लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

एक बार फिर जनमत संग्रह कठघरे में हैं। इस बार जनमत संग्रह की संभावित धांधली को स्टिंग आरेशन के मार्फत कैमरे में कैद किया गया है। लिहाजा इस तथ्य को नहीं झुठलाया जा सकता कि इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है ? इस हेराफेरी को लेकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग को शिकायत भी कर दी है। आयोग ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार को कानूनी दखल के लिए कहा है। चूंकि यह मामला नाजायज तौर से भुगतान के बदले सर्वेक्षण के प्रसारण व प्रकाशन से जुड़ा है,इसलिए अपराध के दायरे में आता है। क्योंकि अप्रत्यक्ष तौर से यह कदाचरण मतदताओं को गुमराह करने की दृष्टि से किया गया है। इसलिए कांग्रेस पार्टी का कहना है कि मामले में एफआर्इआर दर्ज कर हेराफेरी में शामिल मीडिया संस्थानों पर अंकुश लगाया जाए। इसी क्रम में कांगेस की मांग है कि आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपनी शकितयों का उपयोग करते हुए लोक सभा चुनावों से 48 घंटे पहले तक चुनाव सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध लगाकर स्वतंत्र व निष्पक्ष मतदान का रास्ता साफ कर सकती है ?

हालांकि इसके पहले भी इस आनलाइन गोरखधंधे का खुलासा खोजी पोर्टल कोबरापोस्ट  ‘आपरेशन ब्लू वायरस के नाम से कर चुकी है। इसके जरिए सोशल साइडस पर राजनेताओं की छवि चमकाने व बिगाड़ने के काले सच का पर्दाफाश हुआ था। धन लेकर मनमाफिक आंकड़े पेश करने का सिटंग होने के बाद यह साफ हो गया है कि रायशुमारी के बहाने चलने वाले इस धंंधे की हकीकत क्या है ? स्टिंग में जनमत सर्वेक्षण से जुड़ी प्रसिद्ध कंपनी ‘सी-वोटर की वरिश्ठ अधिकारी की यह लालसा प्रगट हुर्इ है कि मुंह मांगे दाम मिलें तो उनकी एजेंसी मांग के मुताबिक आंकड़ों में हेराफेरी करके चुनावी सर्वे पेश कर देगी। जाहिर है, ओपीनियन पोल जनमत को गुमराह करने और धन देने वाले राजनैतिक दल व उसके नायक के पक्ष में वातावरण निर्माण करने के माध्यम बन गए हैं। इसीलिए इन सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठती रही हैं, किंतु कानूनी पेचदगियों और अभिव्यकित की स्वतंत्रता के बहाने इन्हें जीवनदान मिलता रहा है। निर्वाचन आयोग भी पाबंदी के पक्ष में है। अब कांग्रेस को भी स्टिंग के जरीए गड़बड़ी का ठोस सबूत मिल गया है। तय है, कंपनियों को जवाबदेही के दायरे में लाना जरुरी है।

हरेक चुनाव के पहले कंपनियों के जनमत संग्रह समाचार माध्यमों पर बरसाती मेंढक की तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब हो रहे हैं। लेकिन इनका वास्तविक आधार क्या है, लिए नमूने का क्षेत्र कौनसा है, मंशा जताने वाले मतदाता कौन हैं, किसी भी सर्वे में इसका खुलासा नहीं किया जाता ? इसीलिए ये अपारदर्शी बने रहते हैं। यही अपारदर्षिता इनकी संदिग्धता की पृष्ठभूमि रचने का काम करती है। अब तो सी-वोटर की अधिकारी से गोपनीय कैमरे पर जब पूछा गया कि ‘अगर सर्वेक्षण में किसी दल को 10 सीटें मिल रही हैं तो उनकी संख्या कैसे बढ़ार्इ जा सकती है ? जवाब था, ‘यह मान कर चला जाता है कि तीन से पांच प्रतिशत अनुमान इधर-उधर हो सकते हैं, लिहाजा ज्यादा सीटें बतानी हैं तो इस अंतर को जोड़ दिया जाता है। स्टिंग में अधिकारी ने धन के भुगतान की बड़ी राशि नकदी के रुप में लेने की बात कही। इससे यह अंदाजा लगाना सहज है कि रायशुमारी के इस कारोबार में राजनैतिक दल कालाधन खपा रहे हैं ?

दल विशेष के पक्ष में हवा बनाने का यही तरीका ‘पेडन्यूज में अपनाया जाता है। इसीलिए केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पेडन्यूज को लेकर चिंतित हैं। पिछले साल पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में आयोग ने पेडन्यूज पर नकेल कसने का काम किया था, जिसके परिणाम भी सार्थक रहे थे। अब यदि पेडन्यूज अपराध है तो धन लेकर चुनावी सर्वेक्षणों के जरिए दल या व्यकित विशेष को महिमामंडित करना, क्या अपराध के दायरे में नहीं आता ? यदि इन सर्वेक्षणों पर कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाता तो मतदाता के गुमराह होने का सिलसिला जारी रहेगा और निर्वाचन प्रणाली भी दूषित बनी रहेगी। पेड न्यूज में एक हद तक सफलता हासिल करने के बाद आयोग यह नहीं कह सकता कि वह अपने स्तर पर कार्इ ठोस कदम अवैध चुनाव सर्वेक्षणों के विरूद्ध उठाने की स्थिति में नहीं है?

दरअसल, एक चरणबद्ध, सुस्पश्ट और पारदर्शी जनमत संग्रह मतदाताओं का रुझान जानने का एक संभावित उपाय हो सकता है। इसीलिए जनमत संग्रह की इस नर्इ विधा को खारिज नहीं किया जा सकता है। ज्यादातर विकसित व लोकतांत्रिक देषों में जनमत का रुझान जानने के लिए कंपनियां सर्वेक्षण करती भी हैं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि सर्वेक्षण व्यर्थ हैं। इनका कोर्इ धरातल ही नहीं है ? ये पूरी तरह अवैज्ञानिक हैं ? अलबत्ता हमारे यहां जनमत संग्रह नैतिक मापदंडों पर इसलिए खरे नहीं उतर रहे हैं, क्योंकि उनका क्रय-विक्रय होने लगा है। इस पेषे में कुछ बेर्इमानों ने दखल देकर इसके भरोसे को तोड़ने का काम किया है। जिस तरह से देश की प्राकृतिक संपदा को हड़पने के लिए नेता, नौकरशाह और ठेकेदारों का गठबंधन वजूद में आ गया है, कमोबेश उसी नक्शेकदम पर सर्वे एजेंसियां, मीडिया घराने और राजनीतिक दल चल पड़े हैं, जो विश्वसनीय जनमत संग्रह और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए ‘कलंक साबित हो रहे हैं।

ये सर्वे कितने मनमाने हैं, इसका ताजा उदाहरण दिल्ली के विधानसभा चुनाव हैं। एक जनमत संग्रह को छोड़ बाकी सभी ने कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला जताते हुए दिल्ली में भाजपा को बहुमत मिलने के अनुमान लगाए थे। आम आदमी पार्टी को छह से दस सीटें मिलने की उम्मीद जतार्इ थी। लेकिन परिणाम अनुमानों के विपरीत निकले। आप ने 28 सीटें जीतकर त्रिषंकु विधानसभा के हालात निर्मित कर दिए, जिसकी भविष्यवाणी किसी भी सर्वे में नहीं की गर्इ थी ? नतीजों के बाद कंपनियों के प्रवक्ता और चुनाव विष्लेशक आंखे चुराते तो देखने में आए, लेकिन जवाबदेही के कठघरे में किसी को खड़ा नहीं किया गया ? इन नतीजों से यह भी साफ हुआ है कि देश का आम मतदाता परिपक्व है और वह पूरी तरह जनमत संग्रहों के बहकावे में नहीं आता है। राजनीतिक दल यदि धन चुकाकर जनमत संग्रह कराने से दूरी बनाले तो यह फर्जीवाड़ा आप से आप समाप्त हो जाएगा।

जनमत संग्रह ‘सेफोलाजी ;चुनाव विष्लेशण विषय का हिस्सा हैं। यह गणित का विषय नहीं है, इसलिए इस विज्ञान से आंकड़ों का सटीक अनुमान लगाना मुमकिन नहीं है। यह भारत जैसे सांस्कृतिक, जातीय और संप्रदाय बहुलता वाले देश में इसलिए भी मुश्किल काम है, क्योंकि उपरोक्त समुदायों के जन्मजात संस्कार मतदाता को पूरी तरह पूर्वग्रही मानसिकता से मुक्त नहीं होने देते। सब जानते हैं कि बहुजन समाज पार्टी एक जाति विशेष आधारित दल है। इस दल से जुड़ा मतदाता कमोबेश मौन रहता है, लेकिन बसपा के चुनाव चिन्ह ‘हाथी से विमुख नहीं होता। यही वजह है कि जनमत सर्वेक्षणों में पर्याप्त स्थान नहीं मिलने के बावजूद मायावती का ‘वोट-बैंक अपनी जगह कायम है। ऐसे परिणाममूलक व स्थिर वोट बैंक भी अनुमानों को गलत साबित करने का काम करते हैं।

र्इमानदारी से भारत में जनमत संग्रह करना इसलिए भी मुश्किल है, क्योंकि यदि इसके नमूने का आकार बड़ा रखा जाता है तो उसका खर्च बहुत बैठता है, जिसे कंपनियां अपने स्तर पर वहन नहीं कर सकती हैं ? एक अनुमान के मुताबिक एक विधानसभा में सर्वे का खर्च लगभग डेढ़ से दो लाख और लोकसभा में आठ से दस लाख रूपए आता है। गोया नमूने के आकार का प्रतिषत यदि दस भी रखा जाता है तो देश में 54 लोकसभा सीटों पर सर्वे कराना होगा, जिसका अनुमानित खर्च 55 करोड रूपए़ के करीब बैठेगा ? इतनी बड़ी धन राशि खर्च करने की औकात न तो किसी जनमत संग्रह कराने वाली कंपनी में है और न ही इतनी राशि का भुगतान करके कोर्इ टीवी समाचार चैनल सर्वे के प्रसारण का दम भर सकता है ? तय है,राजनीतिक दल बेनामी चंदा इन सर्वेक्षणों में खपाते है।  मतदान पूर्व जो जनमत संग्रह पेश किए जाते हैं, उनके वैज्ञानिक व विधि-सम्मत होने की संभावना कम से कम होती है ? इसलिए इन पर सरकारी नियंत्रण हो या ये स्वनियमन की नैतिकता के दायरे में आएं, गोया आदर्ष आचार संहिता की रेखा तो तय होनी ही चाहिए ? अभिव्यकित की स्वतंत्रता के बहाने जनमत संग्रह खरीद-फरोख्त का आधार आखिर कब तक बने रहकर मतदाताओं को गुमराह करते रहेंगे ?

 

 

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1 Comment on "कठघरे में जनमत संग्रह"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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2004 में भाजपा इंडिया शाइनिंग का नारा देकर मीडिया और चुनावी सर्वे में खुद को जीता मानकर पहले ही धोखा खा चुकी है लेकिन एक बार वेह फिर इस खुशफ़हमी में है क वो सरकार बनाने जा रही है जबकि सत्ता तीसरे मोर्चे की तय लग रही है क्योंकि कांग्रेस ऐसा हर कीमत पर करेगी।

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