लेखक परिचय

अखिलेश आर्येन्दु

अखिलेश आर्येन्दु

वरिष्‍ठ पत्रकार, टिप्पणीकार, समाजकर्मी, धर्माचार्य, अनुसंधानक। 11 सौ रचनाएं 200 पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। 25 वर्षों से साहित्य की विविध विधाओं में लेखन, अद्यनत-प्रवक्ता-हिंदी।

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अखिलेश आर्येन्दु

बिजली संकट की समस्या उत्तर प्रदेश सहित कर्इ राज्यों में परेशानी का सबब बना हुआ है। वैसे तो बिजली का समस्या कोर्इ नर्इ नहीं है लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए राज्य सरकारें कभी भी ठोस कदम नहीं उठातीं कि हमेशा के लिए इससे निजात पाया जा सके। गौरतलब है कर्इ राज्यों ने इस समस्या से पार पाने के लिए बिजली विभाग को प्राइवेट कम्पनियों के हवाले कर दिया लेकिन इससे भी इस संकट का कोर्इ इलाज नहीं ढूढा जा सका। महाराष्ट्र, दिल्ली इसके उदाहरण हैं। उत्तर प्रदेश में भी बिजली को प्राइवेट करने की कोशिश की गर्इ लेकिन जनता के विरोध के चलते इसे टाल दिया गया। राजधानी दिल्ली में बारहों महीने बिजली की किल्लत बनी रहती है। यह तब है जब राज्य सरकार बिजली दूसरे प्रदेशो से खरीदती है।

दरअसल आजादी के बाद से बिजली संकट को हल करने के लिए कोर्इ राश्ट्रीय स्तर पर ऐसी पहल नहीं की गर्इ किइस समस्या से निजात पाया जा सकता। देश की आबादी और उधोगों के बढ़ने के साथ इस जिस तरह से इसकी खपत बढ़ी उस रेसियो में बिजली का उत्पादन नहीं बढ़ाया गया। षहरों और कस्बों में ही नहीं गांवों में बिजली की खपत बहुत तेजी के साथ बढ़ी। कर्इ तरह के नए बिजली के उपकरण बाजारों में आ गए जो आज आम आदमी के जिंदगी के हिस्से हैं। इसे देखते हुए बिजली की नीति केंद्र और राज्य सरकारों को बनाने चाहिए थे लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जिसका नतीजा यह हो रहा है कि आज देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश सहित कर्इ राज्य बिजली संकट को लेकर परेशान है। उत्तर प्रदेश में 9,000 मेगावाट बिजली इस्तेमाल के लिए उपलब्ध रहती है। लेकिन यह मांग के बहुत कम है। साल के बारह महीने बिजली की किल्लत बनी ही रहती है। गांवों में तो कर्इ दिनों तक बिजली आती ही नहीं और यदि आती भी है तो इतनी कम कि वह न आने के बराबर है। चिंता और विचार करने की बात यह है कि मायावती सरकार इस संकट को लेकर हमेशा से लापरवाह रही है। बिजली संकट से महज गांव की जनता ही परेशान नहीं है बलिक षहरों और कस्बों की हालात भी कमोवेष यही है । कभी कोयले कमी तो कभी पानी की कमी का बहाना राज्य सरकार बनाकर अपना पीछा छुड़ाने की कोशिश करती है।

सवाल यहीं खत्म नहीं हो जाता। सवाल यह है कि इंसान के लिए सबसे जरूरी चीजों में षुमार बिजली संकट से पार पाने का रास्ता क्या है? क्या इसी तरह जनता बहाल होती रहेगी या उसकी हलाकानी का हल भी हो सकेगा। अब जबकि उत्तर प्रदेश के चुनाव में कुछ ही महीने बचे हैं लेकिन राज्य सरकार प्रदेश की त्रस्त जनता की हलाकानी को समझने के लिए कोर्इ ठोस कदम नहीं उठा रही है, ऐसे में राज्य सरकार के खुषहाली लाने के दावे का भंडाफोड़ हो जाता है।

बिजली संकट के चलते उत्तर प्रदेश सहित देश के दूसरे राज्यों की पैदावार और उधोगों के उत्पादन में जबरदस्त गिरावट आर्इ। पीने वाले पानी से लेकर सिंचार्इ के लिए पानी की जो किल्लत राज्यों की जनता को झेलने पड़ रहे हैं उसपर राज्य सरकार इतनी उदासीनता क्यों बरतती हैं समझ में नहीं आता है। ऐसे में कैसे आशा की जा सकती है कि आने वाले दिनों में राज्य सरकारें इस समस्या का हल ढूढ लेंगी।

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