने राईट-टू रोजगार की बात नहीं की है। महिलाओं पर चारों ओर हो रही हिंसा की घटनाओं पर रोक कैसे लगे, इसकी बात नहीं की है। बिगड़ते ग्रामीण परिवेश, नष्ट होते कुटीर उद्योग, धूमिल होती सांस्कृतिक विरासत को बचाने की बात किसी ने नहीं की है। सबसे दुखद तो यह रहा कि धर्म की ध्वजा को ऊंचा करने की बजाय एक धर्म गुरू ने तो बाकायदा एक पार्टी के लिए वोट देने का फतवा जारी कर दिया। उन्होंने ऐसा करके देश को साम्प्रदायिक विभाजन के कगार पर खड़ा कर दिया है। गांव में जहां लोग एक दूसरे परिवार को अपना भाई मानने की संस्कृति का पालन कर रहे हैं, वहीं देश के नेता उनके बीच विभाजन की रेखा खड़ा कर रहे हैं। हद है अगर सोच यही रही तो हमारा देश कहां जाएगा। देश के मतदाताओं को इस बात पर बहस करनी होगी और खूब सोच समझकर निर्णय लेना होगा। अगर निर्णय की इस घड़ी में चूक हो गयी तो पांच साल के लिए फिर पछतावा करना होगा।

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3 Comments on "कौन करेगा विश्व गुरू भारत की बात"

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इंसान
Guest
इस सुंदर लेख का शीर्षक “ओ सिरजनहार, कौन उबारेगा भारत को इस दल दल से आज?” होना चाहिए क्योंकि तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को बार बार सत्ता में बिठा भारतीय जनता अपनी विस्मृति का अद्भुत प्रमाण देती आ रही है| भारत के कभी विश्व-गुरु होने का उसे आभास तक नहीं है| विश्व-गुरु शब्द केवल कवि की कल्पना बन कवि की कविता में सीमित है और फ़िल्मी गीतों में मदोन्मत्त अधिकांश भारतीय हिंदी कविता को पढते ही नहीं हैं| मैं चाहूँगा कि किंकर्तव्यविमूढ़ भारतीयों में चेतना पैदा करने हेतु रमेश पाण्डेय जी द्वारा लिखे इस लेख की… Read more »
Himwant
Guest

वैश्विक साम्राज्य के शक्ति सम्पन्न राष्ट्र भारत के आम चुनाव में आवश्यकता से अधिक रूचि ले रहे है. उन्हें लगता है की मोदी इस देश के प्रधानमंत्री बन गए तो वह उनकी भैसं खोल कर ले जाएगे. हमारी भैस अमेरिका के पास गिरवी रखने को तैयार पार्टियों और मोदी के बीच चुनावी संघर्ष है.

रमेश पांडेय
Guest

श्री हिमवंत जी, आपने बिलकुल सही कहा। लेख पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद

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