लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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-प्रवीण दुबे-
Modi's rally in Faizabad

नरेन्द्र मोदी के चुनावी मंच पर भगवान श्रीराम की तस्वीर व प्रस्तावित राम मंदिर का चित्र देखकर इस देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी लोगों के पेट में मरोड़ उठना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं कही जा सकती। जो लोग इस पर विधवा विलाप कर रहे हैं, यह उसी मानसिकता के लोग हैं जिन्होंने रामसेतु को विध्वंस करने की योजना बनाई थी और इस मामले पर सुनवाई के दौरान देश की सर्वोच्च अदालत में जो हलफनामा प्रस्तुत किया था उसमें भगवान राम के अस्तित्व को ही मानने से इन्कार कर दिया था। यह वही लोग हैं जो पतित पावन सरयू और भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या की पौराणिक ऐतिहासिकता को नकारते रहे हैं। यह वही लोग हैं जिन्होंने अयोध्या के निहत्थे रामभक्तों पर गोलियां बरसवाई थीं और उनकी लाशों को सरयू में बहा दिया था। यह वही लोग हैं जो चुनावी मंचों पर जालीदार टोपी पहने एक धर्म विशेष के धर्मगुरुओं से अपने पक्ष में मतदान कराने की धार्मिक अपीलें जारी करवाते हैं।

यह वही लोग हैं जो हिन्दुओं की सबसे पवित्र नगरी काशी में अपने चुनावी मंचों पर भगवान विश्वनाथ का चित्र लगाकर स्वयं के स्थानीय होने का ढिंढोरा सिर्फ इस कारण पीटते हैं क्योंकि काशी के हिन्दुओं का वोट मिल सके, यह वही लोग हैं जो कश्मीर से मार-मार कर भगाए गए लाखों कश्मीरी पंडितों की पीड़ा को नजर अंदाज करते हैं और बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकाले जाने की बात पर सीधे-सीधे चेतावनी देते हैं कि नरेन्द्र मोदी बांग्लादेशी घुसपैठियों को छू भी नहीं सकते, यह वही लोग हैं जो गुजरात दंगों पर आए दिन मगरमच्छी आंसू बहाते दिखाई देते हैं लेकिन गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में जिंदा जलाकर मार डाले गए रामभक्तों की हत्या इन्हें दिखाई नहीं देती, यह वही लोग हैं जिन्हें वंदेमातरम् से परहेज है और इस देश की सांस्कृतिक परम्परा का प्रतीक माने जाने वाले योग, गौवंश और गीता को यह स्वीकार करने को तैयार नहीं।

ऐसे विधर्मियों और हिन्दू विरोधी मानसिकता वाले लोग यदि भगवान राम के चित्र पर हायतौबा मचा रहे हैं तो इससे न तो विचलित होने की जरूरत है और न इस पर सफाई देने की। हां इतना जरूर है कि जिनके ऊपर चुनाव शान्तिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने की जिम्मेदारी है वह ऐसा न करके दबाव में काम कर रहे हैं यह बेहद चिंता का विषय है और इसके खिलाफ आवाज अवश्य उठाए जाने की जरुरत है। हमारा इशारा चुनाव आयोग की तरफ है। चुनाव आयोग ने पहली गलती तो उस समय की जब उसने एक माह से भी लंबी चुनाव प्रक्रिया की घोषणा की। 1951 के बाद से शायद ऐसा पहली बार देखने को मिला है जब देश को इतनी लंबी चुनाव प्रक्रिया में झोंक दिया गया। यह चुनाव ज्यादा से ज्यादा चार चरणों में पूरे करा लिए जाते तो आज देश में जो वातावरण निर्मित हो गया है उसे टाला जा सकता था।

यह सही है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और जहां की दुरुह भौगोलिक स्थितियां तथा तमाम सुरक्षा कारणों के चलते शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव पूर्ण कराना बेहद कठिन काम है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भारत में चुनाव आयोग को तमाम अभूतपूर्व संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, चुनाव के लिए पर्याप्त सुरक्षा बल है, सरकारी तंत्र है बावजूद इसके एक माह से भी अधिक का समय चुनाव के लिए खर्च करना आश्चर्यजनक है। इससे भी आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इस विषय पर हमारे बौद्धिक वर्ग के बीच कोई सार्थक बहस होते दिखाई नहीं दे रही। बात यहीं समाप्त नहीं होती इस लंबी चुनाव प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग का जो कार्य व्यवहार रहा है उस पर भी अंगुली उठने लगी है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार स्वयं नरेन्द्र मोदी ने भी चुनाव आयोग पर दबाव में काम करने की बात कही है।

अब फैजाबाद में मोदी के मंच पर श्रीराम की तस्वीर व प्रस्तावित राम मंदिर के चित्र पर चुनाव आयोग ने जो कुछ किया है वह भी उसके दोहरे चरित्र को ही उजागर करता है। केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर चुनाव आयोग द्वारा मामले को संज्ञान में लेना और फैजाबाद के जिला प्रशासक को इस बारे में रिपोर्ट देने को कहना तथा कार्रवाई की बात करना चुनाव आयोग की कारगुजारियों को सही नहीं ठहराता। चुनाव आयोग को मोदी के मंच पर भगवान राम का चित्र तो दिखाई दे गया लेकिन उसे वाराणसी में कांग्रेस प्रत्याशी द्वारा अपने मंचों पर लगाए जा रहे काशी विश्वनाथ व गंगाघाट आदि के चित्र नहीं दिखाई देते। इसी प्रकार तमाम मुस्लिम धर्म गुरुओं द्वारा कांग्रेस, सपा, बसपा सहित अन्य कई कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए किए जा रहे चुनाव प्रचार पर भी कोई ऐतराज नहीं है आखिर क्यों?

इस चुनाव में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा जब चुनाव आयोग पर अंगुली उठी है। इससे पहले मोदी द्वारा एक सभा में कमल निशान दिखाए जाने को लेकर भी चुनाव आयोग ने मोदी पर चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप जड़ा था। जबकि कई कांग्रेस नेता खुलेआम हाथ का पंजा और कांग्रेस के झंडे वाले रंगों की तिरंगा दुपट्टा डाले वोट डालते देखे गए परन्तु इस पर चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की आखिर क्यों?

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